उत्तराखंड में घटे 8 लाख वोटर किसका खेल बिगाड़ेंगे? सबसे ज्यादा देहरादून में कटे
उत्तराखंड में एसआईआर के दौरान 8 लाख से अधिक वोटर कम हुए हैं। सबसे अधिक देहरादून, हरिद्वार और उधमसिंह नगर से कटे हैं। ये कट चुके वोटर आगामी चुनाव में किसका खेल बिगाड़ेंगे?

उत्तराखंड में एक साल में 12 लाख 95 हजार 674 मतदाता घट गए हैं। अनंतिम वोटर लिस्ट ने सियासी दलों में हलचल बढ़ा दी है। देहरादून, यूएसनगर, अल्मोड़ा और हरिद्वार में सबसे ज्यादा वोटर कम हुए हैं। इन्हीं चारों जिलों में राज्य की 50 प्रतिशत विधानसभा सीटें आती हैं। इससे आने वाले चुनाव में राजनीतिक दलों की चुनौती भी बढ़ने वाली है। पेश है चंद्रशेखर बुड़ाकोटी और विनोद मुसान की विशेष रिपोर्ट...
बारह सीटों पर चंद वोटों के अंतर से होता है फैसला
देहरादून, ऊधम सिंह नगर, अल्मोड़ा के अलावा हरिद्वार में 5.49 लाख से ज्यादा मतदाताओं की संख्या कम हुई है। चुनावी गणित के लिहाज से यह आंकड़ा काफी महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड में करीब 12 सीटें ऐसी हैं, जहां जीत-हार का फैसला चंद वोट से ही हो जाता है। ऐसे में इस संख्या में वोटर कम होना हर राजनीतिक दल के लिए भी चिंता का विषय है।
कांग्रेस भी इन्हीं जिलों में मजबूत रही
कांग्रेस भी दून को छोड़कर इन तीन जिलों में ही मजबूत रही है। कांग्रेस ने 13 सीटें जीती थीं। बाकी तीन सीटों में दो बसपा और एक निर्दलीय उम्मीदवार जीतने में कामयाब रहे थे। भाजपा के महामंत्री कुंदन परिहार ने कहा कि भाजपा पर इसका कोई प्रभाव नहीं होगा। जो भी वोटर गलत रहा होगा, उसी का नाम लिस्ट से हटा है। सभी बीएलए को निर्देश दे दिए गए हैं कि आयोग के दिशानिर्देश के क्रम में कार्रवाई करें। कांग्रेस पीसीसी चीफ गणेश गोदियाल का कहना है कि अभी इस विषय पर कहना कुछ कठिन होगा। पार्टी आंकड़ों की समीक्षा कर रही है। देखा जाएगा कि किस-किस क्षेत्र में और किस किस वर्ग के वोट सबसे ज्यादा कटे हैं।
प्रभावित जिलों में सबसे ज्यादा सीटें भाजपा की
एसआईआर के आंकड़ों के मुताबिक सबसे ज्यादा वोटर दून (13.51%) और यूएसनगर (13.33%) में कम हुए हैं। इसके बाद अल्मोड़ा (10.52%) और हरिद्वार (9.46%) का नंबर है। इन जिलों में विधानसभा की 36 सीटें हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इन चार जिलों में 20 सीटें जीती थीं।
देहरादून में सबसे अधिक मतदाता कटे
एक जनवरी 2025 को प्रदेश में कुल मतदाता 84,29,459 थे, जो अब 71,33,785 रह गए हैं। प्री-एसआईआर में 4,68,697 और अब 8,26,977 मतदाता कम हुए हैं। निर्वाचन कार्यालय के मुताबिक, मृत्यु, विस्थापन, डुप्लिकेसी के कारण इन मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।
प्रदेश में 2003 के बाद से चुनाव आयोग का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) नहीं हुआ था। इस दौरान तमाम ऐसे मतदाता थे, जिनकी मृत्यु हो चुकी थी या वे विस्थापित होने के बावजूद मतदाता सूची में शामिल थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रदेश में 84,31,101 मतदाता थे। छह जनवरी 2025 को मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने जो अंतिम मतदाता सूची जारी की थी, उसमें मतदाताओं की कुल संख्या 84,29,459 दर्ज की गई थी।
मृत्यु-विस्थापित होने के कारण यह संख्या घटी
ड्राफ्ट मतदाता सूची के आंकड़ों पर गौर करें तो इसमें एक लाख 24 हजार 173 मतदाता मृत्यु श्रेणी में कम हुए हैं। एक लाख 56 हजार 88 मतदाता ऐसे हैं, जो कहीं शिफ्ट हो गए या वे मिले ही नहीं, जबकि चार लाख 77 हजार 485 मतदाताओं का कोई अता-पता ही नहीं मिला। इसके अलावा 61 हजार 454 मतदाताओं की कोई भी जानकारी नहीं मिल पाई।
70 विधानसभा क्षेत्रों में 810 मतदान केंद्र बढ़े
राज्य में 11,733 के सापेक्ष मतदान केंद्रों की संख्या 12,543 हो गई है। इस तरह 70 विधानसभा सीटों में 810 मतदान केंद्र बढ़ गए हैं। अपर मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने बताया कि उत्तराखंड में एक जुलाई 2026 की अर्हता तिथि के आधार पर एसआईआर प्रक्रिया चल रही है। प्रदेश में आठ जून से सात जुलाई तक गणना पत्रों के वितरण और डिजिटाइजेशन का कार्य पूर्ण किया गया। उन्होंने बताया कि मतदान केंद्रों की संख्या अब 12,543 हो गई है।
घबराएं नहीं, फॉर्म-6 से नया वोट भी बनेगा
ऐसे नागरिक जिनका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं है, वे फॉर्म 6 भरकर अपने नाम दर्ज करवाने के लिए ऑफलाइन मोड में अपने बीएलओ से और ऑनलाइन मोड में ईसीआईनेट ऐप के जरिए आवेदन कर सकते हैं। इसके साथ ही फॉर्म 7 और 8 के जरिए नाम हटवाने और नाम में सुधार किया जा सकता है। वर्तमान में फॉर्म 6 और 8 के साथ एनेक्सचर 4 भरना अनिवार्य है।
दून की वीआईपी सीटों पर वोटर लिस्ट में बड़ा ‘लोचा’
देहरादून में राजपुर रोड और कैंट में आधे से ज्यादा नामों में गड़बड़ी है। राजपुर रोड सीट पर 52% मतदाताओं के रिश्तेदारों के नाम में भिन्नता है, जबकि 59% मामलों में सेल्फ-मैपिंग के दौरान रिश्तेदारों के नाम बदले हुए हैं। यही स्थिति कैंट की भी है, जहां 51% रिश्तेदारों के नामों में विसंगति और 61% मामलों में सेल्फ-मैपिंग वैरिएशन हैं। यह लापरवाही चुनाव में भारी विवाद और नाम कटने की शिकायतों का बड़ा कारण बन सकती है।
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