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11 अगस्त, 2020|2:07|IST

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व्हाट्सएप संवाद: विशेषज्ञ बोले- ऑनलाइन शिक्षा मजबूरी, बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करें अभिभावक

कोरोना संकट ने हर क्षेत्र में तमाम विकल्पों की राह खोली है। यह विकल्प आपने साथ कुछ सुविधाएं ला रहे हैं तो कुछ नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं। ऐसी ही एक चुनौती है बच्चों के हाथ में स्मार्ट फोन। आमतौर पर आंखों के डॉक्टरों से लेकर मनोवैज्ञानिक, शिक्षाविद् और मनोचिकित्सक तक बच्चों को स्मार्टफोन के सीमित एक्सेस के पक्षधर रहे हैं। पर इन दिनों ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है। 

बच्चों के हाथ में स्मार्ट फोन देना मजबूरी है। यह पढ़ाई के लिए जरूरी है पर इसके कुछ दुष्परिणाम भी संभव हैं। 5-6 साल की उम्र से 10-12 साल की उम्र तक के बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन हमारे सामने क्या चुनौतियां पेश कर सकते हैं? उसे कैसे न्यूनतम किया जा सकता है? दुष्परिणाम कम करने में स्कूल क्या भूमिका निभा सकते हैं? परिजनों को क्या सावधानियां रखनी चाहिए? ऐसे सवालों के जवाब के लिए आपके अपने अखबार हिन्दुस्तान ने ‘नन्हे हाथों में स्मार्टफोन की मजबूरी, इसके नुकसान कैसे कम करें’ विषय व्हाट्सएप संवाद आयोजित किया। लोगों ने कहा कि बच्चों को व्यस्त रखने के लिए भले ही यह जरूरी दिख रहा हो लेकिन इसमें अभी तमाम खामियां हैं। अभिभावकों को बच्चों के साथ समय देना होगा। कोशिश करनी होगी कि बच्चों का स्क्रीन टाइम कम किया जाए। 

बोले विशेषज्ञ


स्मार्ट फोन पर बच्चे लगातार देखते हैं तो पलक झपकने की प्रक्रिया पर असर पड़ता है। सामान्य आंख एक मिनट में 15 से 16 झपकती है। लेकिन स्मार्ट फोन पर पढ़ने से पलक झपकने की प्रक्रिया एक तिहाई कम हो जाती है। स्क्रीन पर लगातार पढ़ने से आंखों पर स्ट्रेस आता है। ड्राइनेस बढ़ती है। जिससे आंखें लाल होने लगती है। जरूरी है कि स्मार्ट फोन को थोड़ी दूर से देखें। शब्दों को बड़ा कर देखें। लगातार स्मार्ट फोन की तरफ न देखें। यदि टैबलेट या लैपटॉप है तो उसका प्रयोग करें। 
डॉ.पंखुरी श्रीवास्तव, नेत्र विशेषज्ञ

विकास और प्रौद्योगिकी के इस बदलते दौर में स्मार्टफोन मानव जीवन का हिस्सा बन गया है। स्मार्टफोन से बच्चों का मानसिक विकास बाधित हो रहा है। बच्चे सामाजिक और व्यवहारिक रूप से लोगों से नहीं जुड़ पा रहे हैं। बच्चों की सोशल स्किल कम हो रही है। लॉकडाउन में  ई-कंटेंट, ऑनलाइन क्लासेस अपरिहार्य बन गए हैं। स्मार्ट फोन का उपयोग अभिभावकों की निगरानी में होना चाहिए। ऑनलाइन पढ़ाई के समय बच्चे को बीच-बीच में आराम जरूर देना चाहिए। बच्चों को 15 मिनट के बाद एक मिनट के लिए आंखें बंद करने के लिए कहें।  
डॉ.आकाश कुमार सिंह, समाजशास्त्र विभाग, एवीआरयल• पीजी• कॉलेज

ऑनलाइन शिक्षा में मुहैया कराए जा रहे नोट्स या लेक्चर का कंटेंट अच्छा होना चाहिए। बच्चों के उम्र तथा क्लास के हिसाब से नोट्स तथा वीडियोज होने चाहिए। ई-लर्निंग का उपयोग उचित मात्रा में तथा रूटीन बेस्ड किया जाये तो बेहतर होगा। बच्चे पर्सनलाइज्ड तथा फोकस्ड होकर अध्यनन कर सकते हैं। इसके लिए पेरेंट्स की भूमिका अहम बनती है। बच्चों को ई- लर्निंग के लिए प्रेरित करें। पेरेंट्स यह ध्यान रखें की बच्चे एक निर्धारित समय तक ही ऑनलाइन पढाई करें। जिससे उनके शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य पर इसका नकारात्मक प्रभाव ना पड़े। 
निशा सिंह, शोध छात्रा, मनोविज्ञान, गोरखपुर यूनिवर्सिटी

स्मार्ट फोन एक दुधारी तलवार है। खिलौने खेलने कि आयु में शुन्य से 4 वर्ष के बालक जिस प्रकार से स्मार्टफोन का उपयोग कर रहे हैं। यह शारीरिक, सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक सभी दृष्टियों से चिंताजनक है। वर्तमान महामारी की दशा में विद्यार्थियों का काफी समय निष्क्रियता की स्थिति में बीत रहा है। जिससे उनके व्यवहार में ज़िद , चिड़चिड़ापन, आक्रामकता आदि का समावेश हो गया है। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा एक उपयोगी विकल्प हो सकता है। अभिभावकों की निगरानी में स्मार्टफोन का उपयोग शिक्षा होना चाहिए। वरना नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। 
डॉ. प्रेमलता वर्मा, मनोविज्ञान विभाग/ काउंसलर

 


ऑनलाइन पढाई ठीक उसी प्रकार है जैसे भूख लगने पर आप फास्ट फूड का सेवन करते हैं। थोड़ी देर के लिए पेट तो भर जाता है पर भूख नहीं मिटती है। ऑनलाइन पढ़ाई उच्च कक्षा के लिए उपयोगी है। वो भी सीमित अवधि के लिए। 5-8 वर्ष के बच्चों की जहाँ तक बात है वे मोबाइल फोन को पढ़ाई की वस्तु समझने लगे हैं। परंतु इसका निरन्तर उपयोग हानिकारक हो सकता है। विद्यालय प्रबंधन को चाहिए कि अभिभावक के माध्यम से इसका उपयोग सीमित अवधि के लिए करें।

संदीप श्रीवास्तव, शिक्षक/अभिभावक

स्मार्टफोन से पढ़ाई वर्तमान समय की मजबूरी है। वर्तमान परिपेक्ष्य में पढ़ाई एकदम बंद कर देना ठीक नहीं है। यह भी सही है कि क्लास रूम शिक्षा का विकल्प नहीं है। क्लास की पढ़ाई से ऑनलाइन पढ़ाई पूरी तरह अलग है। इंटरनेट स्पीड अच्छी नहीं होने पर पीडीएफ फाइल अपलोड होने की शिकायतें हैं। घरों में बच्चें ज्यादा और स्मार्ट फोन कम हैं। अभिभावक ऑडियो-विजुअल को संयम के साथ बच्चों के साथ देखें। बच्चे फोन का कम प्रयोग करें। इसके लिए बच्चों को डिक्टेट कर होमवर्क कराएं।  इससे बच्चों का स्क्रीन टाइम कम होगा। 
दीबा अहमद, प्रधानाचार्य, एचपी चिल्ड्रेन स्कूल


 
ऑनलाइन शिक्षा एक समान बच्चों के लिए है, जबकि हकीकत में हर बच्चें की अपनी क्षमता है, समस्याएं हैं। वर्तमान परिस्थितियों में इसका विकल्प नहीं है। परंतु बच्चों को तमाम दिक्कतें भी आ रही है। नेटवर्क नहीं होने के कारण प्रश्न अधूरे रह जाते हैं। ऑनलाइन शिक्षा में बच्चों शिक्षकों से उस तरह जुड़ भी नहीं पा रहे हैं, जितना क्लास रूम में होता है। अभी सभी बच्चों के पास किताब की भी उपलब्धता नहीं है, ऐसे में बच्चों को पढ़ाई करने में दिक्कत हो रही है। गणित और विज्ञान जैसे विषयों को समझना बच्चों के लिए मुश्किल हो रहा है। 
रंजना वर्मा, अभिभावक

स्कूल बंद हैं इसलिए ऑनलाइन शिक्षा मजबूरी है। किंतु जो पढ़ाई बच्चे स्कूल में उपस्थित हो कर अध्यापकों के माध्यम से करते हैं, त्वरित समाधान पाते हैं वह ऑनलाइन पढ़ाई में संभव नहीं है। घरों में स्मार्ट फोन की उपलब्धता सिमित है। बड़े अपने हिसाब से फोन रखते हैं। अब हर बच्चे को स्मार्ट फोन चाहिए। अचानक आई आपदा ने घरों में माहौल को भी बिगाड़ा दिया है। बच्चों के हाथ में मोबाइल होने से कई जरूरी काम नहीं हो पा रहे हैं। 
अनुपम मिश्रा, अभिभावक

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  • Web Title:wattsapp sanwad experts said online learning is need of time but screen time should be reduced in lockdown