ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अयोध्या में स्थापित की गई ‘ज्योतिस्वरूप’ कलाकृति पर आपत्ति की है।

Newswrap हिन्दुस्तान, वाराणसी
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Varanasi News - ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अयोध्या में स्थापित 'ज्योतिस्वरूप' कलाकृति पर आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे शास्त्रीय मर्यादाओं का उल्लंघन और परंपराओं के साथ 'अक्षम्य त्रुटि' करार दिया। स्वामी ने ट्रस्ट से पूछा कि क्या गर्भगृह का स्थान मूल जन्म स्थान से अलग बनाया गया है।

 ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अयोध्या में स्थापित की गई ‘ज्योतिस्वरूप’ कलाकृति पर आपत्ति की है।

वाराणसी। ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अयोध्या में स्थापित की गई ‘ज्योतिस्वरूप’ कलाकृति पर आपत्ति की है। इस बाबत उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को पत्र लिखकर इसे शास्त्रीय मर्यादाओं का उल्लंघन और परंपराओं के साथ की गई ‘अक्षम्य त्रुटि’ करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जन्मभूमि का प्रत्येक कण वंदनीय है। विशेषकर वह स्थान जहां पूर्व में गुंबद था। वहां वर्षों तक प्रभु का ‘चल विग्रह’ प्रतिष्ठित रहा। उन्होंने ट्रस्ट से प्रश्न किया है कि क्या वर्तमान भव्य मंदिर का गर्भगृह उस ‘मूल जन्म स्थान’ से अलग बनाया गया है? उन्होंने चेताया कि यदि ऐसा है, तो यह शास्त्र और परंपरा की दृष्टि से भारी भूल है क्योंकि गर्भगृह का स्थान अपरिवर्तनीय होता है।

उक्त स्थान पर स्थापित की गई पीतल की ‘ज्योतिस्वरूप’ कलाकृति पर कहा कि हमारे शास्त्र कहते हैं ‘अग्निमुखं वै देवा:।’ ज्योति का अर्थ साक्षात् ‘तेज’ तत्व (अग्नि) है। पीतल को ज्वाला का आकार दे देने मात्र से वह ज्योति नहीं हो जाती। बिना घी, तेल और वर्तिका के किसी जड़ पदार्थ को ‘ज्योति’ की संज्ञा देना शास्त्रीय मर्यादा का अपमान है। शंकराचार्य ने ट्रस्ट को निर्देशित किया है कि वर्तमान मुख्य गर्भगृह और ‘ज्योतिस्वरूप’ वाले स्थान के बीच के शास्त्रीय संबंध को स्पष्ट किया जाए। उक्त अशास्त्रीय धातु-कलाकृति के स्थान पर विधि-विधान से साक्षात् ज्योति की स्थापना की जाए। उन्होंने विश्वास जताया कि ट्रस्ट अपनी भूल को सुधारते हुए यथाशीघ्र शास्त्रीय मर्यादा की पुनः स्थापना करेगा और मूल स्थान के विषय में भक्तों के बीच उत्पन्न भ्रांति का निवारण करेगा।

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