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हिंदी न्यूज़ उत्तर प्रदेशवाराणसी : गंगा में मिली अमेरिका की अमेजन नदी में पाई जाने वाली मछली, जांच में जुटे वैज्ञानिक

वाराणसी : गंगा में मिली अमेरिका की अमेजन नदी में पाई जाने वाली मछली, जांच में जुटे वैज्ञानिक

वाराणसी। प्रमुख संवाददाताAmit Gupta
Sat, 26 Sep 2020 01:18 PM
वाराणसी : गंगा में मिली अमेरिका की अमेजन नदी में पाई जाने वाली मछली, जांच में जुटे वैज्ञानिक

अमेरिका की अमेजन नदी में पाई जाने वाली कैटफिश की एक और प्रजाति काशी की गंगा में मिली है। सकरमाउथ कैट फिश नामक इस मछली के गंगा में मिलने से बीएचयू के जंतु विज्ञानी बेहद चिंता में हैं। एक महीने के भीतर यह दूसरा मौका है जब गंगा में कैट फिश पाई गई है।

सकरमाउथ कैट फिश के मिलने से वैज्ञानिकों की चिंता कई गुना बढ़ गई है। यह मछली गंगा की पारिस्थितिकी के लिए बेहद खतरनाक मानी जा रही है। यह 24 सितंबर को काशी के दक्षिण में रमना गांव के पास गंगा में मिली। यह मछली मछुआरों के महाजाल में फंसी। इस अजीबो गरीब मछली को देख कर मछुआरों ने इसकी सूचना गंगा प्रहरी दर्शन निशाद को दी। देहरादून के वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षित दर्शन निशाद इसे देखते ही पहचान गए। इस बार उन्होंने उसे जीवित अवस्था में बीएचयू के जंतु विज्ञानियों तक पहुंचाया। साथ ही इस मछली की फोटो और वीडियो देहरादून के वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट की मछली विशेषज्ञ डॉ. रुचि बडोला को भी भेजी है। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व इसी महीने की तीन तारीख को गोल्डेन कलर की सकर कैटफिश गंगा में सूजाबाद के पास मिली थी। बीएचयू के जंतु विज्ञानियों ने इस मछली के कारण होने वाले पारिस्थितिकीय परिवर्तनों के बारे में पता लगाने का काम शुरू कर दिया गया है।

जलीय पारिस्थितिकी में असंतुलन का कारण
बीएचयू के जंतु विज्ञानी प्रो. बेचन लाल ने बताया कि यह जलीय पारिस्थितिकी में भयानक असंतुलन का कारण है। यह अपने से छोटी मछलियों ही नहीं बल्कि अन्य जलीय जीवों को भी खा जाती हैं। इस मछली का जंतु वैज्ञानिक नाम हाइपोस्टोमस प्लोकोस्टोमस है। विदेशों में इसे प्लैको नाम से भी जाना जाता है। देसी मछलियों को प्रजनन के लिए विशेष परिस्थिति की जरूरत होती है, लेकिन इनके साथ ऐसा नहीं है। ये मछलियां जल में किसी भी परिस्थिति में और कहीं भी प्रजनन कर सकती हैं।
 
देश की लगभग सभी नदियों में इनकी पहुंच
प्रो. लाल ने बताया कि  चिंता की बात तो यह है कि यह मछली देश की लगभग सभी नदियों में पाई जाने लगी है। मांसाहारी प्रवृत्ति की ये मछलियां आकार में भले ही दो इंच से सवा फिट तक की होती हैं, लेकिन इनमें न तो खाद्य गुणवत्ता है और न ही इनमें किसी प्रकार का औषधीय गुण हैं। दोनों ही दृष्टि से बेकार होने के कारण यह मछलियां मछुआरों की आजीविका के लिए भी संकट उत्पन्न कर रही हैं। उन्होंने बताया कि इन मछलियों को नदियों से समाप्त करना अब असंभव हो गया है। 

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