
संगमम्: काशी में प्रगट होता है आध्यात्मिक सत्य: प्रो. आचार्य
Varanasi News - काशी-तमिल संगमम् 4 के तहत बीएचयू में तमिल शिक्षकों का भव्य स्वागत किया गया। शैक्षणिक सत्र में काशी और तमिल संस्कृतियों की आध्यात्मिक एवं दार्शनिक परंपराओं पर चर्चा हुई। मुख्य अतिथि प्रो. राजेश्वर आचार्य ने काशी की शाश्वतता और दक्षिण भारत के मंदिरों की विशेषताओं पर प्रकाश डाला।
वाराणसी, वरिष्ठ संवाददाता। काशी-तमिल संगमम् 4 के अंतर्गत तमिल शिक्षकों के दल का शुक्रवार को बीएचयू के कमच्छा स्थित शिक्षा संकाय में भव्य स्वागत हुआ। ‘काशी और तमिलनाडु की आध्यात्मिक एवं दार्शनिक परंपराएं’ विषयक शैक्षणिक सत्र में काशी और तमिल संस्कृतियों और शिक्षण परंपराओं पर चर्चा हुई। मुख्य अतिथि पद्मश्री प्रो.राजेश्वर आचार्य ने काशी की आध्यात्मिक और दार्शनिक परंपराओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने अगस्त्य मुनि की उस कथा का उल्लेख किया, जब उन्होंने विन्ध्याचल पर्वत को कहा था कि वह उनके दक्षिण से लौटने तक झुका रहे। उन्होंने कहा कि काशी इसलिए शाश्वत है क्योंकि यहां आने वाला व्यक्ति अपना अहंकार त्याग देता है और उसके भीतर आध्यात्मिक सत्य प्रकट होने लगते हैं।
दक्षिण भारत की अपनी यात्रा को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वहां के मंदिरों के बारे में सही कहा गया है कि ‘वहां मंदिर में मूर्तियां नहीं बल्कि मूर्तियों से मंदिर बनाये गए हैं।’ योगी रामसूरत कुमार आश्रम की अन्हीता सिद्धवा ने योगी रामसुरत कुमार की 1959 में दक्षिण भारत की यात्रा का उल्लेख किया। कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि यह संगम समानता का नहीं, बल्कि समानताओं, समानांतर और साझी विशेषताओं को समझने का अवसर है, जो काशी और तमिल संस्कृतियों के बीच पहले से मौजूद हैं। राष्ट्रीय एकता और भारतीय पहचान की सामूहिक पुष्टि पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि यह विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। आईआईटी बीएचयू के प्रो. राकेश कुमार मिश्र ने प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए कहा कि काशी तमिल संगमम् के माध्यम से हुए बौद्धिक आदान-प्रदान ने दोनों क्षेत्रों को समृद्ध किया है। शिक्षा संकाय की प्रमुख प्रो. अंजलि बाजपेयी ने सत्र के समापन में कहा कि एनईपी 2020 की बहुविषयी और समावेशी दृष्टि सांस्कृतिक एवं बौद्धिक संवाद को और प्रबल बनाएगी। संचालन आईआईटी-बीएचयू की डॉ. भुवनेश्वरी बी. ने किया।

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