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28 फरवरी, 2021|6:09|IST

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मूर्तियों में जान डालने वाला कारोबार खुद हुआ बेजान

मूर्तियों में जान डालने वाला कारोबार खुद हुआ बेजान

संगमरमर, चुनार के बलुआ पत्थर व सॉफ्ट स्टोन से बनी मूर्तियों और प्रतिमाओं का बड़ा कारोबार होता है। पर्यटन से सीधे जुड़े होने के कारण कोरोना संकट ने इस कारोबार पर बहुत असर डाला है। भगवान बुद्ध, देवी-देवताओं, अशोक स्तंभ, महापुरुषों की प्रतिमाएं बनारस से देश विदेश में जाती हैं। करोड़ों रुपये का निर्यात होता है, लेकिन कोरोने ने सबकुछ ठप कर दिया है।

मूर्तियों के कारोबार में 90 फीसदी तक गिरावट आई है। शिल्पियों के पास काम न के बराबर हैं। व्यापारियों पर कर्ज बढ़ता जा रहा है। दुकानों व कारखानों के खर्चे नहीं निकल रहे हैं। जिन कारखानों में 25 से 30 कारीगर काम करते थे, अब चौथाई भी नहीं रह गये हैं।

लल्लापुरा, कालीमहल, सोनारपुरा, लक्सा, दशाश्वमेध, चौकाघाट आदि इलाकों में मूर्ति भंडार हैं, जहां संगमरमर की मूर्तियां बनती हैं। इन कारखानों में तीन हजार से ज्यादा शिल्पी काम करते थे, लेकिन अब इनकी संख्या काफी घट गई है।

ये शिल्पी देवी-देवताओं की छोटी बड़ी मूर्तियों के अलावा महापुरुषों की प्रतिमाएं भी बनाते हैं। 100 रुपये से लेकर 80000 रुपये तक की मूर्तियां बनती हैं। दो फीट का शिवलिंग बनाने में एक शिल्पी को 10 से 15 दिन लग जाते हैं। वहीं भगवान बुद्ध की तीन फीट की प्रतिमा बनाने में 20 से 25 दिन का समय लगता है। भगवान बुद्ध के बालों और कानों की नक्काशी को उभारने के अलावा देवी-देवताओं की प्रतिमाओं में जान डालने वाले ये शिल्पी इन दिनों भुखमरी की कगार पर हैं।

सॉफ्ट स्टोन में दुनियाभर में प्रसिद्ध हाथी के अंदर हाथी समेत अन्य उत्पाद बनाने वाले वाले शिल्पी इन दिनों संकट से गुजर रहे हैं। रामनगर में सॉफ्ट स्टोन के काम से एक हजार परिवार जुड़े हुए हैं। ये सभी परिवार निर्यात पर निर्भर हैं, लेकिन लंबे समय से ऑर्डर न मिलने के कारण अब तमाम शिल्पियों ने दूसरे काम करने शुरू करने दिये हैं। इसी तरह चुनार का बलुआ पत्थर, जिससे अशोक स्तंभ, बुद्ध की प्रतिमाएं बनती हैं, का कारोबार भी सिमट गया। सारनाथ क्षेत्र में ही रोजाना ये मूर्तियां और शिल्प उत्पाद सैकड़ों की संख्या बिकते थे।

चुनौती-

-पर्यटन शुरू न होने से समस्या

-शिल्पियों व कारोबारियों के सामने रोजी रोटी का संकट

-बिजली बिल व फिक्सड चार्ज चुकाना

-कारखानों व दुकानों का किराया निकालना

-शिल्प के काम से पलायन को रोकना

उम्मीद-

-जो शिल्पी काम छोड़ रहे हैं उन्हें वापस बुलाने के लिए प्रोत्साहन राशि

-पत्थर के शिल्प से जुड़े कारोबार के लिए राहत पैकेज

-जीएसटी की दर कम हो, जिससे उत्पाद सस्ते हों

-मार्च से सितबंर तक बिजली बिल व फिक्स्ड चार्ज में राहत

-बुनकरों की तर्ज पर हस्तशिल्पियों को बिजली बिल में सब्सिडी

मेरी आवाज सुनो-

साल 1938 से हमारा मूर्ति का काम चल रहा है। बरकछा कैंपस में लगी महामना की मूर्ति भी हमने ही बनाई है। देश विदेश में हमारे कारखाने में बनी मूर्तियां जाती थीं। अब इस समय सब बंद हो गया है। कारखाने पर 35 कारीगर थे, अब दस रह गये हैं। मजबूरी में शिल्पियों को कहना पड़ा कि वो लोग अपना काम देख लें। अब दस कारीगर में काम चल रहा रहे हैं।

कारखाना हमारे घर पर ही है, किराया नहीं देना है, फिर भी संकट से गुजर रहे हैं। नवरात्र के समय ऑर्डर ज्यादा होते थे, लेकिन अभी इक्का दुक्का लोग आ रहे हैं। जिन ग्राहकों ने पहले ऑर्डर दिया था अब उसे लेने नहीं आ रहे हैं। हमारी पूंजी भी फंस गई है। स्थिति बहुत नाजुक है। आगे क्या होगा समझ में ही नहीं आ रहा है।

कृष्ण कुमार सिंह, कारोबारी कालीमहाल

बातचीत-

कारोबार में 90 फीसदी तक गिरावट आई है। लोकल काम पर थोड़ा बहुत खर्च निकल जा रहा है।

अनिल कुमार आर्या, लक्सा

हमारे शिल्प को बड़ी तारीफ मिलती है। लेकिन अब संकट की स्थिति है। यदि सरकार ने राहत नहीं दी तो और गंभीर संकट आएगा।

बच्चेलाल मौर्य, शिल्पी रामनगर (स्टेट अवार्डी)

कोरोना ने कारोबार की कमर तोड़ दी है। मूर्तियों की मांग बहुत कम होने से कारखाने का खर्चा निकालना मुश्किल हो गया है।

सुभाष गौड़, कारोबारी

नवरात्र से पहले खाना खाने की फुर्सत नहीं होती थी, अब हालात इसके उलट हैं। एक काम मिलने के लिए इंतजार करना पड़ता है।

पप्पू, शिल्पी

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  • Web Title:The life-saving business of idols became lifeless