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Hindi News उत्तर प्रदेशबसपा को बार-बार टिकट बदलने का भी नहीं मिला फायदा, मायावती को नहीं मिला मुस्लिमों का साथ

बसपा को बार-बार टिकट बदलने का भी नहीं मिला फायदा, मायावती को नहीं मिला मुस्लिमों का साथ

बसपा को बार-बार टिकट बदलने का भी फायदा नहीं मिल पाया है। मायावती के बीस उम्मीदवार देने के बाद भी मुस्लिमों का साथ नहीं मिला। राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाए रखने का भी संकट खड़ा हो गया है।

बसपा को बार-बार टिकट बदलने का भी नहीं मिला फायदा, मायावती को नहीं मिला मुस्लिमों का साथ
Srishti Kunjहिन्दुस्तान टीम,लखनऊWed, 05 Jun 2024 01:33 PM
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बहुजन समाज पार्टी को बार-बार टिकट बदलने का भी फायदा नहीं मिल पाया। इतना ही नहीं सर्वाधिक 20 उम्मीदवार देने के बाद भी उसे मुस्लिमों का साथ नहीं मिला। सब मिलाकर देखा जाए तो बसपा के लिए यह चुनाव काफी नुकसानदेय साबित हुआ है। वर्ष 2014 में सभी सीटों पर हार के बाद भी बसपा का वोट प्रतिशत 19.77 रहा, लेकिन वर्ष 2024 के चुनाव में बसपा को भारी नुकसान हुआ है। उसका वोट प्रतिशत घटकर 9.39 रह गया। इससे यह तो पूरी तरह से साफ है कि बसपा के सामने राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा बचाए रखने का भी संकट खड़ा हो गया है।

बंटवारे की चली चाल
बसपा ने लोकसभा चुनाव में 80 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। जातीय समीकरण के हिसाब से सर्वाधिक 23, मुस्लिम 20, सवर्ण 18 इसमें ब्राह्मण 12 और दलित 17 उम्मीदवार दिए। बसपा ने मुस्लिमों को 20 टिकट दिया, जबकि सपा ने मात्र चार मुस्लिम उम्मीदवार दिए। बसपा यह मानकर चल रही थी कि उसे कुछ सीटों पर मुस्लिमों का साथ जरूर मिलेगा, लेकिन उसकी यह रणनीति फेल हो गई। इतना ही नहीं बसपा ने सपा द्वारा दिए गए चारों मुस्लिम उम्मीदवारों की सीटों पर इसी बिरादरी के उम्मीदवारों को उतार कर बंटवारे की चाल चली, लेकिन अमरोहा को छोड़ दिया जाए तो सपा को कहीं कोई नुकसान नहीं उठाना पड़ा।

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बसपा ने सपा-कांग्रेस को पांच सीटों पर पहुंचाया नुकसान
बसपा ही एक ऐसी पार्टी रही जिसने सर्वाधिक 13 उम्मीदवार इस चुनाव में बदले। सपा को नुकसान पहुंचाने के लिए आजमगढ़ और संतकबीरनगर में तो तीन-तीन बार उम्मीदवार बदल दिए। इसके बाद भी बसपा को कोई फायदा नहीं मिल पाया। चुनावी परिणाम पर नजर डाला जाए तो मेरठ, फतेहपुर सीकरी, शाहजहांपुर, मिश्रिख और उन्नाव में बसपा की चाल से सपा-कांग्रेस गठबंधन को जरूर नुकसान उठाना पड़ा। बसपा को मिले वोटों को अगर सपा-कांग्रेस गठबंधन उम्मीदवारों को मिले वोटों से जोड़ दिया जाए तो भाजपा से अधिक होता है। कैसरगंज में सपा से रामभगत मिश्रा मैदान में थे, बसपा ने वहां से नरेंद्र पाण्डेय को मैदान में उतारा। सपा को इससे कोई नुकसान नहीं हुआ। 

चंद्रशेखर का दलितों में बढ़ा कद
आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद भी बसपा की तरह दलित हितों की राजनीति करते हैं। दलित उत्पीड़न के हर मौके पर वह पहुंच कर मामले को जोर-शोर से उठाते हैं। चंद्रशेखर आजाद बिना किसी गठबंधन में रहते हुए नगीना सीट से चुनाव जीते हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती को यह डर सता रहा था कि चंद्रशेखर के चुनाव जीतने पर दलितों समुदाय में उनके विकल्प बनने का संदेश जाता हुआ दिखाई देगा। इसी को ध्यान में रखते हुए मायावती ने भतीजे आकाश आनंद की पहली सभा नगीना सीट पर ही लगाई, लेकिन उनकी अपील भी काम न आई। नगीना जाटव बाहुल्य सीट है और मायावती भी इसी बिरादरी से आती हैं। बसपा वर्ष 2019 में नगीना सीट पर जीत दर्ज की थी।