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Hindi News उत्तर प्रदेशलालगंज लोकसभा सीट समीकरण: 2019 का बदला ले सकेगी भाजपा या सपा-बसपा दोहराएंगी इतिहास

लालगंज लोकसभा सीट समीकरण: 2019 का बदला ले सकेगी भाजपा या सपा-बसपा दोहराएंगी इतिहास

लालगंज लोकसभा सीट सुरक्षित यानी अनुसूचित जाति के प्रत्याशियों के लिए आरक्षित है। यह सीट आजमगढ़ जिले में आती है। आजमगढ़ में दो सीटें हैं। एक आजमगढ़ और दूसरी लालगंज। यहां पांच विधानसभा सीटें हैं।

लालगंज लोकसभा सीट समीकरण: 2019 का बदला ले सकेगी भाजपा या सपा-बसपा दोहराएंगी इतिहास
Yogesh Yadavलाइव हिन्दुस्तान,आजमगढ़Fri, 19 Apr 2024 05:08 PM
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लालगंज लोकसभा सीट सुरक्षित यानी अनुसूचित जाति के प्रत्याशियों के लिए आरक्षित है। यह सीट आजमगढ़ जिले में आती है। आजमगढ़ में दो सीटें हैं। एक आजमगढ़ और दूसरी लालगंज। इस लोकसभा सीट में पांच विधानसभा क्षेत्र अतरौलिया, लालगंज, दीदारगंज, निजामाबाद, फूलपुर पवई आते हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में पांचों सीटों पर सपा प्रत्याशियों ने जीत हासिल की थी। पिछले लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा के गठबंधन से बहुजन समाज पार्टी की प्रत्याशी संगीता आजाद को उतारा था। संगीता आजाद ने बीजेपी की प्रत्याशी नीलम सोनकर को आसान मुकाबले में हराया था।

संगीता आजाद को 518,820 वोट मिले तो नीलम सोनकर के खाते में 3,57,223 वोट आए थे। भाजपा ने एक बार फिर नीलम सोनकर को मैदान में उतारा है। बसपा ने डॉक्टर इंदू चौधरी को उतारा है। सपा ने पुराने समाजवादी दरोगा सरोज पर भरोसा जताया है। इससे पहले 2014 के चुनाव में मोदी लहर के बीच यह सीट बीजेपी के खाते में चली गई थी। बीजेपी के टिकट पर नीलम सोनकर ने समाजवादी पार्टी के बेचई सरोज को कड़े मुकाबले में 63,086 मतों के अंतर से हराया था। बीएसपी के डॉक्टर बलिराम तीसरे स्थान पर रहे थे और उन्हें 2,33,971 वोट मिले थे।

1990 के बाद के राजनीतिक परिणामों पर नजर डालें तो यहां पर किसी भी दल का एकाधिकार नहीं रहा। कांग्रेस को 1984 के बाद से यहां पर जीत नहीं मिली है। जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी को बारी-बारी से जीत मिल चुकी है। बहुजन समाज पार्टी को इस दौरान 4 बार जीत मिली तो समाजवादी पार्टी को 2 बार। भाजपा केवल 2014 में ही जीत सकी है।

लालगंज लोकसभा सीट पर जातिगत समीकरण
लालगंज में सबसे ज्यादा संख्या मुस्लिम, यादव और दलित की है। यहां करीब 19 लाख 76 हजार मतदाता हैं। जाति समीकरण देखा जाय तो यादव, मुसलमान और दलित वोटर ही निर्णायक रहते हैं। मुस्लिम वोटर करीब 2.5 लाख, यादव 2 लाख, राजभर 1 लाख 20 हजार, खटीक 1 लाख 20 हजार, पासी 1 लाख 30 हजार, वैश्य 80 हजार, अन्य ओबीसी 3 लाख, अन्य अनुसूचित जाति के वोटरों की अनुमानित संख्या करीब 1 लाख है। तीन विधानसभा क्षेत्र अतरौलिया, फूलपुर और निजामाबाद मुस्लिम और यादव बाहुल्य हैं, जबकि लालगंज और मेंहनगर दलित बाहुल्य क्षेत्र माना जाता है।

तीन दशकों तक युवा तुर्क रामधन का ही रहा वर्चस्व 
पहली बार 1962 में अस्तित्व में आयी लालगंज सीट का नाम आते ही सभी की जुबान पर सहसा युवा तुर्क रामधन का नाम आ जाता है। पहली बार प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के विश्राम प्रसाद ने जीत हासिल की। उनके सामने थे रामधन। इस सीट पर सर्वाधिक बार विजय पताका फहराने वाले रामधन चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी थे। वह तीसरे नंबर पर रहे। 1967 में चुनाव हुआ तो रामधन कांग्रेस के टिकट पर पहली बार लोकसभा पहुंचे।

इसके बाद इस सीट पर तीन दशक तक रामधन का ही कब्जा रहा। 1980 में सातवीं लोकसभा के चुनाव को छोड़ दिया जाए तो 1971 के चुनाव में तो इंदिरा लहर में रामधन ने जबरदस्त जीत हासिल की। इनके प्रतिद्वंदी शिवप्रसाद को 21% मत ही मिले थे। जनता लहर में लालगंज सीट पर रामधन ने रिकार्ड बनाया। 1977 के इस चुनाव में रामधन ने भारतीय लोकदल के प्रत्याशी के तौर पर कांग्रेस के उम्मीदवार को डेढ़ लाख से अधिक वोटों से हराया। 

कब कौन रहा सांसद
वर्ष     सांसद     पार्टी               
1962         विश्राम प्रसाद     प्रजा सोशलिस्ट पार्टी 
1967         रामधन             कांग्रेस            
1971    रामधन             कांग्रेस            
1977    रामधन            भारतीय लोकदल  
1980    छांगुर             जेएनपी(एस)     
1985    रामधन            कांग्रेस            
1989    रामधन            जनता दल         
1991    रामधन            जनता दल         
1996    डा बलिराम        बसपा              
1998    दरोगा सरोज       सपा                
1999    डॉ. बलिराम         बसपा 
2004    दरोगा सरोज         सपा  
2009    डॉ. बलिराम          बसपा
2014    नीलम सोनकर      भाजपा 
2019    संगीता आजाद       बसपा

ब्लैक पाटरी के लिए दुनिया भर में मशहूर
लालगंज का नाम आते ही जेहन में दुर्वाषा धाम, पल्हना देवी का नाम तो आता ही है। गंगा जमुनी तहजीब की अदभुत मिसाल पेश करने वाले अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की जन्मस्थली निजामाबाद व मशहूर शायर कैफी आजमी की जन्म स्थली मेजवां फूलपुर का नाम सहसा दिमाग में आ जाता है। इसी निजामाबाद कस्बे की ब्लैक पाटरी पूरी दुनिया में अपने अद्वितीय व मनोरम कलाकारी के लिए जानी जाती है।

निजामाबाद में ऐतिहासिक महत्व का गुरुद्वारा है जहां सिक्खों के गुरु नानक व गुरु तेग बहादुर जी से जुड़ी यादें आज भी उनके अनुयायियों को यहां खींच लाती हें। इसी क्षेत्र में आजमगढ़ को नई व नकारात्मक पहचान देने वाले क्षेत्र संजरपुर व सरायमीर भी हैं। इनका नाम कभी आतंकवादी गतिविधयों से जुड़ा था।
 एक जमाने में रामधन के पर्याय के रूप में जाना जाने वाला पूर्वांचल का यह महत्वपूर्ण संसदीय क्षेत्र विकास के नाम पर अब भी पिछड़ा हुआ है।

वर्तमान में लालगंज आजमगढ़ जिले की एक तहसील है। लगभग साठ फीसदी साक्षरता वाला यह क्षेत्र दो वीआईपी संसदीय क्षेत्रों से सटा हुआ है। यहां के लोग मुख्य रूप से कृषि पर ही निर्भर हैं। लेकिन उद्योग शून्यता के चलते यहां का युवा परदेश में काम करने को विवश हैं।  यहां के सरायमीर, संजरपुर, निजामाबाद, फरिहा,फूलपुर, लालगंज, मार्टीनगंज, दीदारगंज जैसे क्षेत्र के बड़ी संख्या में युवा खाड़ी देशों में छोटे मोटे काम कर अपना भरण पोषण करते हैं।

जिनकी खाड़ी देश जाने की व्यवस्था नहीं हो पाती है, वो पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात जैसे प्रांतों में रोजगार की तलाश में भटकते रहते हैं। रोजगार के साधन न के बराबर होने के चलते ही यहां की बड़ी आबादी पिछले कई दशकों से पलायन कर रही है। लेकिन अचरज की बात है कि न तो किसी ने इस पलायन को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर काम करने का प्रयास किया और न ही कभी यह समस्या यहां के चुनाव में मुद्दा ही बन पायी।

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