भीमचंडी पहुंचा पंचकोशी यात्रा का दूसरा पड़ाव, आशुतोषानंद ने बताया आध्यात्मिक महत्व
Varanasi News - वाराणसी की पंचकोशी यात्रा श्रद्धा और भक्ति के साथ आगे बढ़ रही है। महामंडलेश्वर आशुतोषानंद गिरि ने भीमचंडी धाम के धार्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। यहां पूजा करने से मनुष्य को विकारों से मुक्ति और आत्मिक शांति मिलती है। क्षेत्रवासी श्रद्धालुओं का स्वागत कर रहे हैं और भक्तिमय माहौल बना हुआ है।

वाराणसी। काशी की विश्वप्रसिद्ध पंचकोशी यात्रा इन दिनों श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उत्साह के साथ आगे बढ़ रही है। कैलाश मठ के महामंडलेश्वर आशुतोषानंद गिरि ने यात्रा के दूसरे पड़ाव भीमचंडी पहुंचने पर सैकड़ों श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए भीमचंडी धाम के धार्मिक, पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि काशी की पंचकोशी यात्रा का दूसरा पड़ाव चंडिकेश्वर महादेव एवं भीमचंडी मंदिर है, जिसका उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड में मिलता है। यह स्थल मां दुर्गा के उग्र एवं शक्तिशाली स्वरूप को समर्पित माना जाता है। मान्यता है कि यहां दर्शन-पूजन करने से मनुष्य को काम, क्रोध, लोभ और अन्य विकारों से मुक्ति मिलती है।
उसमें आत्मिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।महामंडलेश्वर ने बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार अज्ञातवास के दौरान पांडवों के साथ द्रौपदी ने इस स्थान पर पूजा-अर्चना की थी। मंदिर परिसर के समीप स्थित पवित्र गंधर्व सागर कुंड का भी विशेष धार्मिक महत्व है, जिसका संबंध प्राचीन दिव्य कथाओं से जुड़ा माना जाता है। उन्होंने कहा कि पंचकोशी यात्रा के प्रथम पड़ाव कर्दमेश्वर से लगभग 14 किलोमीटर की पदयात्रा कर जब श्रद्धालु भीमचंडी पहुंचते हैं, तो यहां की दिव्यता, आध्यात्मिक वातावरण और मां भगवती की कृपा उन्हें नई ऊर्जा एवं मानसिक शांति प्रदान करती है। यात्रा के दौरान भक्तिमय माहौल देखने को मिला। क्षेत्रवासी श्रद्धालुओं के स्वागत में जुटे रहे, वहीं छोटे-छोटे बटुक भगवान भोलेनाथ के भजनों पर झूमते और हर-हर महादेव के जयघोष लगाते हुए पदयात्रा में शामिल हुए।
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