
कथाएं इतिहास को संजोकर करती हैं सत्य को स्थापित
Varanasi News - वाराणसी में महालक्ष्मी महायज्ञ के दौरान स्वामी भगवान वेदांताचार्य ने भगवान शिव के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शिव केवल संहारक नहीं, बल्कि सृष्टिकर्ता और पालक भी हैं। पुराणों की कथाएं मानवता के लिए कुरीतियों को दूर करने का साधन हैं। यज्ञ मंडप में भक्तों की बड़ी संख्या रही।
वाराणसी, मुख्य संवाददाता। भगवान शिव के चरित्र का लीला माधुर्य पौराणिक संस्कृति में रचा-बसा है। इसी संस्कृति में भारतीय अध्यात्म की सूत्रात्मकता का आभास भी होता है। कथाएं मानव संस्कृति की ऐसी देन हैं जो स्वयं में इतिहास को संजोकर सत्य को स्थापित करती हैं। ये बातें स्वामी भगवान वेदांताचार्य ने कहीं। वह फलाहारी बाबा आश्रम की ओर से शिवपुर रामलीला मैदान में हो रहे महालक्ष्मी महायज्ञ के निमित्त आयोजित शिवमहापुराण कथा के चौथे दिन सोमवार को प्रवचन कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भगवान शिव वर्णों, सूक्तों और वेद की ऋचाओं में ही समाहित नहीं हैं। वह तो वेदना की पुकार और भक्त के निनाद में भी समाहित हैं।

यदि कोई देव वैभव की पराकाष्ठा से भी ऊपर है तो वह एकमात्र शिव ही हैं। श्रुति बोधक ज्ञान उन्हीं की देन है। उन्होंने कहा कि यह श्रुति बोधक ज्ञान ज्ञान जब समाहित होता है तो संहारक बन जाता है। जब यह ज्ञान प्रकाशित होता है तो सृष्टिकारक बनता है। डमरू के 14 बार निनाद से शब्दों ने आकार लिया और उसी के प्रभाव से सृष्टि भी आकार में आई। देवाधिदेव महादेव को संहारक माना गया है किंतु मूल रूप से देखा जाए तो सर्जक और पालक भी वही हैं। ऐसा क्यों और किस आधार पर है इसका प्रमाण हमें शिवमहापुराण से प्राप्त होता है। कथावाचक ने कहा कि वर्तमान में पुराणों की कथा ही जनमानस में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का एकमात्र साधन हैं। पौराणिक कथाएं हमारी सैद्धांतिक पृष्ठभूमि को पुष्ट करती हैं। सनातन परंपरा की अवधारणा एक दिव्या चेतना पुंज की अलौकिक शक्ति में समाहित है। योगीराज रामकरण दास एवं फलाहारी बाबा संत सेवा ट्रस्ट के महंत रामदास त्यागी के सानिध्य में हो रही कथा के विराम पर विनोद कुमार दुबे, कमलेश केशरी, आनंद अग्रवाल, यज्ञाचार्य जितेंद्र तिवारी, रोहित शुक्ला ने व्यासपीठ की आरती उतारी। यज्ञ मंडप की करते रहे परिक्रमा कथा से पूर्व प्रात:कालीन सत्र में महंत रामकरण दास महाराज के सानिध्य में श्रीमहालक्ष्मी महायज्ञ किया गया। वैदिक विद्वानों ने मंत्रोच्चार के बीच यज्ञ कुंड में आहुतियां डालीं। अग्नि में डाला गया सांकला 108 प्रकार की औषधियों से तैयार किया गया है। यज्ञ कुंड से उठने वाले धुएं के साथ इन औषधियों के तत्व भी आसपास फैल रहे हैं। यज्ञ मंडप की परिक्रमा करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। प्रात:काल यज्ञ आरंभ होने से मध्याह्न में यज्ञ के विराम लेने तक परिक्रमा के लिए भक्तों का तांता रहा।

लेखक के बारे में
Hindustanलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




