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संस्कृत की रक्षा से ही संस्कृति की रक्षा संभव : शंकराचार्य

द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती

साहित्य समाज का दर्पण होता है इसलिए संस्कृतियां साहित्य पर अवलम्बित होती हैं। भारत का वह समग्र साहित्य जिस पर भारतीय संस्कृति अवलम्बित है वह संस्कृत में संरक्षित है अत: संस्कृत के बिना भारतीय संस्कृति की रक्षा असम्भव है।

यह बातें द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती ने सोमवार को बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहीं। उन्होंने कहा कि काशी के विद्वानों ने अपना तन-मन-धन सब कुछ न्योछावर करके संस्कृत की रक्षा की है। इसके लिए वे अभिनन्दन के पात्र हैं। उन्होंने नवागंतुक विद्यार्थियों से कहा कि आप यह न सोचें कि आप गरीब घर के हैं इसलिए अंग्रेजी नहीं पढ़ पाए और विवशता के कारण संस्कृत पढ़ना पड़ा। बल्कि यह सोचें कि आपका कोई पूर्वजन्म का पुण्य था जो आप भारत में उत्पन्न होकर भारत की ही आत्मा को स्थापित करने वाली संस्कृत के अध्येता बने हैं ।

इससे पूर्व तीन दिवसीय सम्मेलन का शुभारंभ राज्य मंत्री नीलकंठ तिवारी ने किया। राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठम, तिरूपति के कुलपति आचार्य मुरलीधर शर्मा, डा. संपूर्णानंद संस्कृति विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. यदुनाथ प्रसाद द्विवेदी, ब्रह्मोस एयरोस्पेस, नई दिल्ली के परामर्शदाता डा. वोरिस जीहोरूल्को व काशी विद्धत परिषद के अध्यक्ष आचार्य रामयत्न शुक्ल ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्जवलन किया। 

तीन दिवसीय सम्मेलन में देश विदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों एवं शोध शिक्षण संस्थानों के साथ ही अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मनी, नेपाल आदि देशों के प्रतिष्ठित विद्वान सहभागिता कर रहे है। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता संकाय प्रमुख प्रो. चंद्रमा पाण्डेय ने की। सम्मेलन के द्वितीय सत्र में व्याकरण विभाग द्वारा जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज का अभिनंदन किया गया। अतिथियों का स्वागत व्याकरण विभागाध्यक्ष प्रो. भगवत शरण शुक्ल ने किया। इस अवसर पर प्रो. राम नारायण द्विवेदी, प्रो. उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी, प्रो. विनय कुमार पाण्डेय आदि उपस्थित थे।

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