सावधान! स्मार्टफोन की लत बच्चों में बढ़ा रही ऑटिज्म का खतरा
Unnao News - उन्नाव में विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना के बाद बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के मामले तेजी से बढ़े हैं। हर 100 में से एक बच्चा इस समस्या का शिकार है। स्मार्टफोन की लत बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित कर रही है। अभिभावकों को बच्चों के असामान्य व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए।

उन्नाव। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जिस स्मार्टफोन को हम बच्चों को चुप कराने का साधन समझते हैं, वही उनके मानसिक विकास का दुश्मन बन रहा है। जिला अस्पताल के विशेषज्ञों के अनुसार, कोरोना काल के बाद से बच्चों में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। साल 2025 के आंकड़े बताते हैं कि हर 100 में से एक बच्चा इस समस्या का शिकार है। क्या है ऑटिज्म और क्यों है खतरनाक?ऑटिज्म एक न्यूरोडेवलपमेंटल समस्या है, जो जन्म के शुरुआती वर्षों (विशेषकर 2 से 5 वर्ष) में दिखाई देने लगती है। मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. अनुराग सेंगर बताते हैं कि ऑटिज्म से पीड़ित बच्चे बाहरी दुनिया से कट जाते हैं।
स्मार्टफोन की लत उन्हें 'वर्चुअल वर्ल्ड' का आदी बना देती है, जिससे उनका वास्तविक सामाजिक विकास रुक जाता है।डॉक्टर की रायस्मार्टफोन के लती बच्चे फोन दूर होने पर उदासीन और चिड़चिड़े हो जाते हैं। यह धीरे-धीरे उनके व्यवहार का हिस्सा बन जाता है, जिससे वे अपनी ही उम्र के बच्चों से मेलजोल नहीं कर पाते। - डॉ. अनुराग सेंगर, मनोरोग विशेषज्ञइन लक्षणों को न करें नजरअंदाजअभिभावक अक्सर बच्चों के असामान्य व्यवहार को सामान्य समझकर टाल देते हैं, जिससे समस्या गंभीर हो जाती है। यदि आपके बच्चे में निम्नलिखित लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें1- नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया न देना: बच्चा अपनी धुन में मग्न रहता है।2-अकेलेपन का शौक: दूसरे बच्चों के साथ खेलने के बजाय अकेले रहना पसंद करना।3- बोलने में देरी: अपनी बात कहने में कठिनाई होना या बहुत कम बोलना।4-दोहराव: एक ही शब्द या गतिविधि (जैसे हाथ हिलाना या घूमना) बार-बार करना।5- नकल न कर पाना: बड़ों की गतिविधियों या इशारों को दोहराने में असमर्थता।इलाज से ज्यादा जरूरी है प्यार और समयकाउंसलर सरस्वती रानी का कहना है कि ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों को दवाओं से ज्यादा अभिभावकों के साथ और दुलार की जरूरत होती है।अभिभावकों के लिए कुछ जरूरी सुझाव:1- स्क्रीन टाइम जीरो करें: बच्चे के सामने खुद भी मोबाइल का कम प्रयोग करें।2-आउटडोर एक्टिविटी: बच्चों को पार्क ले जाएं और उन्हें मिट्टी, पानी और प्रकृति के साथ खेलने दें।3-संवाद बढ़ाएं: बच्चे से लगातार बातें करें, भले ही वह जवाब न दे।4- थेरेपी का सहारा: समय पर पहचान होने पर स्पीच और बिहेवियरल थेरेपी से बड़े सुधार संभव हैं।
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