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हिन्दी-संस्कृत की डिग्री लेने सात समुंदर पार से आ रहे काशी

BHU

मौजूदा समय में विदेशों में संस्कृत और हिन्दी सीखने और उसे समझने की चाह तेजी से बढ़ रही है। इस समय बनारस में 70 अगल-अगल देशों के 190 छात्र हिन्दी और संस्कृत का ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। इन्होंने बनारस में रहने के लिए एक से तीन साल का एजुकेशन वीजा लिया हुआ है। इनमें यूएसए के युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा है। 

एलआईयू की रिपोर्ट के अनुसार एजुकेशन वीजा पर यहां आने वाले छात्रों की संख्या हर साल अलग-अलग होती है। कुछ साल पहले तक यह आंकड़ा 40 से 50 ही होता था। लेकिन वर्तमान में केवल यूएसए के 35 छात्र यहां शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।  

डिग्री पाने की चाह 
काशी आने वाले विदेशी युवाओं को सर्टिफिकेट या डिप्लोमा कोर्स के बजाय तीन साल के डिग्री कोर्स की चाह ज्यादा है। इसमें हिन्दी और संस्कृत की डिग्री लेने वालों की संख्या ज्यादा है। माना जा रहा है कि विदेश में तकनीकी व अन्य विषयों की पढ़ाई की बेहतर व्यवस्था है, लेकिन संस्कृत और हिन्दी के लिए उन्हें काशी का रुख करना पड़ रहा है। 

विज्ञान पर संस्कृत भारी 
नासा से अतंरिक्ष में भेजे जाने वाले प्रक्षेपण यान में अगर किसी अन्य भाषा का प्रयोग किया जाए तो अर्थ बदलने का खतरा रहता है लेकिन संस्कृत के साथ ऐसा नहीं है। बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के डीन प्रो. चन्द्रमा पाण्डेय का कहना है कि इसी कारण नासा के वैज्ञानिकों को संस्कृत का अच्छा ज्ञान है। वे संस्कृत का प्रयोग करते हैं। क्योंकि इस भाषा के साथ अर्थ बदलने का खतरा नहीं होता। इसलिए संस्कृत को सीखने की चाह विदेशियों में भी बढ़ रही है।  

भारतीय संस्कार और संस्कृत से बढ़ रहा लगाव 
प्रो. चन्द्रमा पाण्डेय का कहना है कि विदेशियों में यह भावना है कि जो संस्कार और संस्कृति संस्कृत में है वह दुनिया की किसी अन्य भाषा में नहीं। मृत्यु के बाद दूसरे लोक की कल्पना, एक पत्नी और एक पति धर्म का पालन और वेदों का ज्ञान उन्हें इस ओर आकर्षित कर रहा है। यही कारण है कि संस्कृत और हिन्दी जैसे विषयों में विदेशियों की रुचि बढ़ती जा रही है। 

इन देशों के छात्र हैं ज्यादा 
यूएसए- 35
म्यामार-26
कोरिया-16
श्रीलंका-14
थाइलैंड-9

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  • Web Title:Foreign Students come to Kashi take Hindi-Sanskrit Degree