अलर्टः ट्रूकॉलर अप्लीकेशन को भी साइबर ठगों ने बना लिया हथियार
अगर आपके मोबाइल पर ट्रूकॉलर अप्लीकेशन के जरिए किसी बैंक का नाम आए तो कतई उसे बैंक की तरफ से कॉल न समझें। जाल में फंसे तो बड़ी रकम गंवानी पड़ सकती है। आपको मदद देने वाले अप्लीकेशन को ही अब साइबर ठगों...

अगर आपके मोबाइल पर ट्रूकॉलर अप्लीकेशन के जरिए किसी बैंक का नाम आए तो कतई उसे बैंक की तरफ से कॉल न समझें। जाल में फंसे तो बड़ी रकम गंवानी पड़ सकती है। आपको मदद देने वाले अप्लीकेशन को ही अब साइबर ठगों ने हथियार बना लिया है।
ट्रूकॉलर अप्लीकेशन के जरिए देश के लाखों लोगों ने उन नंबरों की भी पहचान की है जो उनके मोबाइल में सेव नहीं थे। इससे धीरे-धीरे इस अप्लीकेशन पर लोगों का भरोसा बढ़ता गया और आंख मूंदकर गूगल के प्ले स्टोर से इसे इंस्टॉल करना शुरू कर दिया। यह भी नहीं देखा कि अप्लीकेशन पर जिन-जिन बिंदुओं की अनुमति मांगी जा रही है उसे साझा करना भी चाहिए या नहीं। नतीजा यह हुआ कि अच्छे खासे पढ़े-लिखे लोग भी साइबर ठगी के शिकार हो गए। अब कानपुर की क्राइम ब्रांच की टीम को इससे जुड़ीं चौंकाने वाली जानकारियां हाथ लगी हैं।
अप्लीकेशन का ऐसे होता इस्तेमाल
साइबर ठग पहले किसी फेंक आईडी से हासिल किया हुआ सिम किसी मोबाइल में लगाते हैं। एक्टिवेट होते ही अपने किसी साथी से वह नंबर अपने उस मोबाइल में सेव करने को कहते हैं कि जिसमें ट्रूकॉलर अप्लीकेशन पहले से इंस्टॉल हो। नंबर को किसी भी बैंक (टारगेट के हिसाब से जैसी जरूरत हो) के नाम से सेव कर लिया जाता है। इसके बाद उस नंबर पर किसी साथी से कॉल कराई जाती है। ट्रूकॉलर के जरिए मोबाइल पर बैंक का नाम आने लगता है। यही नाम हमेशा आता रहे इसलिए गूगल पर किसी मेल पर फर्जी आईडी बनाकर इसी नंबर को बैंक के नाम से डाल दिया जाता है। इससे दूसरा कोई नाम आने की गुंजाइश ही नहीं बचती। एसपी क्राइम राजेश कुमार यादव के मुताबिक जिस मोबाइल नंबर को सेव किया जाता है उसका इस्तेमाल अपने परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों या गैंग से इतर किसी भी सदस्य को कॉल करने में नहीं किया जाता।
इस तरह की जाती धोखाधड़ी
साइबर ठग बहुत चालाक हैं। जिनसे ठगी की जानी है सिर्फ उन्हीं को कॉल करते हैं। इसके लिए सबसे पहले बैंकों के खाताधारकों की डिटेल ली जाती है जो आम तौर पर बिकने लगी है। हकीकत यह है कि मार्केटिंग में इसका इस्तेमाल करने लिए कहकर बैंकों से लिया जाता है मगर किसी के जरिए यह पहुंच जाती है साइबर ठगों के पास। इसमें मोबाइल नंबर भी होते हैं। कॉल करने वाला खुद को बैंक का स्टॉफ या मैनेजर बताता है। वह एटीएम कार्ड या क्रेडिट कार्ड की डिटेल बताता है जिसके बारे में वह पता कर चुका होता है। इसके बाद किसी बहाने कहता है कि अभी पासवर्ड बताएं, जन्मतिथि बताएं या माताजी का नाम बताएं। लोग यह समझते हैं कि बैंक से कॉल आई है और ट्रूकॉलर पर भी दिख रहा है तो सही ही होगा। बस यहीं फंस जाते हैं और कुछ समय बाद पता चलता है कि उनके खाते से रकम निकाल ली गई।
साइबर सेल की जांच में खुला ठगी का ये तरीका
साइबर सेल की जांच ठगी का यह तरीका सामने आया है। अभी तक बैंक खातों में दर्ज हो रहे मामलों में पूछताछ के बाद यह पता चला है कि खाताधारक के पास जो कॉल आई थी वह बैंक के नाम से दिख रही थी। 100 से भी ज्यादा मामले ऐसे हैं जिनमें उच्च शिक्षा प्राप्त और खुद को हाईटेक मानने वाले लोग ठगी के शिकार हुए हैं। कुछ लोग तो इस वजह से सामने नहीं आ रहे कि कहीं उन्हें मूर्ख न समझ लिया जाए। इसमें लोगों को जागरूक होने की जरूरत है।
- राजेश कुमार यादव, एसपी क्राइम
इन बिन्दुओं को लेकर रहें हमेशा सतर्क
1. ट्रूकॉलर पर आए किसी बैंक या अन्य नाम पर भरोसा न करें, बैंक के कस्टर केयर से खुद कॉल करके जानकारी लें।
2. ट्रूकॉलर इंस्टॉल करना जरूरी समझ रहे हैं तो अपने कांटैक्ट्स, ईमेल, मैसेज को रीड करने की अनुमति कत्तई न दें।
3. मोबाइल पर आने वाले किसी भी मैसेज या मेल का ध्यान न दें जिसमें आपको राहत देने की बात कही जा रही हो।
4. किसी भी थंब इंप्रेशन मशीन पर अंगूठा या अंगुली रखने से तब तक बचें जब तक कि उसके सही होने की पुष्टि न हो।
5. मोबाइल या कंप्यूटर पर अपने बैंक या एटीएम की जानकारी साझा न करें। एटीएम बूथ में रकम निकालने अकेले जाएं।
6. फेसबुक के माध्यम से जान-पहचान बनाकर आत्मीयता स्थापित करने वालों को व्यक्तिगत जानकारी न दें।
7. फेसबुक फ्रेंड अथवा मैसेंजर पर मैसेज करने वाले किसी भी शख्स के झांसे में न आएं। मेल पर भी गौर न करें।
8. किसी भी ऑनलाइन लॉटरी या प्रतियोगिता आदि का विजेता होने का कोई लालच दे तो उसके झांसे में न आएं।
9. फेसबुक, व्हाट्सएप एवं वाई-फाई आदि का पासवर्ड किसी को न बताएं। इसे समय-समय पर बदलते भी रहें।
10. साइबर कैफे में जाने से बेहतर है कि अपने मोबाइल ही इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन बैंकिंग का इस्तेमाल करें।


