
स्वामी हरिदास ललिता सखी के थे अवतार
Varanasi News - स्वामी हरिदास देव ने सखी संप्रादय की स्थापना की और उन्हें ‘रसिक चक्र चूड़ामणि’ की उपाधि दी गई। वृंदावन में हुए प्रवचन में स्वामी किशोरदास देव ने कहा कि स्वामी हरिदास का प्रेम की गति अद्भुत है, जो लौकिक प्रेम से भिन्न है। उनका उपासना पद्धति अद्वितीय है।
वाराणसी, मुख्य संवाददाता। बांके बिहारी के अनन्य भक्त स्वामी हरिदास देव ने सखी संप्रादय का प्रवर्तन किया था। ललिता सखी के अवतार माने जाने वाले स्वामी हरिदास देव को ‘रसिक चक्र चूड़ामणि’ की उपाधि दी गई थी। इसका अर्थ है जो ईश्वर के प्रेमपूर्ण रूप का आनंद लेता है। ये बातें वृंदावन में गोरीलाल कुंज श्रीधाम के महंत स्वामी किशोरदास देव ने कहीं। वह दुर्गाकुंड स्थित श्रीहनुमान प्रसाद पोद्दार अंधविद्यालय में भक्तमाल कथा के चौथे दिन गुरुवार को प्रवचन कर रहे थे। संकटमोचन संकीर्तन मंडल की ओर से हो रहे आयोजन में कथा व्यास ने कहा कि स्वामी हरिदास महाराज ने श्रीराधामाधव के युगल स्वरूप को निहारने का एक अलग ही मार्ग सुझाया है।

उन्होंने जिस रसमयी नित्यविहारोपासना का सिद्धांत प्रतिपादित किया वह अनुपम एवं अलौकिक है। उन्होंने कहा कि प्रेम की गति अद्भुत होती है। उसमें अपने शरीर के सारे सुख और स्वार्थ विस्मृत हो जाते हैं। प्रियतम को जो बातें रुचती-सुहाती हैं वही प्रेमी को भी भाती हैं। लौकिक प्रेम में जहां प्रेमी-प्रेमिका अपना सुख चाहते हैं। यह प्रेम कभी स्थाई नहीं हो सकता। स्वामी हरिदास की उपासना तत्सुखमयी है। श्रीराधा का समस्त लीला विलास प्रियतम के लिए है। कुंजबिहारी भी वही करते हैं जिससे श्रीराधा को सुख प्राप्त हो। कथा में सतुआ बाबा आश्रम के पीठाधीश्वर जगद्गुरु संतोषाचार्य भी शामिल हुए। प्रारंभ में व्यासपीठ का पूजन शिवकुमार एवं अखिलेश खेमका ने किया। इस अवसर विजय कुमार मिश्र, नीरज दुबे, बलदाऊ पाठक, विनोद पाल, जितेंद्र खनेजा आदि उपस्थित रहे।

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