
शुभम के लिए कमीशन पर फर्म खुलवाने वाले दो गिरफ्तार
Varanasi News - वाराणसी में कफ सिरप की तस्करी के सरगना शुभम जायसवाल के लिए फर्जी फर्म खोलने वाले दो आरोपियों विशाल कुमार जायसवाल और बादल आर्य को पुलिस ने गिरफ्तार किया। दोनों पर फर्जी दस्तावेज बनाकर कफ सिरप की तस्करी करने का आरोप है। इस मामले में दिवेश जायसवाल भी शामिल है।
वाराणसी, वरिष्ठ संवाददाता। कफ सिरप की तस्करी के सरगना शुभम जायसवाल के लिए बोगस फर्म खुलवाकर कमीशन लेने वाले दो आरोपियों को कोतवाली पुलिस ने सोमवार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। पकड़े गए आरोपियों में हुकुलगंज निवासी विशाल कुमार जायसवाल और बादल आर्य हैं। दोनों आरोपियों को रविवार को ही पुलिस ने हिरासत में लिया था। विशाल जायसवाल स्नातक है। उसकी मोबाइल की छोटी सी दुकान है, जबकि बादल आर्य इंटर पास है। वह कोई काम नहीं करता। डीसीपी काशी जोन गौरव बंसवाल और एडीसीपी सरवणन टी. ने कोतवाली स्थित कार्यालय में दोनों की गिरफ्तारी की जानकारी दी। पुलिस अधिकारियों ने बताया कि शुभम जायसवाल के लिए काम करने वाले खोजवां निवासी दिवेश जायसवाल ने दोनों आरोपियों के नाम से फर्जी तरीके से फर्म बनवाए, ताकि कफ सिरप की तस्करी की जा सके।

दिवेश ने ही फर्जी रेंट एग्रीमेंट, फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र आदि तैयार कर ड्रग लाइसेंस जारी कराया। इसमें विशाल के नाम से हरिओम फार्मा, जबकि बादल के नाम से काल भैरव ट्रेडर्स फर्म खुलवाई। हरिओम फार्मा को शुभम के पिता के नाम से रांची में पंजीकृत फर्म शैली ट्रेडर्स से 4.18 लाख शीशी कफ सिरप सप्लाई दिखाई गई। इसकी बिक्री पांच करोड़ रुपये में हुई, जबकि काल भैरव ट्रेडर्स को 1.23 लाख कफ सिरप दो करोड़ में बेची गई। विशाल ने बताया कि दिवेश जायसवाल उसके ममेरे भाई का परिचत है। दिवेश ने पहले विशाल का फर्म खुलवाई। इसके बाद बादल के नाम से फर्म खुलवाई। गिरफ्तारी करने वाली टीम में कोतवाली थाना प्रभारी दया शंकर सिंह, एसओजी प्रभारी गौरव सिंह, उप निरीक्षक प्रिंस तिवारी, अंकित कुमार सिंह, विजय कुमार यादव आदि थे। प्रति बोतल एक रुपये कमीशन देता था शुभम - दिवेश ही आरोपियों से ओटीपी पूछकर पैसे शुभम के खातों में ट्रांसफर करता था आरोपियों ने पुलिस को बताया कि दिवेश की खोजवां स्थित डीएसए फार्मा के माध्यम से उनकी मुलाकात श्री हरि फार्मा ऐंड सर्जिकल एजेन्सी सोनिया के प्रोपराइटर अमित जायसवाल और शैली ट्रेडर्स के कंपीटेंट पर्सन शुभम जायसवाल से हुई थी। उसी दौरान दोनों ने कम समय में ज्यादा कमाई करने का लालच देकर कफ सिरप के व्यापार के लिए प्रेरित किया। इसपर दोनों सहमत हो गए। उन लोगों की ओर एक-एक दुकान और कूटरचित दस्तावेज तैयार कराकर दोनों का ड्रग लाइसेन्स बनवाया गया। इसके लिए शुभम जायसवाल दिवेश जायसवाल के माध्यम से प्रतिमाह 30 से 40 हजार रुपये नगद कमीशन देता था। फर्म का पैसा इन दोनों के अकाउण्ट में आता था। दिवेश इसे जल्दी से जल्दी शैली ट्रेडर्स के खाते में ट्रांसफर कर देता था। आरोपियों के फर्म के बैंक अकाउंट की पूरी जानकारी दिवेश जायसवाल के पास थी। रुपया ट्रांसफर करते समय दिवेश ओटीपी मांगता था। इस तरह से करते थे कालाबाजारी शुभम जायसवाल के पिता भोला प्रसाद के नाम से रांची में रजिस्टर्ड शैली ट्रेडर्स से लाखों-करोड़ों रुपये की कफ सिरप गिरफ्तार विशाल, बादल एवं इनके जैसे ही अन्य की फर्जी फर्म को भेजी जाती थी, लेकिन माल फर्म तक नहीं आता था, बल्कि जहां भेजना होता था, सीधे वहां पहुंच जाता था। इधर शुभम और दिवेश विशाल, बादल या फिर इनकी तरह के अन्य बोगस फर्मों के भी फर्जी ई-वे बिल, लेन-देन के बिल बनाते थे। ताकि उनकी चोरी छिपाई जा सके। उदाहरण के तौर पर शैली ट्रेडर्स से एक करोड़ का माल विशाल के हरिओम फार्मा को भेजा गया, लेकिन माल आया नहीं, बल्कि दूसरी फर्म को चला गया। इधर हरिओम फार्मा से दूसरे या तीसरे किसी अन्य फर्जी फर्म को कफ सिरप की सप्लाई दिखा दी जाती थी। इसके लिए फर्जी ई-वे बिल बनवाया जाता था। नारकोटिक्स विभाग के नोटिस के बाद समझ आया आरोपी विशाल ने पुलिस को बताया कि उनके फर्म के बैंक खाते से उनका नंबर ही अटैच है। इसलिए जितने ट्रांजेक्शन होते थे, उसको मेसेज आ जाता था। करीब सवा साल पहले ही दोनों की फर्म खुलवाई गई थी। शुरू में कम लेन-देन हुआ, इसके बाद 25 से 50 लाख, एक करोड़ रुपये तक के ट्रांजेक्शन होने लगे। इस बीच छह माह पहले नारकोटिक्स ब्यूरो का नोटिस विशाल के पास आया तो उसको लगा कि कुछ गड़बड़ है। उसने बताया कि उसके कुछ दिन बाद उसने जीएसटी नंबर बंद करा दिया था। दिवेश फर्जी फर्म, फर्जी दस्तावेज एवं लेन-देन का मास्टर दिवेश जायसवाल ही फर्जी फर्म बनवाने से लेकर फर्जी दस्तावेज तैयार कराने, फर्म के रुपये शुभम के खातों में समायोजित करता था। शुभम का वह दाहिना हाथ है। दिवेश के एक ही पते पर दो फर्म दिवेश के डीएसए फर्म खोजवां के नाम पर ही महादेव फर्म भी है। फर्जीवाड़़ा कर विभागीय मिलीभगत कर एक ही पते पर दो-दो फर्म खोली। चूंकि लाइसेंस के लिए डी. फार्मा डिग्री या फिर तीन साल का अनुभव प्रमाणपत्र चाहिए। इसलिए वह अपनी फर्म पर ही तीन-तीन साल का अनुभव प्रमाणपत्र जारी करता था। गिरफ्तार विशाल और बादल के नाम भी अनुभव प्रमाणपत्र उसी ने जारी किया। ऑटो- ई-रिक्शा से डिलीवरी दिखाई, 10 को 100 किलोमीटर दर्शाया एडीसीपी ने बताया कि शुभम और दिवेश ने कफ सिरप की कालाबाजारी के लिए फर्जी ई-वे बिल बनवाए। इसके लिए ई-वे बिल में दर्शाए गए वाहनों के नंबर चेक कराए गए तो स्कूल बस, ई-रिक्शा, ऑटो के मिले। बावजूद इन वाहनों के चालकों को बुलाकर तस्दीक की गई तो पता चला कि उन लोगों का इनसे कोई संपर्क नहीं है। शहर के अलग-अलग हिस्से में वे रहते हैं, उधर ही वाहन चलाते हैं। उधर फर्जी तरीके से माल सप्लाई दर्शाने के लिए दूरी भी फर्जी तरीके से दिखाया जाता था। जैसे बादल आर्या की फर्म अकथा में दिखाई गई है, माल सप्लाई आशापुर की एक फर्म को दिखाया गया है। 10 किलोमीटर की यह दूरी 100 किलोमीटर दर्शाई गई है। बांग्लादेश में दो से तीन गुने में बिक्री बांग्लादेश में शराब प्रतिबंधित है। वहां कफ सिरप नशे के रूप में इस्तेमाल होती है। भारतीय करेंसी में दोगुना की दर से बिक्री होती है। इसलिए शुभम ने वहां काले बाजार की संभावना देखी। इसके लिए सिंडीकेट खड़ा कर रांची में जानबूझकर फर्म पंजीकृत कराई। ताकि उधर से सप्लाई की चेन आसान बनाई जा सके। भोला को वाराणसी लाएगी पुलिस, लगेगा गैंगस्टर सोनभद्र पुलिस की ओर से गिरफ्तार आरोपी शुभम के पिता भोला प्रसाद को वाराणसी पुलिस वारंट बी. के तहत लाएगी। यहां पर उससे पूछताछ की जाएगी। एडीसीपी ने बताया कि यह पूरा संगठित अपराध है। इसलिए इन सभी पर गैंगस्टर का केस दर्ज किया जाएगा। अब तक भोला प्रसाद, रोहनिया में पिशाच मोचन निवासी आजाद जायसवाल, हुकुलगंज निवासी विशाल एवं बादल की गिरफ्तारी हुई है। दो और फर्म संचालक निशाने पर विशाल एवं बादल की तरह दो और फर्म से इसी तरह से अवैध रूप से सप्लाई कराई गई है। दोनों फर्म के संचालक भागे हुए हैं। इनके अलावा दिवेश जायसवाल और अमित जायसवाल की तलाश की जा रही है। ड्रग विभाग के ‘रहमो-करम’ पर फलता रहा अवैध कारोबार कफ सिरप की तस्करी का पूरा खेल ड्रग विभाग के ‘रहमो-करम’ पर फलता रहा। फर्जी तरीके से फर्म खुलवाई गई। फर्जी दस्तावेज बनवाकर लगाए गए। बावजूद विभाग ने गहनता से जांच नहीं की। अंदरखाने चर्चा है कि सबकुछ जेब भारी करने से मैनेज होता रहा। इसलिए माल सप्लाई नहीं होने की जानकारी विभागीय निरीक्षकों को खूब थी, लेकिन जानबूझकर आंखें बंद रखीं। इसीलिए फर्जी ई-वे बिल, ट्रांसपोर्ट बिल की गड़बड़ियां नहीं दर्शाया। ना ही किसी फर्म को निलंबित किया। फर्म के नाम पर मास्क, सिरिंज बोगस फर्म के दर्शाए गए पते पर एसआईटी टीम गई तो वहां आठ गुणे 10 फुट का कमरा मिला। किसी में मोबाइल दुकान, कहीं पर केवल कमरा मिला। कमरे में स्टील की रेलिंग थी। हर जगह मास्क और सिरिंज मिली। बाकी दवाएं नहीं मिलीं।

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