फसलों की बेहतर उपज और अच्छी बिक्री के लिए इस जिले में हर साल होती है अनोखी शादी
लखीमपुर खीरी जिले के निघासन इलाके में हर साल धान की फसल कटते ही एक अनोखी शादी आयोजित होती है, जिसे देखने लोग दूर-दूर से जुटते हैं। यह शादी किसी इंसान की नहीं, बल्कि एक कुएं और इमली के पेड़ की होती है।

Hindustan Special: यूपी के लखीमपुर खीरी जिले के निघासन इलाके में हर साल धान की फसल कटते ही एक अनोखी शादी आयोजित होती है, जिसे देखने लोग दूर-दूर से जुटते हैं। यह शादी किसी इंसान की नहीं, बल्कि एक कुएं और इमली के पेड़ की होती है। परंपरा के अनुसार यह आयोजन गांव की खुशहाली, फसल की बेहतर बिक्री और हरियाली बनाए रखने की कामना के साथ किया जाता है। सहालग की शुरुआत से पहले होने वाली यह रस्म 1960 से लगातार निभाई जा रही है, जिसमें करीब 20 गांवों के लोग बाराती व घराती बनकर शामिल होते हैं।
निघासन तहसील के गांव भैरमपुर में इस अनोखे विवाह का आयोजन बड़े धूमधाम से होता है। कुएं के पक्ष के लोग बारात लेकर इमली के पेड़ के पास पहुंचते हैं। तंबू-कनात सजते हैं, डीजे बजता है और बाराती नाच-गाकर माहौल को उत्सव में बदल देते हैं। खान-पान की पूरी व्यवस्था होती है और ग्रामीण सभी रस्मों को विधि-विधान से निभाते हैं। यह शादी किसी सामान्य आयोजन की तरह नहीं, बल्कि एक सांकेतिक संदेश लिए हुए होती है। किसानों का मानना है कि कुआं पानी का प्रतीक है और इमली हरियाली का। इन दोनों का विवाह क्षेत्र में जल-संरक्षण, हरियाली और अच्छी फसल के स्थायी संबंध का प्रतीक माना जाता है।
1960 से निभाई जा रही है परंपरा
भैरमपुर निवासी जग्गनाथ यादव बताते हैं कि यह परंपरा उनके गांव के खुशीराम यादव ने 1960 में शुरू की थी। परिवार में संपत्ति बंटवारे के बाद कुआं एक बेटे और बाग में लगी इमली दूसरे बेटे के हिस्से में आई। कुछ दिन बाद पुराने पेड़ के सूख जाने पर नए इमली के पौधे को रोपा गया और तभी से इस अनोखी शादी की रीति चली आ रही है। ग्रामीण बताते हैं कि इसमें छेई, रतिजगा, तेल पूजन, मैन, द्वारचार और भोज तक की सभी रस्में ठीक वैसे ही होती हैं, जैसे किसी पारंपरिक ग्रामीण शादी में होती हैं।

किसानों की मनोकामना से जुड़ा है विवाह
स्थानीय किसान वीरेंद्र अवस्थी के अनुसार यह शादी धान कटते ही सर्दियों में की जाती है। यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि किसानों की मनोकामनाओं का प्रतीक है। किसान मानते हैं कि कुएं और इमली के विवाह से गांव में न तो हरियाली खत्म होती है और न पानी की कमी होती है। यह रस्म खेती-बाड़ी में समृद्धि, फसल की बेहतर बिक्री और आने वाली अच्छी उपज की कामना के साथ होती है। इस शादी के बाद इलाके में सहालग की शुरुआत मानी जाती है और ग्रामीणों में उत्साह का माहौल बन जाता है। प्रकृति से गहरे जुड़े इस अनोखे आयोजन ने निघासन क्षेत्र को परंपरा और आस्था का विशेष पहचान दी है।

लेखक के बारे में
Dinesh Rathourदिनेश राठौर लाइव हिन्दुस्तान की यूपी टीम में पिछले आठ सालों से काम कर रहे हैं। वह लाइव हिन्दुस्तान में डिप्टी चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर हैं। कानपुर यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया है। पत्रकारिता में 13 साल से अधिक का अनुभव रखने वाले दिनेश की डिजिटल मीडिया और प्रिंट जर्नलिज्म में अलग पहचान है। इससे पहले लंबे समय तक प्रिंट में डेस्क पर भी काम किया है। कुछ सालों तक ब्यूरो में भी रहे हैं। यूपी और राजस्थान के सीकर जिले में भी पत्रकारिता कर चुके हैं। यूपी की राजनीति के साथ सोशल, क्राइम की खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाते हैं। वायरल वीडियो की फैक्ट चेकिंग में दिनेश को महारत हासिल है।
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