ट्रेंडिंग न्यूज़

Hindi News उत्तर प्रदेशयूपी लोकसभा चुनाव : पार्टी नहीं इनके नाम का झंडा हुआ बुलंद, जहां गए जीत गए

यूपी लोकसभा चुनाव : पार्टी नहीं इनके नाम का झंडा हुआ बुलंद, जहां गए जीत गए

UP Lok Sabha Elections: पार्टी नहीं इनके नाम का झंडा बुलंद हुआ। जिस दल में गए उन्होंने जीत दर्ज की। सीट बदली फिर भी जीते। यही कारण है कि पार्टियां ऐसे नेताओं को अपने साथ लाकर उन पर दांव लगाती रही हैं।

यूपी लोकसभा चुनाव : पार्टी नहीं इनके नाम का झंडा हुआ बुलंद, जहां गए जीत गए
Deep Pandeyशैलेंद्र श्रीवास्तव,लखनऊThu, 18 Apr 2024 02:48 PM
ऐप पर पढ़ें

यूपी की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे भी हैं, जिस दल में गए उन्होंने जीत दर्ज की। सीट बदली फिर भी जीते। यही कारण है कि पार्टियां ऐसे नेताओं को अपने साथ लाकर उन पर दांव लगाती रही हैं। इस बार भी कुछ ऐसे ही नेता हैं चुनाव मैदान में हैं। पार्टियों ने कुछ की उम्मीदवारी या तो घोषित कर दी है या फिर उन्हें अंदरखाने में तैयारियों में जुट जाने को कहा गया है।

राजनाथ सिंह: जहां गए वहां जीते

भाजपा के राजनाथ सिंह यूपी ही नहीं देश की राजनीति में एक जाना-पहचाना नाम है। राजनाथ सिंह राज्य की राजनीति से निकल कर राष्ट्रीय राजनीति में पहुंचे। राजनाथ सिंह गाजियाबाद से वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव लड़े और जीते। इसके बाद उन्हें लखनऊ लोकसभा सीट पर भाजपा ने वर्ष 2014 में उतारा और वह जीते। वह लगातार दो बार से लखनऊ संसदीय सीट से सांसद हैं और तीसरी बार मैदान में हैं। सपा ने रविदास मेहरोत्रा और बसपा ने सरवर मलिक को मैदान में उतारा है।

कीर्तिवर्धन सिंह: राज परिवार बनी पसंद

मनकापुर के राजा आनंद सिंह उर्फ अन्नू भैया का परिवार किसी जमाने में घोर कांग्रेसी हुआ करता था। अन्नू भैया ने राजनीति में कदम रखा तो कांग्रेस के टिकट पर 1980, 1984 और 1989 तीन बार गोंडा से लगातार सांसद बने। कीर्तिवर्धन सिंह भाजपा के टिकट पर पहली बार 1998 में सांसद बने। इसके बाद 2004 में फिर वह दोबारा सपा के टिकट पर सांसद बने। कीर्तिवर्धन वर्ष 2014 और 2019 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते। इस बार भी वह मैदान में हैं।

बृजभूषण सिंह: दल से ऊपर

कैसरगंज के मौजूदा सांसद बृजभूषण शरण सिंह अवध क्षेत्र का एक ऐसा नाम पर जिस पर दांव लगाना सभी पार्टियों को फायदेमंद साबित होता रहा है। अयोध्या लहर में वह भाजपाई हुए और 1991 में गोंडा से मैदान में उतरे और चुनाव जीते। इतना ही नहीं वर्ष 1996 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर गोंडा से पत्नी केतकी सिंह को चुनाव जितवा दिया। इसके बाद फिर वह 1999 में इसी सीट से स्वयं सांसद बने और वर्ष 2004 में बलरामपुर संसदीय सीट (अब श्रावस्ती) से भाजपा के टिकट पर सांसद बने। भाजपा से खटपट होने के बाद 2009 में समाजवादी होकर कैसरगंज पहुंचे तो सांसद बनने में सफल रहे। वर्ष 2014 व 2019 में भाजपा के टिकट पर इसी सीट से सांसद बने, इस बार अभी तक उनके टिकट पर फैसला नहीं हो पाया है, लेकिन वह क्षेत्र में प्रचार कर रहे हैं।

मेनका गांधी: बिना दल के भी जीती

मेनका गांधी के लिए दल मायने नहीं रखता। चाहे जनता दल हो या निर्दल..., या कहें चाहे जो भी क्षेत्र हो, जहां भी गईं सफलता मिली। मेनका गांधी पीलीभीत से 1989 और 1996 में जनता दल के टिकट पर सांसद बनी। इसी सीट से 1998 व 1999 में निर्दल जीती। भाजपा के टिकट पर वर्ष 2004 में वह इसी सीट से सांसद बनी, लेकिन 2009 में उन्होंने अपने बेटे वरुण के लिए यह सीट छोड़ कर आंवला पहुंची और वहां से भी जीत दर्ज की। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में फिर वह पीलीभीत पहुंची और भाजपा के टिकट से जीती। वर्ष 2019 में वह सुल्तानपुर से भाजपा के टिकट पर लड़ी और जीती। इस बार भी वह मैदान में हैं।

अखिलेश यादव: जहां गए जीते

समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव की बात करें तो उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए खूब सीटें बदलीं। वर्ष 2000 और 2004 में कन्नौज संसदीय सीट से सांसद बने। दोबारा वह वर्ष 2009 में कन्नौज और फिरोजाबाद संसदीय सीट से चुनाव लड़े और दोनों सीटों पर जीत दर्ज की। बाद में फिरोजाबाद से इस्तीफा देकर पत्नी डिंपल को उपचुनाव लड़ाया, लेकिन वह कांग्रेस के राज बब्बर से हार गईं। अखिलेश वर्ष 2019 में आजमगढ़ से लोकसभा चुनाव लड़े और जीते। इस बार आजमगढ़ से चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को उतारा है। अखिलेश यादव के कन्नौज सीट से चुनाव लड़ने की चर्चा है, लेकिन अभी तक उन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले हैं।

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें