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नेट की दुनिया ने हकीकत की मौज छिनी

वाराणसी। वरिष्ठ संवाददाता वर्चुअल दुनिया के बढ़ते जंजाल ने हकीकत की दुनिया का रंग बदरंग करता जा रहा है। इंटरनेट के इस युग में पारम्परिक खेल की दुनिया से बच्चे अछूते होते जा रहे हैं। इक्कड़-दुक्कड़, लूडो आदि खेल से ग्रीष्मावकाश गुलजार रहता था। गंगा दशहरा के पूर्व गुड्डा-गुडि़या की विवाह रस्म, पारम्परिक मुहल्लों और इनके रहने वालों के लिए उत्सव का आधार होते थे, अब ढूंढने पर भी विरले ही मिलते हैं। गंगा दशहरा चार जून को है। इस दिन मां गंगा की गोद में गुड्डा-गुडि़या को बहाये जाने की परम्परा रही है। इसके पूर्व बाकायदा वर और कन्या पक्ष बनकर गुड्डा-गुडि़या के बीच विवाह की रस्में पूरी की जाती रही है। विवाह रस्म मनाने के बाद इनकी विदाई गंगा में की जाती थी। हालांकि भदैनी में आज भी यह परम्परा कायम है। परम्परा को किसी तरह जिंदा रखी मंजू देवी ने बताया कि पुरखों से यह परम्परा हमें मिली है। मान्यता है इस तरह के विवाह कराने के बाद घर, परिवार में मांगलिक कार्यों में अवरोध नहीं होता है। घर की औरतों और बच्चों के बीच विवाह की मौज दिखी।कपड़े की गुडि़या और गुड्डा के बीच विवाह पूरी शान-शौकत के साथ हुई। हल्दी, मटमगरा,सेहरा बंधन, सिंदूर दान, सात फेरा हुआ। भोजन के लिए पंगत भी लगी। बारात में घराती-बराती दोनों पक्ष जमकर ठुमके भी लगाए। इस रस्म में मुख्य रूप से सोनल, सुनीता, संगीता, रेनू, वर्षा, स्वीटी, नंदिनी, शिल्पी, सलोनी, सुरभि, रागिनी, अंश, ध्रुव, सुमन, बबलू, नीरज, आंजनेय, अनुज, तनूज आदि शामिल हुए। कर्मकाण्डी पं. रत्नेश त्रिपाठी ने बताया कि ऐसा शास्त्रोक्त तो नहीं है लेकिन चली आ रही परम्पराओं ने इसे सहेजा है। गुड्डा-गुड्डी का विवाह, घर में मांगलिक कार्य का श्रीगणेश हो इसके लिए किया जाता है। कई परिवारों में लम्बे समय से मांगलिक कार्यक्रम का अभाव रहता है तो वह ऐसे कार्यक्रम करते हैं।

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