
यूपी में अलायंस पार्टनर बदलेगी कांग्रेस? सपा या बसपा से गठबंधन पर पार्टी में ही मतभेद
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन के नतीजों से उत्साहित दोनों दल के शीर्ष नेतृत्व इसे अगले साल के विधानसभा चुनाव में भी आजमाना चाहते हैं, लेकिन यूपी कांग्रेस नेताओं की राय कुछ अलग है। इन नेताओं को कमेटी की बैठक के पहले कांग्रेस के यूपी प्रभारी अविनाश पांडे के बयान से और बल मिला।
कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व भले ही समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन बरकरार रखकर अगले साल प्रस्तावित विधानसभा चुनाव में उतरना चाहता है, लेकिन यूपी कांग्रेस के कई नेताओं की राय इससे फर्क है। वे चाहते हैं कि पार्टी या तो अकेले चुनाव मैदान में जाए या बसपा से मिल कर चुनाव लड़े। बीते दिनों पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी की बैठक में सपा के बजाय बसपा से गठबंधन के हिमायतियों की संख्या ज्यादा थी। हालांकि बसपा सुप्रीमो मायावती ने पिछले साल नौ अक्टूबर को बसपा के संस्थापक कांशीराम के परिनिर्वाण दिवस के मौके पर लखनऊ में आयोजित रैली में घोषणा की थी कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश में 2027 में होने वाला विधानसभा चुनाव अकेले के दम पर लड़ेगी।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन के नतीजों से उत्साहित दोनों दल के शीर्ष नेतृत्व इसे अगले साल के विधानसभा चुनाव में भी आजमाना चाहते हैं, लेकिन यूपी कांग्रेस नेताओं की राय फर्क है। वे बसपा संग गठबंधन के पक्षधर हैं। इन नेताओं को कमेटी की बैठक के पहले कांग्रेस के यूपी प्रभारी अविनाश पांडे के उस बयान से और बल मिला, जिसमें उन्होंने इंडिया ब्लॉक के दरवाजे बसपा के लिए खुले होने की बात कही थी।
सूत्रों की मानें तो पंचायत चुनाव तो अलग बात है, लेकिन आम चुनाव में कांग्रेस बिना गठबंधन के अपनी प्रभावी उपस्थिति को संभव नहीं मानती है। हालांकि, वह गठबंधन में सिर्फ सपा पर ही निर्भर रहना भी नहीं चाहती है। वह भी तब जब भाजपा लगातार सामाजिक इंजीनियरिंग को अगले स्तर पर ले जाने की कवायद में जुटी है। ऐसे में वह बसपा के विकल्प को पूरी तरह खारिज नहीं कर पा रही है। इसके अतिरिक्त सपा-कांग्रेस के साथ बसपा को भी लाने की संभावनाओं के दरवाजे उसने खोल रखे हैं। राजनीतिक जानकार भी मानते हैं कि तीनों के एक साथ आने से विपक्ष का गठबंधन ज्यादा व्यापक हो सकता है।
इतिहास से सबक भी लेगी पार्टी
कांग्रेस नेताओं के मुताबिक वर्ष 1996 में बसपा के साथ गठबंधन करके पार्टी चुनाव मैदान में गई थी। कम सीटों पर चुनाव लड़ने से कांग्रेस का जमीनी संगठन खिसक गया था। बसपा ने कांग्रेस का साथ छोड़कर भाजपा से हाथ मिला लिया था। कांग्रेस ने इससे सबक लिया कि वह अब समझौतों में खुद को हाशिये पर न रखकर ज्यादा सीटों का दावा करेगी। यह भी सच है कि गठबंधन में कांग्रेस की सियासत के अनुभव ज्यादातर अच्छे नहीं रहे हैं।
साथ कुछ 'बराबरी' का होगा
कांग्रेस यह भी मान रही है कि शीर्ष नेतृत्व की मंशा पर अगर सपा से ही गठबंधन रखा गया तो सीटों की संख्या के मामले में उसे नुकसान होगा। वहीं, बीते डेढ़ दशक में अपेक्षाकृत कमजोर हुई बसपा के साथ गठबंधन में उसे ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। पहले से ही यूपी में सियासी हाशिये पर खिसक चुकी कांग्रेस एक बार फिर यूपी में संगठन खड़ा करने की कवायद में है। पंचायत और विधानसभा चुनावों में इसकी परीक्षा होगी।





