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कंपनी दिवालिया हो गई तो क्‍या...चेक बाउंस केस में हाईकोर्ट सख्‍त, कहा-जिम्‍मेदारी से बच नहीं सकते 

कोर्ट ने चेक बाउंस के मामले में कंपनी के डायरेक्टर की याचिका खारिज करते हुए कहा कि एक व्यक्ति जो कंपनी का निदेशक है और सभी मामलों का प्रभारी है उसके कामों की समीक्षा मुकदमे के ट्रायल से ही संभव है।

कंपनी दिवालिया हो गई तो क्‍या...चेक बाउंस केस में हाईकोर्ट सख्‍त, कहा-जिम्‍मेदारी से बच नहीं सकते 
Ajay Singhविधि संवाददाता,प्रयागराजThu, 15 Feb 2024 08:01 AM
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आदेश में कहा है कि यदि कंपनी दिवालिया हो गई है तब भी उसके डायरेक्टर अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते हैं। कोर्ट ने चेक बाउंस के मामले में कंपनी के डायरेक्टर की याचिका खारिज करते हुए कहा कि एक व्यक्ति जो कंपनी का निदेशक है और सभी मामलों का प्रभारी है उसके कार्यों की समीक्षा मुकदमे के ट्रायल से ही संभव है। इसी के साथ कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को प्रतिदिन सुनवाई कर तीन माह में विचारण पूरा करने का निर्देश दिया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने वालेचा इंजीनियरिंग कंपनी के निदेशक दिनेश हरिराम वालेचा की याचिका खारिज करते हुए दिया है। वालेचा ने याचिका दाखिल कर स्पेशल सीजेएम इटावा की अदालत में लंबित चेक बाउंस के परिवाद में जारी सम्मन आदेश को चुनौती दी थी। साथ ही परिवाद की कार्यवाही रद्द करने की मांग भी की थी।

मामले के तथ्यों के अनुसार वालेचा इंजीनियरिंग कंपनी ने विपक्षी को कुछ कार्यों का ठेका दिया था। जिसके एवज में उसे सात करोड़ 18 लाख 65 हजार रुपये से अधिक का भुगतान करना था। कंपनी ने विपक्षी को 6.50 करोड़ रुपये चेक से भुगतान किया लेकिन यह चेक बाउंस हो गया। विपक्षी कंपनी ने याची की कंपनी को नोटिस दिया लेकिन कंपनी की ओर से नोटिस का न तो कोई जवाब दिया गया और न ही भुगतान किया गया। इसके बाद विपक्षी ने चेक बाउंस का परिवाद दाखिल कर दिया।  परिवाद दाखिल होने के बाद अदालत ने याची की कंपनी के निदेशकों को कई बार सम्मन व गैर जमानती वारंट जारी कर तलब किया लेकिन वे बार-बार अदालत में हाजिर होने से बचते रहे। यहां तक कि निदेशकों के खिलाफ कुर्की की प्रक्रिया भी शुरू की गई। इसके बाद कुछ निदेशकों ने अदालत में उपस्थित होकर जमानत करा ली लेकिन उसके बाद फिर उपस्थित नहीं हुए। वे बार-बार हाजिरी माफी की अर्जी लगाकर उपस्थिति से बचते रहे। इस बीच विपक्षी कंपनी की याचिका पर हाईकोर्ट ने मुकदमे का ट्रायल छह माह में पूरा करने का निर्देश दिया। इसके बावजूद कंपनी के निदेशक बार-बार अदालत में हाजिर होने से बचते रहे।

याची की ओर से दलील दी गई की विपक्षी के नोटिस में तारीख का जिक्र नहीं किया गया है और न ही निदेशक की कोई भूमिका बताई गई है। निदेशक ने कंपनी के एक कर्मचारी को चेक साइन करने की पावर ऑफ अटॉर्नी दी थी, जो चेक जारी किए जाने के समय समाप्त हो चुकी थी। निदेशक की इसमें कोई भूमिका नहीं है। यह भी कहा गया कि कंपनी दिवालिया हो गई है और इसकी प्रक्रिया नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल में चल रही है।

कोर्ट ने इस मामले में ट्रायल कोर्ट पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस कोर्ट ने नौ सितंबर 2020 को मुकदमे का ट्रायल छह माह में पूरा करने का निर्देश ट्रायल कोर्ट को दिया था लेकिन हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया गया और ट्रायल कोर्ट बड़ी सहूलियत से आरोपियों को तारीख पर तारीख देती रही। साथ ही सभी निदेशकों को उपस्थिति से छूट मिलती रही। ट्रायल कोर्ट का यह कार्य वास्तव में अवमानना जनक है। कोर्ट ने कहा कि याची व अन्य निदेशक मुकदमे का ट्रायल विलंबित करने के लिए हर चाल चल रहे हैं। लेकिन यदि कंपनी दिवालिया हो गई है तब भी उसके निदेशक अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते।

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