नामवर की आलोचना में सभ्यताओं के बीच संवाद

Mar 01, 2026 08:40 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, वाराणसी
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Varanasi News - वाराणसी में नामवर सिंह की आलोचना पर संगोष्ठी में प्रमुख वक्ता प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहा कि उनकी कविताएँ और आलोचना साहित्यिक और सांस्कृतिक दायित्व का निर्वहन करती हैं। उन्होंने उत्तराधुनिकता के दृष्टिकोण से साहित्य को देखने की आवश्यकता पर बल दिया। अन्य विद्वानों ने भी इस विषय पर अपने विचार रखे।

नामवर की आलोचना में सभ्यताओं के बीच संवाद

वाराणसी, मुख्य संवाददाता। नामवर सिंह की आलोचना में सभ्यताओं के बीच संवाद दिखता है। उनकी कविता के नए प्रतिमान में आलोचना अपने पूर्ण वैभव में दिखती है। कविता के नए प्रतिमान का लेखक जितना आनंदवर्धन के साथ सहज है उतना ही इलियट के साथ भी है। ये बातें ख्यात आलोचक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कहीं। बीएचयू के हिंदी विभाग की ओर से प्रो.नामवर सिंह की जन्मशती पर आयोजित संगोष्ठी के समापन सत्र में वह मुख्य वक्ता थे। रविवार को हुए समापन सत्र में उन्होंने कहा कि नामवर सिंह जब आलोचना के स्वभाव पर बल देते हैं तब मुझे लगता है कि वे साहित्यिक और सांस्कृतिक दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।

नामवर सिंह ने उत्तराधुनिकता के नजरिए से साहित्य को देखने की आलोचना की थी। उनके अनुसार भारत के अतीत और वर्तमान को देशभाषाओं से संवाद किए बिना आप नहीं जान सकते। मुख्य अतिथि बीएचयू की कला संकाय प्रमुख प्रो. सुषमा घिल्डियाल ने कहा कि नामवर सिंह का नाम उनके माता पिता ने सोच समझकर ही रखा होगा, उनके नाम में ही ख्याति है। उन्होंने अपनी आलोचना में विभिन्न विषयों के ज्ञान को समेटा है। विशिष्ट अतिथि नवनालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि हम बौद्ध साहित्य, इतिहास, धर्म, दर्शन आदि का जितना भी गहन अध्ययन कर लें वह दृष्टि विकसित नहीं हो पाती थी जो नामवरजी अपने कुछ समय के अध्ययन में ही विकसित कर लेते थे। उनका मंचीय धर्म और व्यक्तिगत संबंधों का धर्म अलग-अलग था। मंच पर वह बेलगाम होते थे। अध्यक्षीय संबोधन में हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी ‘अनूप’ ने कहा कि नामवर सिंह असहमतियों को भी अवसर देते थे। उन्होंने नामवर सिंह रचित नवगीत भी सुनाया। स्वागत डॉ.रविशंकर सोनकर, संचालन डॉ. प्रीति त्रिपाठी और धन्यवाद ज्ञापन प्रो.आशीष त्रिपाठी ने किया। अन्य सत्रों में इन्होंने रखे विचार इससे पूर्व हुए सत्रों में प्रो.बिंदा परांजपे, डॉ.अनुज लुगुन, डॉ.मानवेंद्र प्रताप सिंह, उज्ज्वल भट्टाचार्य, श्रीलंका की डॉ.रसांगी नायक्कर, चीन से आगत डॉ.राजीव रंजन और डॉ.विवेकमणि त्रिपाठी, डॉ.नीलेश कुमार, प्रो.बलिराज पांडेय, प्रो.अवधेश प्रधान, प्रो.श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रो.कृष्णमोहन सिंह, प्रो.मनोज कुमार सिंह, प्रो.विनोद तिवारी, प्रो.आशीष त्रिपाठी, प्रो.प्रभाकर सिंह, प्रो.अनिल त्रिपाठी, प्रो.बसंत त्रिपाठी, प्रो. नीरज खरे, डॉ.रामाज्ञा राय, डॉ.किंगसन सिंह पटेल, शिव कुमार पराग, डॉ.योगेश प्रताप शेखर, डॉ.मोतीलाल, डॉ.प्रभात कुमार मिश्र, डॉ. सत्यप्रकाश सिंह, डॉ.दीपशिखा सिंह, डॉ.विवेक सिंह, डॉ.अवनीश कुमार मिश्र, डॉ.सुशील सुमन आदि ने विचार व्यक्त किए।

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