फुलवा मरिगा रह गई बास: प्रो. काशीनाथ

Feb 27, 2026 01:19 am ISTNewswrap हिन्दुस्तान, वाराणसी
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Varanasi News - वाराणसी में 'नामवर सिंह : आलोचना और वैचारिकता' विषय पर त्रि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू हुई। वरिष्ठ कथाकार प्रो. काशीनाथ सिंह ने कहा कि नामवर सिंह का योगदान अद्वितीय है और उनके कक्षाओं में छात्रों की भारी भीड़ होती थी। कार्यक्रम में कई प्रमुख विद्वानों ने भाग लिया और नामवर सिंह की साहित्यिक उपलब्धियों की सराहना की।

फुलवा मरिगा रह गई बास: प्रो. काशीनाथ

वाराणसी, वरिष्ठ संवाददाता। ‘फुलवा मरिगा रह गई बास’ यानी फूल तो नहीं रहा मगर उसकी सुगंध अब भी है। वरिष्ठ कथाकार प्रो. काशीनाथ सिंह ने आलोचक और समीक्षक प्रो. नामवर सिंह के लिए यह भाव व्यक्त किए। बीएचयू के हिंदी विभाग के प्रेमचंद सभागार में गुरुवार को शुरू हुई ‘नामवर सिंह : आलोचना और वैचारिकता’ विषयक त्रि-दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी को वह संबोधित कर रहे थे। प्रख्यात आलोचक के अनुज प्रो. काशीनाथ सिंह ने कहा कि नामवर बनारस में न होते तो नामवर न होते। उन्हें दिल्ली ने नामवर नहीं बनाया। नामवर सिंह की कक्षाओं के बारे में जाने बिना उन्हें पूरी तरह नहीं जाना जा सकता।

क्लास में जगह न होने से विद्यार्थी खिड़की और दरवाजों के पास खड़े होकर सुना करते थे। उनकी कक्षाओं में अन्य विषयों के विद्यार्थी भी यह देखने आते थे कि क्या पढ़ा रहे हैं जो इतनी भीड़ है। उद्घाटन वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ कवि अरुण कमल ने कहा कि नामवर सिंह की पूरी आलोचना साहित्य की श्रेष्ठता को पहचानने का प्रयास है। उनके अनुसार श्रेष्ठ कवि वक्तव्य देने के बजाय क्षण की सृष्टि करता है। भाव सबलता और बहुलता किसी कविता को श्रेष्ठ बनाते हैं। मुख्य अतिथि समाजविज्ञानी प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि दिल्ली शहर की कोई भी गोष्ठी नामवर सिंह के बिना संभव नहीं होती थी। वह सभा-सेमिनारों में दंगल की तरह चुनौती दिया करते थे। उनकी रचनाओं में सर्वकालिक बुद्धिजीवी और समर्पित शिक्षक का तेज़ दिखाई पड़ता है। वरिष्ठ कथाकार और तद्भव के संपादक अखिलेश ने कहा कि हिंदी की लगभग हर बहस में नामवर सिंह उपस्थित रहे। उन्होंने अपने नये-नये पाठ्यक्रमों के जरिये हमारी भाषा को जो सम्मान दिलाया वह महत्वपूर्ण है। स्वागत हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ अनूप ने किया। संचालन प्रो. नीरज खरे और धन्यवाद प्रो. प्रभाकर सिंह ने दिया। कार्यक्रम में प्रो. बलिराज पांडेय, प्रो. अवधेश प्रधान, प्रो. सदानंद शाही, प्रो. राजकुमार, प्रो. शशिकला त्रिपाठी, प्रो. विनय कुमार सिंह, प्रो. श्रद्धा सिंह, प्रो. कृष्णमोहन पांडेय, प्रो. श्रीप्रकाश शुक्ल, प्रो. प्रभाकर सिंह, प्रो. कृष्णमोहन सिंह, प्रो. बसंत त्रिपाठी, डॉ. रामाज्ञा राय, पल्लव, डॉ. किंगसन सिंह पटेल, अनीता गोपेश, डॉ. सूर्यनारायण, डॉ. मोतीलाल सहित शोधार्थियों और विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।

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