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पटना की रीता के सरोद से काशी में बरसा माधुर्य

सरोद चाहे सर्वप्राचीन वाद्य वीणा से विकसित हुआ हो या अफगान के रुबाब की छाया में बढ़ा हो लेकिन जब सधे हाथों में होता है तो अपने नाम के अर्थ की...

पटना की रीता के सरोद से काशी में बरसा माधुर्य
हिन्दुस्तान टीम,वाराणसीFri, 01 Mar 2024 02:15 AM
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वाराणसी, प्रमुख संवाददाता।
सरोद चाहे सर्वप्राचीन वाद्य वीणा से विकसित हुआ हो या अफगान के रुबाब की छाया में बढ़ा हो लेकिन जब सधे हाथों में होता है तो अपने नाम के अर्थ की अनुभूति कराता है। गुरुवार की शाम भी कुछ ऐसा ही हुआ। शिल्पायन द म्यूजिक हब के काल्विंट सभागार में पटना की रीता दास के सरोद ने अपने नाम के अर्थानुसार माधुर्य से ओतप्रोत गीत सुनने का आभास कराया।

‘काशी संगीत संकल्प की कड़ी में विदुषी रीता दास के सरोद के गहन और चिंतनशील स्वरों ने श्रोताओं को पर्याप्त सुकून दिया। रीता दास ने राग रागेश्री की अवतारणा की। आलाप के बाद विलंबित और द्रुत गतों का वादन किया। इस मधुर राग में शुद्ध और कोमल दोनों निषाद का इस्तेमाल स्पष्ट हुआ। आरोह के दौरान शुद्ध ‘नी और अवरोह में कोमल ‘नी का स्वतंत्र अस्तित्व सुधि श्रोताओं ने महसूस किया।

यह कहना गलत नहीं होगा कि आरोह में लगने वाले पांच और अवरोह में लगने वाल छह स्वर सधे अंदाज में लगाए गए जो कलाकार की परिपक्वता के प्रमाण रहे। अंत में रीता दास ने इसी राग में धुन से वादन को विराम दिया। तबला वादन में रजनीश तिवारी ने खास प्रभाव छोड़ा। हालांकि श्रोता उस वक्त थोड़े असहज जरूर हो गए जब सरोद पर आलाप बजने के बाद संगत शुरू करने से पहले उन्होंने तबला मिलाना शुरू कर दिया।

इससे पूर्व शिल्पायन के प्रशिक्षु कलाकारों ने रूपम, अभिषेक और अमित ने संकल्प गीत की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम की विराम प्रस्तुति युवा कलाकार प्रियांशु घोष का शास्त्रीय गायन रहा। उन्होंने राग वसंत में विलम्बित तीनताल में ख़्याल ‘नबी के दरबार, छोटा ख़्याल ‘पिया संग खेल तथा ‘शंकर हर जटा जूट का सुमधुर गायन किया। समापन भजन से किया। उनके साथ तबला पर कृष्ण कुमार उपाध्याय एवं हारमोनियम पर हर्षित उपाध्याय ने संगत की।

भेंट की पुस्तक

पटना की सरोद वादक विदुषी रीता दास एवं उनकी बहन रीना सोपम ने अपने पिता प्रो. सीएल दास की पुस्तक ‘समय से परे की प्रति काशी संगीत संकल्प के अध्यक्ष प्रो. राजेश शाह, शिल्पायन के सचिव पं. देवाशीष डे, प्रख्यात तबला वादक पं. पूरन महाराज को भेंट की। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रागिनी सरना ने किया।

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