दो उपनामों से साहित्य की दो धाराओं को जीते थे ‘चोंच’

हिन्दुस्तान, वाराणसी
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वाराणसी में, वरिष्ठ कवि शिवकुमार 'पराग' ने पं. कांतानाथ पांडेय और पं. द्विजेंद्रनाथ मिश्र 'निर्गुण' पर चर्चा की। समारोह में चोंच की रचनावली का लोकार्पण हुआ। 'पराग' ने कांतानाथ को हास्य साहित्य का बादशाह बताया। शिवकुमार 'पराग' को उनकी कृति 'एक शोर है मेरे भीतर' के लिए सार्थवाह सम्मान-2026 से नवाजा गया।

दो उपनामों से साहित्य की दो धाराओं को जीते थे ‘चोंच’

वाराणसी, मुख्य संवाददाता। पं.कांतानाथ पांडेय अपने दो उपनामों से साहित्य की दो धाराओं को जीते थे। एक विधा में हास्य की पराकाष्ठा तो दूसरी में हाशिए पर रहने वालों की चिंता। कई बार तो यह अंतर करना मुश्किल हो जाता कि ‘चोंच’ और ‘राजहंस’ दोनों एक ही व्यक्ति हैं।

पं. कांतानाथ पांडेय और पं. द्विजेंद्रनाथ मिश्र

ये बातें वरिष्ठ कवि शिवकुमार ‘पराग’ ने कहीं। वह पं.विद्यानिवास मिश्र जयंती वर्ष के अंतर्गत गुरुवार को विद्याश्री न्यास की ओर से आयोजित व्याख्यानमाला ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा’ की 14वीं कड़ी में मुख्य वक्ता थे। अर्दली बाजार स्थित राजकीय पुस्तकालय के सभागार में हुआ यह सत्र पं.कांतानाथ पांडेय ‘चोंच’ एवं पं.द्विजेंद्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’ पर केंद्रित था।

कांतानाथ पांडेय की रचनाएँ

समारोह में कांतानाथ पांडेय चोंच की रचनावली के दो खण्डों का लोकार्पण किया गया। ‘पराग’ ने कहा कि काशी की हास्य परंपरा की पंच महाविभूतियों में उनका विशिष्ट स्थान है। वह ‘चोंच’ और ‘राजहंस’ दो उपनाम से लिखते थे। ‘चोंच’ नाम से लिखा गया उनका हास्य उच्चकोटि का है। उसमें अश्लीलता का कोई स्थान नहीं था। वह पैरोडी लेखन के बादशाह माने जाते थे। ‘राजहंस’ नाम से लिखा गया उनका साहित्य अत्यंत गंभीर है। साहित्यकार होने के साथ ही उन्होंने शिक्षक और प्रशासक के रूप में भी उल्लेखनीय योगदान किया।

पं. द्विजेंद्रनाथ मिश्र 'निर्गुण'

उमाशंकर चतुर्वेदी ‘कंचन’ ने कथाकार पं.द्विजेंद्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’ को कालजयी रचनाकार बताते हुए कहा कि तत्कालीन वामपंथी समीक्षकों ने उनके साहित्य को अपेक्षित महत्व नहीं दिया। इसके बावजूद हिन्दुस्तान, धर्मयुग, कादम्बिनी, सारिका और माया जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं लगातार प्रकाशित होती रहीं। पाठकों का बड़ा वर्ग उनसे जुड़ा रहा। ‘निर्गुण’ भारतीय परिवेश, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं के सशक्त कथाकार थे। अध्यक्षता करते हुए डॉ. उदय प्रताप सिंह ने कहा कि ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ एक सार्थक अभियान है। इसके माध्यम से समय की धुंध में खो चुके साहित्यकारों को पुनःप्रकाश में लाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है।

कार्यक्रम की विशेषताएँ

स्वागत वक्तव्य में विद्याश्री न्यास के सचिव साहित्य भूषण डॉ.दयानिधि मिश्र ने कहा कि हिंदी की धरोहर का यह 14वां पुष्प है। आज तक काशी के कुल 28 रचनाकारों पर चर्चा की जा चुकी है। आरंभ में सरस्वती वंदना गिरीश पांडेय ‘काशिकेय’, संचालन सूर्यकांत त्रिपाठी तथा धन्यवाद ज्ञापन सोच-विचार पत्रिका के संपादक पं.नरेंद्रनाथ मिश्र ने किया। इस अवसर पर डॉ.रामसुधार सिंह, प्रकाश उदय, पवन कुमार शास्त्री, शशिकला पांडेय, ओम धीरज, प्रो.श्रद्धानंद, नवगीतकार पं.हिमांशु उपाध्याय और चोंचजी की पुत्री तपस्या उपाध्याय की उपस्थिति रही।

शिवकुमार पराग को सार्थवाह सम्मान

वाराणसी। राजकीय जिला पुस्तकालय में आयोजित समारोह में हिंदी के गीतकार शिवकुमार ‘पराग’ को उनकी कृति ‘एक शोर है मेरे भीतर’ के लिए सार्थवाह सम्मान-2026 प्रदान किया गया। वरिष्ठ साहित्यकार रामेश्वर त्रिपाठी एवं उनकी संस्था की ओर से आयोजित कार्यक्रम में उन्हें प्रशस्ति पत्र और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। अध्यक्षता कवि श्रीप्रकाश शुक्ल ने की। इस अवसर पर मदन कश्यप, वरिष्ठ कथाकार डॉ.मुक्ता, प्रो.सुरेंद्र प्रताप, रत्नशंकर पांडेय, नरेंद्र मिश्र, प्रो.सुरेंद्र प्रताप, डॉ.विन्ध्याचल यादव, नरेंद्रनाथ मिश्र, डॉ.प्रकाश उदय, डॉ.आनंद प्रकाश तिवारी, डॉ.उमेश प्रसाद सिंह, रामजी यादव आदि उपस्थित रहे।

सामान्य प्रश्न

पं. कांतानाथ पांडेय के उपनाम क्या हैं?
पं. कांतानाथ पांडेय के उपनाम 'चोंच' और 'राजहंस' हैं।
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