सर्वहारा साहित्यकार थे शांतिप्रिय द्विवेदी
Varanasi News - वाराणसी में पं. शांतिप्रिय द्विवेदी की साहित्यिक उपलब्धियों पर चर्चा की गई। उन्हें छायावाद का गहरा ज्ञान था और उन्होंने स्वतंत्रता पूर्व के वर्षों में इस पर महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए। उनके योगदान को अधिक महत्व नहीं मिला, जबकि वे नवगीत के प्रणेता डॉ. शंभूनाथ सिंह के साथ महत्वपूर्ण साहित्यिक चर्चाओं में शामिल रहे।
वाराणसी, मुख्य संवाददाता। पं.शांतिप्रिय द्विवेदी सही अर्थों में सर्वहारा साहित्यकार थे। उनकी गणना मुख्य रूप से निबंधकार एवं छायावादी समीक्षक के रूप में होती है। वह समर्थ कवि, उपन्यासकार, संस्मरणकार एवं आत्मकथा लेखक भी थे। ये बातें साहित्यिक पत्रिका सोच विचार के संपादक पं.नरेंद्रनाथ मिश्र ने कहीं। वह साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास की ओर से पं.विद्यानिवास मिश्र की जन्म शताब्दी पर संकल्पित ‘हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा’ शृंखला के तहत शुक्रवार को व्याख्यान दे रहे थे। अर्दली बाजार स्थित राजकीय पुस्तकालय के सभागार में हुए आयोजन में उन्होंने कहा कि द्विवेदीजी को छायावादी कविता की गहरी समझ थी।
स्वतंत्रता पूर्व के दो दशकों में छायावाद को लेकर जनसामान्य में जो ऊहापोह चल रहा था, उसमें उनका हस्तक्षेप बहुत ही मजबूत था। डॉ.भुवनेश्वर द्विवेदी ने नवगीत के ध्वजवाहक डॉ.शंभूनाथ सिंह के योगदान की चर्चा की। उन्होंने कहा कि जब-जब जहां-जहां नवगीत का उल्लेख होगा उसमें शंभूनाथ सिंह निश्चित रूप से रहेंगे। वह नवगीत के प्रणेता तथा संवाहक पुरुष हैं। अध्यक्षता करते हुए डॉ.शशिकला त्रिपाठी ने कहा कि यह विडंबना है कि जो रचनाकार पाठ्यक्रम में नहीं होते हैं उनसे हिंदी का पाठक जुड़ नहीं पता। छायावाद पर सशक्त समीक्षाएं लिखने के बावजूद शांतिप्रिय द्विवेदी को जितना महत्व मिलना चाहिए उतना नहीं मिला। विशिष्ट अतिथि डॉ.राजीव कुमार सिंह, विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ.दयानिधि मिश्रा, सुरेंद्र वाजपेई, शिवकुमार पराग, डॉ.अत्रि भारद्वाज, हिमांशु उपाध्याय, पं.सिद्धनाथ शर्मा, डॉ.रामसुधार सिंह, सुनील नारायण उपाध्याय, पवन कुमार, संतोष प्रीत, आनंद मासूम, कविंद्र नारायण, देवेंद्र पांडेय, छाया शुक्ला, गौतम अरोड़ा ‘सरस’, उषा पांडेय, अरुण केसरी, वात्सला श्रीवास्तव आदि ने काव्यपाठ किया।
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