
दो सौ वर्षों में पहली बार काशी में दंडक्रम पारायण
Varanasi News - काशी में बीते 200 वर्षों में पहली बार युवा वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा का संपूर्ण दंडक्रम पारायण किया। 29 नवंबर को महमूरगंज स्थित शृंगेरी मठ में उनका नागरिक अभिनंदन होगा, जिसमें सोने का कंगन और धनराशि का आशीर्वाद दिया जाएगा।
वाराणसी, मुख्य संवाददाता। काशी में बीते दो सौ वर्षों में पहली बार शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा का संपूर्ण एकाकी कंठस्थ दंडक्रम पारायण करने वाले युवा वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे घनपाठी का नागरिक अभिनंदन 29 नवंबर को महमूरगंज स्थित शृंगेरी मठ में किया जाएगा। दो सौ वर्ष पूर्व नासिक के वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव दंडक्रम पारायण किया था। यह इतनी कठिन विधा है कि सामान्य वैदिक इसके बारे में सोच भी नहीं सकते। यह जानकारी दंडक्रम पारायणकर्ता अभिनंदन समिति के पदाधिकारियों चल्ला अन्नपूर्णा प्रसाद, चल्लासुब्बाराव, अनिल किंजवडेकर, चंद्रशेखर द्रविड़ घनपाठी, प्रो. माधव जर्नादन रटाटे एवं पांडुरंग पुराणिक ने शुक्रवार को महमूरगंज स्थित शृंगेरी मठ में पत्रकारों को दी।

पदाधिकारियों ने बताया कि दंडक्रम पारायण का शुभारंभ गत 12 अक्तूबर को रामघाट स्थित सांगवेद विद्यालय में महाराष्ट्र के वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे ने किया था। वह नित्य साढ़े तीन से चार घंटे पाठ करते हैं। पाठ की पूर्णाहुति पर 29 नवंबर की शाम 4 बजे रथयात्रा से भव्य शोभायात्रा निकाली जाएगी। जो शृंगेरी मठ पहुंचकर नागरिक अभिनंदन समारोह में परिवर्तित हो जाएगी। इस अवसर पर शृंगेरी पीठ के शंकराचार्य की ओर से सोने का कंगन और एक लाख ग्यारह हजार एक सौ सोलह रुपये आशीर्वाद स्वरूप दिये जाएंगे। अभिनंदन समारोह की अध्यक्षता बीएचयू के आजीवन आचार्य हृदयरंजन शर्मा करेंगे। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो.राजाराम शुक्ल होंगे। विशिष्ट अतिथि अन्नपूर्णा मंदिर के महंत शंकर पुरी, हरिद्वार के स्वामी महेश चैतन्य ब्रह्मचारी सारस्वत अतिथि होंगे। क्या है दंडक्रम पारायण पं.चंद्रशेखर द्रविड़ घनपाठी ने बताया कि दंडक्रम पारायण में पदों का विशिष्ट स्वर शैली में सीधा और उल्टा पाठ एक साथ किया जाता है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने बताया कि जैसे हम सीधी और उल्टी गिनती करते हैं उसी प्रकार दंडक्रम पारायण में होता है। इसकी विशिष्टता यह कि जैसे एक से दूसरा पद गाया गया। आगे बढ़ने के लिए दूसरा और पहला पद फिर से गाया जाता है। अगले क्रम में एक, दो और तीन पद गाए जाते हैं। फिर तीसरा, दूसरा और पहला पद गाने के बाद चौथा पद गाया जाता है। चौथे पद के बाद पुन: चौथे पद को उल्टा गाने के बाद तीसरा, दूसरा और पहला पद गाया जाता है। शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन शाखा के 225 पदों का दंडक्रम में पारायण करते हुए करीब 25 हजार पद हो जाते हैं। इसमें एक करोड़ से अधिक शब्द समाहित होते हैं।

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