व्यक्ति नहीं, नाट्य संस्था थे मोतीलाल गुप्त
Varanasi News - वाराणसी के रंगकर्मी मोतीलाल गुप्त का निधन हो गया। गोकुल आर्ट्स से जुड़े गुप्त का रंगमंच पर योगदान अद्वितीय था। उनकी नाटकों में भूमिका और जुनून ने उन्हें अमर बना दिया। शोकसभा में रंगकर्मियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनकी निष्ठा की सराहना की।

वाराणसी, मुख्य संवाददाता। काशी की सांस्कृतिक संस्था गोकुल आर्ट्स से जुड़े अत्यंत सक्रिय, समर्पित और कर्मशील रंगकर्मी मोतीलाल गुप्त अब इस दुनिया में नहीं हैं। शुक्रवार रात उनके दिवंगत होने के बाद संस्था से जुड़ी उनकी स्मृतियां आंखों के सामने आ गईं। इसके जरिए रंगमंच के लिए उनका योगदान अविस्मरणीय है। उनके समर्पण ने लोगों को कहने के लिए मजबूर कर दिया कि मोतीलाल व्यक्ति नहीं, बल्कि नाट्य संस्था थे। अस्सी स्थित रंगशाला में शनिवार को संस्था की ओर से शोकसभा में दिवंगत रंगकर्मी मोतीलाल गुप्त को श्रद्धांजलि दी गई। रंगकर्मियों ने रंगमंच के लिए उनके जुनून को अद्भुत बताया। कहा कि वह ‘गोकुल चंद्र गांगुली स्मृति अखिल भारतीय नाट्य प्रतियोगिता’ की तैयारी मनोयोग से करते थे।
वह मानते थे कि यह कार्यक्रम सिर्फ आयोजन नहीं, रंगमंच के प्रति उनकी निष्ठा और साधना का प्रतीक है। अलीबाबा, अभिशप्त कथा, मुद्राराक्षस, कामना और जनविजय समेत कई नाटकों में उन्होंने अपनी अभिनय क्षमता का लोहा मनवाया। उनकी संवाद-अभिव्यक्ति की दृढ़ता, मंच पर प्रभावशाली उपस्थिति और चरित्र के भीतर उतरने की कला अप्रतिम है। अलीबाबा में कासिम, अभिशप्त कथा में शुक्राचार्य, मुद्राराक्षस में चाणक्य और कामना में विलास की भूमिका ने उन्हें अमर कर दिया।शोकसभा में राजेश्वर त्रिपाठी, परितोष भट्टाचार्य, अनूप मिश्रा, अनूप कुमार अग्रवाल, सुमन पाठक, कुसुमरानी मिश्रा, राजलक्ष्मी मिश्रा, देवश्री श्रीवास्तव, दीपक माथुर, विपिन चंद्रा, रोशन कुमार, ज्योति अग्रवाल, बालमुकुंद त्रिपाठी, अर्पित शिधोरे सहित कई लोग उपस्थित रहे।
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