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Hindi News उत्तर प्रदेशयूपी में क्‍यों हारी भाजपा? सामने आए ये 5 कारण; जानें कौन सी चूक पड़ गई भारी 

यूपी में क्‍यों हारी भाजपा? सामने आए ये 5 कारण; जानें कौन सी चूक पड़ गई भारी 

भाजपा कुछ गलत फैसलों और विपक्ष की बिछाई बिसात पर उलझकर रह गई। अब लखनऊ से दिल्ली तक समीक्षाओं का दौर शुरू हो गया है। BJP की हार के प्रमुख 5 कारण सामने आ रहे हैं। पूरे चुनाव में जातियों का जोर जमकर चला।

यूपी में क्‍यों हारी भाजपा? सामने आए ये 5 कारण; जानें कौन सी चूक पड़ गई भारी 
Ajay Singhराजकुमार शर्मा,लखनऊSat, 08 Jun 2024 07:00 AM
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Reasons for BJP's defeat: यूपी में भाजपा कुछ गलत फैसलों और विपक्ष की बिछाई बिसात पर उलझकर रह गई। अब लखनऊ से दिल्ली तक समीक्षाओं का दौर शुरू हो गया है। भाजपा की हार के प्रमुख पांच कारण सामने आ रहे हैं। पूरे चुनाव में जातियों का जोर जमकर चला। भाजपा नेताओं का अति आत्मविश्वास ले डूबा। तमाम प्रयासों के बावजूद राममंदिर चुनावी मुद्दा नहीं बन सका। टिकट वितरण बेहद खराब रहा। पांच साल जनता से कटे रहने वाले चेहरे फिर मोदी-योगी के सहारे मैदान में उतार दिए गए।

वर्ष 2014 के चुनाव में भाजपा को 42.63 फीसदी वोट मिले। 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 49.98 फीसदी पर पहुंच गया। इस बार पार्टी ने 55 फीसदी पार पहुंचने का लक्ष्य रखा था। कई उपक्रम किए थे। पश्चिम में रालोद और पूरब में सुभासपा को जोड़ा था। अपना दल सोनेलाल और निषाद पार्टी पहले ही साथ थे। जिलों से प्रदेश तक 70 हजार से अधिक नये चेहरों की ज्वाइनिंग कराई गई। 22 जनवरी को अयोध्या में रामलला का भव्य प्राण प्रतिष्ठा समारोह आयोजित किया। इतने उपक्रमों के बावजूद भाजपा का वोटर शेयर सरककर 41.37 फीसदी पर आ गया।

बिखरा 2014 में बना अगड़े-पिछड़ों का गुलदस्ता
चुनाव पूर्व तमाम सर्वे कराने वाली भाजपा अति आत्मविश्वास में ऐसी डूबी कि जनता की नब्ज टटोलने में नाकाम रही। अगड़ी और पिछड़ी जातियों का जो गुलदस्ता भाजपा ने 2014 से पहले बनाया था, वो इस बार बिखरता दिखा। कुर्मी, कुशवाह, मौर्य, बिंद, निषाद, नोनिया सहित कई अन्य जातियां छिटक गईं। पार्टी ने इन जातियों की नुमाइंदगी जिन चेहरों को दी थी, उनमें से कोई उन्हें रोक नहीं पाया। बांदा में तो भाजपा का कुर्मी प्रत्याशी तीसरे नंबर पर चला गया। जातियों के छिटकने का नतीजा यह हुआ कि सुल्तानपुर से लेकर संतकबीर नगर, बलिया, बांदा, एटा, बदायूं, आंवला, मुजफ्फरनगर, घोसी, कौशांबी, प्रतापगढ़, खीरी, धौरहरा सहित तमाम अन्य सीटों पर भाजपा इंडिया गठबंधन की सोशल इंजीनियरिंग में फंसकर पस्त हो गई। रही-सही कसर दलितों में नीचे तक पहुंचे संविधान बदलने के संदेश ने पूरी कर दी। जातीय गुणा-गणित बिगड़ने का असर सिर्फ हारी नहीं जीती हुई सीटों पर भी पड़ा। न सिर्फ भाजपा-प्रत्याशियों की हार-जीत का अंतर घटा, बल्कि वोट शेयर करीब आठ फीसदी से अधिक नीचे सरक आया।

अति आत्मविश्वास ले डूबा
भाजपा के तमाम जनप्रतिनिधियों को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता में बेहद नाराजगी थी। अति आत्मविश्वास में ऐसे लोगों पर चुनाव में दांव लगाना भी भाजपा को भारी पड़ा। चुनाव में जिन प्रदेश पदाधिकारियों को जिम्मेदारी दी गईं, उनमें से बहुतों की हैसियत अपना बूथ जीतने की भी नहीं थी। क्षेत्र में पार्टी के कील-कांटे दुरुस्त करने की जगह, वे लोग प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व के सामने चेहरे चमकाने में लगे रहे। नतीजा यह हुआ कि लंबे समय से की जा रही बूथ और पन्ना समितियों स्तर तक की कवायद भी पार्टी समर्थक वोटरों को मतदान केंद्र तक पहुंचाने में नाकाम रही। 

मंदिर नहीं बन सका मुद्दा
बेहद सोची-समझी रणनीति के तहत लोकसभा चुनाव की घोषणा से पहले अयोध्या में रामलला की भव्य प्राण प्रतिष्ठा कराई गई। उस आयोजन को राष्ट्रोत्सव बनाने का प्रयास हुआ। फिर देशभर से लाखों लोगों को अयोध्या दर्शन लाने की योजना पर काम हुआ ताकि चुनाव तक मंदिर मुद्दे को गर्म रखा जा सके। बावजूद इसके मंदिर मुद्दा नहीं बन सका। जानकार इसके दो कारण बताते हैं। पहला यह कि मंदिर बनने के साथ ही वो मुद्दा उतना प्रभावी नहीं रहा, जितना मंदिर न बनने तक था। दूसरा सबसे अहम कारण उस आरएसएस की बेरुखी रही, जिसके एजेंडे में शुरुआत से अयोध्या, मथुरा, काशी रहे। संघ की ढांचा विध्वंस से लेकर कारसेवा, मंदिर के लिए चंदा एकत्रीकरण, आमंत्रण और अक्षत वितरण तक में अग्रणी भूमिका रही। इस मुद्दे को संघ ने ही घर-घर पहुंचाया था लेकिन चुनावी परिदृश्य से संघ पूरी तरह गायब दिखा। 

मोदी-योगी पर ही पूरी निर्भरता
भाजपाइयों को उम्मीद थी कि पिछले चुनावों की तरह इस बार भी मोदी-योगी नाम की पतवार के सहारे चुनावी नैया पार हो जाएगी। शायद टिकट वितरण के समय पार्टी को भी 2014 और 2019 जैसे होने की ही उम्मीद रही। मगर इस बार चुनाव में कोई लहर या राष्ट्रीय मुद्दा न होने के कारण ऐसा नहीं हो सका। पार्टी प्रत्याशियों की अलोकप्रियता मोदी और योगी मैजिक पर भारी पड़ी।

खराब टिकट वितरण पड़ा भारी
पार्टी को खराब टिकट वितरण भी भारी पड़ा। सर्वे रिपोर्टों को दरकिनार कर जब जनता से कटे हुए चेहरों को फिर प्रत्याशी बनाया गया तो कार्यकर्ताओं में ही इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। अनदेखी से नाराज कार्यकर्ताओं ने प्रत्याशियों और पार्टी को सबक सिखाने की ठान ली। उसके बाद उन्होंने पार्टी नेताओं की भी नहीं सुनीं।

हार के पांच फैक्टर
1-जातियों का चला जोर
2-अति आत्मविश्वास
3-मंदिर का मुद्दा नहीं बन पाना
4-योगी-मोदी के सहारे रहना
5-खराब टिकट बंटवारा