संकटमोचन: श्रीकृष्ण-राधा लीला संग श्रीराम शिखर के भी दर्शन
Varanasi News - वाराणसी में संकटमोचन संगीत समारोह के पांचवे निशा में पं. राममोहन महाराज ने अपनी कथक नृत्य यात्रा की शुरुआत की। 65 वर्ष की उम्र में भी उनके नृत्य में किशोरवय चपलता और युवा उत्साह दिखाई दिया। दर्शकों ने उनकी प्रस्तुति का आनंद लिया, जिसमें तबला और घुंघरू की ताल के साथ अद्भुत दृश्यावली थी।

वाराणसी। संकटमोचन भगवान की अंगनाई। संगीत समारोह की पांचवीं निशा की पहली प्रस्तुति लेकर मंच पर लखनऊ घराने के पं.राममोहन महाराज हैं। मंच प्रवेश की उनकी अदा, नमस्कार का अंदाज, श्रोताओं से बात करते समय आवाज का असर। सब कुछ उनके बड़े भाई स्मृतिशेष पं. बिरजू महाराज की याद दिला रहा है। पं.राममोहन महाराज संकटमोचन में अपनी दूसरी कथक नृत्य यात्रा वहीं से शुरू कर रहे हैं जहां उन्होंने 47 साल पहले 18 साल की उम्र में छोड़ी थी।65 वर्ष की उम्र में भी किशोरवय चपलता और युवा उत्साह एक साथ उनके नृत्य में नजर आ रहा है। नृत्य का नयनाभिराम अवलोकन करने के लिए मंच के सामने वाले आंगन में पिछले बारामदे तक की बैरिकेडिंग दर्शकों से भरी है।
यहां से दर्शकों को अद्भुत दृश्यावली सुलभ हो रही है। उनकी नजरें निश्चित रूप से पं.राममोहन महाराज पर टिकी हैं। मंच पर श्रीकृष्ण-राधा की लीला, तबला-घुंघरू के मिलन से पं.राममोहन महाराज-ताल साधक पं.संजू सहाय जीवंत कर रहे हैं। मंच का यह दृश्य दर्शकों की आंखों से बन रहे फ्रेम का केंद्र अवश्य है लेकिन इसके आसपास के विषय भी इसमें सहज सम्मिलित हो गए हैं।मंच के ठीक पीछे पश्चिम से श्रीराम जानकी के दरबार का शिखर और उसपर लहराता केसरिया ध्वज मिलकर इस फ्रेम को पूर्णता प्रदान कर रहा हैं। इस फ्रेम से कथक के कथ्य से परिचित होना पुराने से पुराने दर्शक के लिए भी नया अनुभव रहा। युवा, किशोर और बालवय दर्शक इस प्रस्तुति से अपने-अपने अंदाज में जुड़े हैं। बड़े लय और ताल का आनंद ले रहे हैं तो बच्चों ने उनसे उपज रही ध्वनि को अपनी मस्ती का माध्यम बना लिया है। उठान के बाद आगे बढ़ने से पहले पं.राममोहन महाराज बोले ‘घुंघरू बड़े मासूम हैं, माइक थोड़ा तेज कर देंगे तो इनका भला हो जाएगा।’ इतना सुनते ही परिसर ठहाकों से गूंज रहा है। ठहाके सुन महाराज बोले, मेरा काम ही यही है। कभी सीरियस हुआ ही नहीं। हंसता हूं और नाचता हूं। बस यही करता हूं।इतना कहते ही उन्होंने अलग-अलग मात्राओं वाले उठान से शुरुआत करने के बाद थाट में खड़े होने का अलग-अलग अंदाज दिखा रहे हैं। तिहाइयों को उनके मुख से सुनने हुए उसकी कठिनाई की अनुभूति रसिक कर रहे हैं। तबले के साथ घुंघरुओं से इन तहाइयों की पुनरावृत्ति सभी को चमत्कृत कर रही है। द्रुत लय में गिनती वाली तिहाइयां सांप-सीढ़ी के खेल का अहसास करा रही है। दुगुन में एक से शुरू होकर 12 मात्राओं तक जाना और चौगुन में फिर नीचे की ओर गिरना। इस पक्ष को प्रदर्शित करते समय वह पं.बिरजू महाराज की स्मृतियां दर्शकों के जेहन में कौंधाने का मौका बनाते जा रहे हैं।अब बिंदादीन महाराज की ठुमरी लखनवी अंदाज में बैठकर पेश की जा रही है। ‘डगर चलत देखो श्याम करत...’ पंक्ति का एक-एक शब्द अभिनय प्रधान भावों में प्रत्यक्ष हो रहा है। ‘श्याम धरे कलइया’ शब्द जितनी तेजी से गाए जा रहे हैं उतनी ही तेजी से उनकी मुद्रा बदलती जा रही है। देखने वाले अपलक और उत्साही भाव से सब कुछ देखते जा रहे हैं। ‘नीर भरन मैं गई पनघट को’ शब्दावली पर बैठे-बैठे ही उन्होंने ऐसे भाव दिखा दिए कि लगा वास्तव में कोई नवेली नार, सिर पर मटकी लिए मटकती जा रही है। बैठे- बैठे ही कमर का लचकना, कमनीय मुस्कान के साथ पलकों और पुतलियों से बात कहने का अंदाज। सब कुछ लुभावन।नृत्य के अंतिम चरण में पं.राममोहन महाराज ने तालियों के ताल पर तत्कार से महौल ही बदल दिया। परिसर में मौजूद हर बच्चा बूढ़ा और बड़ा तत्कार की लय में तालियों से ताल दे रहा। इसके बाद उन्होंने घूंघट के पांच अंदाज दिखाए। वह घूंघट तो सिर्फ मुद्राओं से बना था लेकिन देखने वालों को अहसास ऐसा कि मानो सच में कोई नवेली घुंघट से अपने होने वाले दूल्हे को देख कर शरमा रही है। पहले से दूसरे, दूसरे से तीसरे के बाद चौथे-पांचवें घूंघट से नवेली का शरमाना ऐसा कि हर कोई लाजवाब हो गया। तालियों के अलावा और कोई उपहार शेष रहा ही नहीं।निखर कर आया सरोद का सौंदर्यपंचम निशा की दूसरी प्रस्तुति में सरोद का सौंदर्य निखर कर सामने आया। कोलकाता से आए पं.तेजेंद्र मजुमदार ने दो वर्ष के अंतराल पर अपने प्रशंसकों की रागात्मक प्यास बुझाई। उन्होंने अप्रचलित राग नंद के वादन से निशा के प्रथम प्रहर का शृंगार किया। आलाप और जोड़ में स्वरों को समुचित विस्तार दिया। खनकदार ध्वनि कुछ विशेष स्वरों के प्राकृतिक एवं स्वाभाविक स्वरूप से थोड़ा हटकर रही। इसके बाद उन्होंने गत का यादगार वादन किया। विलंबित तीन ताल, मध्यलय झप ताल के बाद द्रुतलय तीन ताल में वादन के दौरान तबला पर पं.कुमार बोस ने भी जबरदस्त लयकारी दिखाई। बनारस घराने के तबले का तेवर दिखाते हुए पं.कुमार बोस ने अपना विशेष प्रभाव छोड़ा।बजी बांसुरी तो लगा उमड़-घुमड़े बादलतीसरी प्रस्तुति पद्मश्री पं.रोनू मजुमदार के बांसुरी वादन की रही। यह भी संयोग ही रहा कि पं.तेजेंद्र मजुमदार की भांति उनकी भी हाजिरी दो वर्ष बाद लगी। संकटमोचन दरबार में किशोरवय से शुरू हुई उनकी सांगीतिक यात्रा 36वें वर्ष में प्रौढ़ होती दिखी। जिन्होंने कभी पं.पन्नालाल बोस के बांसुरी वादन में दरबारी कान्हड़ा सुना होगा उन्हें अंदाजा हो गया कि सुर के सफर में रोनू मजुमदार कहां हैं। इसकी गवाही उन बहुसंख्य श्रोताओं की तालियां दे रही थीं जो बीते कई दशकों से समारोह के नेमी श्रोता हैं। गायिकी अंग के वादन में आलाप के बाद स्वर विस्तार गमक के साथ और भी निखरा। लाजवाब लंबी तानों के बीच लयकारी की अदाकारी भी लाजवाब रही। शुद्ध गांधार की एक श्रुति ‘ग’ के साथ आरोही-अवरोही क्रम का संतुलन वादन की विशेषता रही। उनके साथ उनके पुत्र हृषिकेश मजुमदार ने भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। तबला पर उभरते सितारे रोयान बोस ने सधी संगत की।कंकणा ने याद किया 49 साल का सफरसंगीत समारोह में गायन की स्वर्ण जयंती अगले वर्ष पूरी करने जा रहीं विदुषी कंकणा बनर्जी ने पंचम निशा का चतुर्थ संगीत पुष्प हनुमान लला को अर्पित किया। उन्होंने मध्यरात्रि में राग मालकौंस में आलाप से गायन की शुरुआत की। गायन से पहले श्रोताओं के साथ अपने 49 साल के सफर की कुछ खास यादें साझा कीं। उन्होंने कहा आज मुझे इस दरबार में श्रोताओं का इतना प्यार मिल रहा है लेकिन पहले दिन का अनुभव बिल्कुल अलग था। मैंने तानपुरा बजाते-बजाते अचानक सुर लगा दिया था तो पूरे मंदिर परिसर में सवालिया शोर होने लगा था। अब आप के बीच अधिकार पूर्वक गायन करते हुए तो अच्छा लगता ही है। यह सोच कर और भी प्रसन्नता होती है कि इस समारोह में महिलाओं के लिए रास्ता भी खुल गया। इसके बाद उन्होंने छोटा ख्याल और राग बागेश्री में बड़ा ख्याल में पारंपरिक बंदिशें सुनाईं।
लेखक के बारे में
Arvind Mishraशार्ट बायो : सांस्कृतिक समीक्षक के रूप में हिंदी पत्रकारिता में खास पहचान रखने वाले अरविन्द मिश्र अपने परिवार में तीसरी पीढ़ी के पत्रकार हैं। उनके दादा स्व.पं.जनार्दन दत्त मिश्र ‘व्यास’ ने आजादी की लड़ाई में अपनी लेखनी से देश की सेवा की। उनके पिता नवगीतकार स्व.पं.अशोक मिश्र ‘सामयिक’ ने देश के कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों में उच्च पदों पर सेवाएं दीं।
परिचय एवं अनुभव
अरविन्द मिश्र, हिंदी सांस्कृतिक पत्रकारिता का जाना पहचाना नाम है। बीते ढ़ाई दशक से अधिक समय से हिंदी पत्रकारिता की मुख्य धारा में बतौर सांस्कृतिक पत्रकार कार्यरत हैं। पत्रकारिता की शुरुआत क्राइम रिपोर्टर के रूप में हुई। दैनिक आज और अमर उजाला के लिए अर्से तक धर्म-संस्कृति की रिपोर्टिंग के साथ-साथ खेल पत्रकारिता भी की। रंगमंच, साहित्यिक मंच और संचालन विधा पर लेखन करने के साथ ही स्वयं उक्त विधाओं से जुड़े भी हैं।
करियर का सफर
अरविन्द मिश्र ने विद्यार्थी जीवन के दौरान ही काशी के सांध्यकालीन एवं साप्ताहिक समाचार पत्रों के लिए लिखना शुरू कर दिया था। वर्ष 1997 में दैनिक आज से जुड़कर मुख्य धारा की पत्रकारिता आरंभ की। आज अखबार चार वर्ष सेवा देने के बाद वर्ष 2002 में दैनिक अमर उजाला के वाराणसी संस्करण से बतौर रिपोर्टर जुड़े। वर्ष 2008 से 2012 तक अमर उजाला कॉम्पैक्ट की डेस्क और रिपोर्टिंग टीम को लीड किया। बरेली में अमर उजाला कॉम्पैक्ट की लॉन्चिंग कराई। वर्ष 2013 में दैनिक हिन्दुस्तान के पटना संस्करण से जुड़े। हिन्दुस्तान की ‘पटना लाइव’ टीम को चार वर्षों तक लीड किया। वर्ष 2018 से वाराणसी में बतौर मुख्य संवाददाता कार्यरत हैं।
शैक्षणिक पृष्ठभूमि और रिपोर्टिंग
हाईस्कूल की परीक्षा विज्ञान वर्ग के विद्यार्थी के रूप में उत्तीण करने के बाद इंटरमीडिएट की परीक्षा वाणिज्य विषय से दी। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा यूपी बोर्ड से उत्तीर्ण की। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से वर्ष 1994 में बीकॉम की पढ़ाई पूरी की। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण एम.कॉम की पढ़ाई पूरी नहीं हो सकी। बहुत ही कम समय में अरविन्द मिश्र ने अमर उजाला में सांस्कृतिक पत्रकारिता के नवीन मानदण्ड स्थापित कर दिए। इस दौरान उन्होंने ‘काशी परिक्रमा’, ‘आमने-सामने’ और ‘देखी तुम्हरी काशी’ जैसे कॉलमों के माध्यम से अपनी लेखनी को धार दी। प्रदूषण की मार झेल रही गंगा पर उन्होंने विशेष रूप से कार्य किया। गंगा पर उनके विशिष्ट लेखन से प्रभावित होकर ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगद्गुरुशंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उन्हें गंगारविन्द नाम दिया। सोशल मीडिया पर अरविन्द मिश्र इसी नाम से पहचाने जाते हैं। हिन्दुस्तान से जुड़ने के बाद अरविन्द मिश्र ने सांस्कृति पत्रकारिता में मील के कई पत्थर स्थापित किए। उन रिपोर्ट में रामनगर की रामलीला, नाटी इमली के भरत मिलाप से लेकर काशी में होने वाले धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों की अनेकानेक रिपोर्ट शामिल हैं। संकट मोचन संगीत समारोह और काशी के अति प्राचीन बेनियाबाग के इतिहास को पहली बार कलमबंद करने का श्रेय भी अरविन्द मिश्र को ही जाता है। उन्हें हिन्दुस्तान अखबार की ओर से राष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले ‘होनहार अवार्ड’ इंडिवीजुअल कैटेगरी में छह बार दिए जा चुके हैं। जिन समाचार शृंखलाओं के लिए उन्हें यह अवार्ड मिले उनमें ‘काकोरी काण्ड के नायक’, ‘मैं बेनियाबाग हूं’, ‘प्रेमचंद के बहाने’, ‘प्रेमचंद से छल’, ‘सब्जीवाला शायर’ और ‘गंगा कावेरी’ शामिल हैं। संकट मोचन संगीत समारोह, काशी तमिल संगमम, बनारस लिट् फेस्ट जैसे वृहद आयोजनों की यादगार कवरेज की कटिंग पाठकों ने सहेज कर रखी है। 23 अगस्त 2023 को चंद्रयान-3 की चंद्रमा पर सफल लैंडिंग के दिन अरविन्द मिश्र ने 23 अगस्त की तारीख को चंद्रयान दिवस के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की पहल छेड़ी। इसका नतीजा यह हुआ कि दक्षिण अफ्रीका की यात्रा से लौट कर सीधे इसरो पहुंचे प्रधानमंत्री ने इस दिन को नेशनल स्पेस डे के रूप में मनाने की घोषणा कर दी।
विशेषज्ञता
अरविन्द मिश्र निश्चित रूप से सांस्कृति पत्रकार के रूप में अपनी खास पहचान रखते हैं लेकिन मानवीय कोणों वाली स्टोरी, शिक्षा, खेल और प्रशासनिक रिपोर्टिंग में भी अपनी दक्षता प्रमाणित की है। एक सफल रिपोर्टर होने के साथ ही उन्होंने अपने आप को एक छायाकार के रूप में भी स्थापित किया। हिन्दुस्तान समाचार पत्र में पटना और वाराणसी संस्करण में सौ से अधिक फोटोग्राफ पर बाइलाइन मिल चुकी है। काशी में देवदीपावली के उत्सव की उनके द्वारा ली गई तस्वीर को हिन्दुस्तान के देशभर के सभी संस्करणों में प्रमुखता से स्थान मिल चुका है।
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