Standard bypassing children being pushed into vehicles - स्कूलों की मनमानी: मानक दरकिनार, वाहनों में ठूंसे जा रहे बच्चे DA Image
21 नबम्बर, 2019|9:28|IST

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स्कूलों की मनमानी: मानक दरकिनार, वाहनों में ठूंसे जा रहे बच्चे

प्रतीकात्मक तस्वीर

निजी स्कूलों में केवल फीस को ही लेकर मनमानी नहीं है बल्कि स्कूली वाहनों के नाम पर भी मानकों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। स्कूली वाहनों में बच्चे ठूंस कर भरे जा रहे हैं। कुछ को छोड़, ज्यादातर स्कूल मानकों को नजरंदाज कर रहे हैं। इस बाबत प्रशासनिक, आरटीओ व ट्रैफिक के अफसर आंखें मूंदे रखते हैं। वहीं, ज्यादातर अभिभावक भी इस मनमानी पर मौन रहते हैं। 

स्कूली वाहनों से दुर्घटना की कई घटनाएं हो चुकी हैं मगर उनमें बच्चों को ठूंसकर बैठाने का सिलसिला कम भी नहीं हुआ है, बंद होना तो दूर की बात है। छोटे-बड़े वाहनों में बैठे बच्चे बिलबिला जाते हैं। गर्मी में तो कई बार बच्चों को सांस लेने में भी तकलीफ होती है। मगर किसी का इस ओर ध्यान नहीं है। बच्चों के जीवन को लेकर न तो विद्यालयों के प्रबंधतंत्र गंभीर हैं,  न ही प्रशासन। 

आपरेटरों के जरिये बस संचालन
शहर में कई बड़े निजी स्कूलों में बसें चलती हैं। वहीं तमाम ऐसे स्कूल हैं जहां स्कूल प्रबंधकों का वाहन स्वामियों के साथ समझौता है। वहां आपरेटर के जरिए वाहन संचालित हो रहे हैं। ऐसे वाहनों में न तो मीटर ठीक है, न ही हार्न। बस में फर्स्ट ऐड बॉक्स नहीं होते। बस में अलग से भी सीटें जोड़ देते हैं ताकि अधिक से अधिक बच्चों से अतिरिक्त कमाई हो सके। 

विधानसभा में उठ चुका है मुद्दा
विधान परिषद सदस्य शतरुद्र प्रकाश ने निजी स्कूलों में नियमों को ताक पर रखकर वाहन संचालन का मुद्दा उठाया था। उनका कहना है कि सात से आठ सीट वाली गाड़ियों में 15-16 बच्चों को ठूंस कर बैठाया जा रहा है। चालकों को बिना जांच पड़ताल के रखा जा रहा है। बसों में सीसीटीवी कैमरे व जीपीएस लगाने की योजना भी ठंडे बस्ते में है। 

कमेटी ने आज तक नहीं की जांच 
दो साल पहले तत्कालीन एसएसपी नितिन तिवारी ने स्कूली वाहनों के फिटनेस की समय-समय पर जांच के लिए एक कमेटी बनायी थी। कमेटी में संभागीय परिवहन अधिकारी प्रशासन, अपर जिला मजिस्ट्रेट नगर, पुलिस अधीक्षक यातायात, क्षेत्राधिकारी यातायात के अलावा तीन स्कूल प्रबंधक आदि के नाम थे मगर कमेटी की कभी बैठक ही नहीं हुई।

स्कूल वाहनों के लिए निर्धारित नियम:
बस में फर्स्ट एड बॉक्स होना चाहिए।
बस के शीशों पर छड़ की रेलिंग लगी हो।
चालक के पास ड्राइविंग लाइसेंस, आई कार्ड और वाहन के कागजात होने चाहिए।
विद्यालय की ओर से बस संचालन के लिए प्रदत्त प्रमाण पत्र हो।
यदि स्कूल की निजी बस है तो उसे पीले रंग में होना चाहिए।
वाहन पर विद्यालय या इसके प्रबंधक का पता और दूरभाष नंबर होना चाहिए।
फिटनेस प्रमाण पत्र होना चाहिए।
बसों में बैग रखने की हो व्यवस्था

क्या कहता है मोटर अधिनियम 
स्कूल बसों की आयु अधिकतम 15 वर्ष तय है। चालक का लाइसेंस व्यावसायिक एवं पांच वर्ष पुराना होना चाहिये। उसपर स्कूल बस चलाने का बैज भी अंकित होना चाहिये। स्कूल बस में बच्चों की सूची, नाम-पता एवं ब्लड ग्रुप सहित होनी चाहिये। नियम के अनुसार बस पर स्कूल एवं चालक का नाम तथा स्कूल का फोन नम्बर लिखना अनिवार्य है।

अग्निशमन यंत्र भी अनिवार्य 
इसी प्रकार 12 सीट वाली बसों में 2 किलो का एक अग्निशमन यंत्र एवं 12 से 20 सीट तक की बसों में 5 किग्रा. तथा 20 सीट से ऊपर की बसों में 5 किग्रा. के दो अग्निशमन यन्त्र होने चाहिए। एक यंत्र चालक की केबिन एवं एक आपातकालीन द्वार के पास लगा होना चाहिये । 

2860 बसें हैं पंजीकृत 
वाराणसी मंडल में कुल 2860 स्कूली बसें पंजीकृत हैं जिन्हें स्कूल बस का परमिट जारी है। इसके अलावा कई बाहरी आपरेटर स्कूलों से संबद्ध होकर वाहन संचालित कर रहे हैं। 

समय-समय पर स्कूल वाहनों की चेकिंग कराई जाती है। वाहनचालकों और स्कूल प्रबंधन को नियमों के अनुपालन का निर्देश दिया जाता है। अभिभावकों को भी चाहिए कि अपने बच्चों को स्कूल भेजने से पहले यह सुनिश्चित कर लें कि वाहन पूरी तरह दुरुस्त हैं कि नहीं। यदि कोई कमी हो तो विद्यालय के प्रबंधतंत्र या स्थानीय प्रशासन को अवश्य सूचित करें। 
डीके त्रिपाठी, सहायक संभागीय परिवहन आयुक्त 

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