
संगमम्: नदी-तालाब में नहाकर पूछते हैं ‘गंगा-स्नानम् आच्चा’
Varanasi News - दक्षिण भारत में 'गंगा-स्नानम् आच्चा' की परंपरा प्रचलित है, जो कार्तिक कृष्णपक्ष में मनाई जाती है। लोग चतुर्दशी तिथि पर नदियों और तालाबों में स्नान करते हैं, मान्यता है कि इस दिन उबटन करने से गंगा स्नान का पुण्य मिलता है। इसके अगले दिन दीपावली का उत्सव मनाया जाता है।
वाराणसी, मुख्य संवाददाता। दक्षिण भारत में एक खास दिन नदी-तालाब में नहाकर ‘गंगा-स्नानम् आच्चा’ (गंगा स्नान किया) पूछने की लौकिक परंपरा अब भी प्रचलन में है। मां गंगा की सर्वभारतीय स्वीकार्यता को बल देने वाली यह परंपरा कार्तिक कृष्णपक्ष में निभाई जाती है। निशाव्यापिनी चतुर्दशी तिथि पर चंद्रोदय के बाद से सूर्योदय के पहले तक लोग निवास से आसपास के तालाबों, नदियों में स्नान करते हैं। स्नान से पहले और बाद में एक-दूसरे से पूछते हैं ‘गंगा-स्नानम् आच्चा’? उनका मानना है कि इस दिन सूर्योदय से पूर्व सरसों का उबटन लगाकर किसी भी जलधारा में स्नान करने से काशी में गंगा स्नान के पुण्य की प्राप्ति होती है।

घर के सभी सदस्य इसी विधि से स्नान कर, शुद्ध होकर नए वस्त्र धारण करते हैं। यह परंपरा निभाने के अगले दिन अमावस्या तिथि पर दीपावली का उत्सव मनाया जाता है। उत्तर भारत में दीपावली का आधार भगवान श्रीराम का रावण विजय के उपरांत अयोध्या लौटना है। वहीं दक्षिण भारत में दीपावली भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। श्रीकृष्ण ने कार्तिक अमावस्या को ही नरकासुर का वध कर मानवों को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई थी। विषय विशेष डॉ.राधाकृष्ण गणेशन दक्षिण भारत में प्रचलित मान्यता का जिक्र करते हुए कहते हैं कि जनता की त्राहि-त्राहि सुनकर श्रीकृष्ण ने नरकासुर को युद्ध के लिए ललकारा। अन्ततः श्रीकृष्ण की विजय हुई। आसन्नमृत्यु देखकर नरकासुर को अपने कुकृत्यों का भान हुआ। उसने भगवान् श्रीकृष्ण से वरदान मांग लिया कि यह दिन मृत्यु-शोक के लिए प्रसिद्ध न रहकर, बुराई के अंत के रूप में प्रसिद्ध हो। तब से ही दक्षिण भारत के लोग नरकासुर वध के उपलक्ष्य में दीपावली मनाते आ रहे हैं।

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