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Hindi News उत्तर प्रदेशइंसेफेलाइटिस के 25% मामलों में वजह नामालूम, देश के 8 संस्‍थान मिलकर करेंगे शोध 

इंसेफेलाइटिस के 25% मामलों में वजह नामालूम, देश के 8 संस्‍थान मिलकर करेंगे शोध 

इंसेफेलाइटिस के प्रसार पर भले ही अंकुश लग गया हो मगर आज भी यह अबूझ पहेली बना हुआ है। एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (AES) से जूझ रहे 25% मरीजों में बीमारी की वजह का पता नहीं चल पाता है।

इंसेफेलाइटिस के 25% मामलों में वजह नामालूम, देश के 8 संस्‍थान मिलकर करेंगे शोध 
Ajay Singhमनीष मिश्र ,गोरखपुरTue, 18 Jun 2024 06:07 AM
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Encephalitis in UP :  उत्तर प्रदेश में इंसेफेलाइटिस के प्रसार पर भले ही अंकुश लग गया हो मगर आज भी यह अबूझ पहेली बना हुआ है। एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से जूझ रहे 25 फीसदी मरीजों में बीमारी की वजह का पता नहीं चल पाता है। अब इस पहले को सुलझाने के लिए आईसीएमआर व रीजनल मेडिकल रिसर्च सेंटर (आरएमआरसी) ने बड़े शोध की पहल की है। इसको लेकर आईसीएमआर ने देशभर के आठ संस्थानों की संयुक्त रिसर्च टीम बनाई है। 

आरएमआरसी, गोरखपुर के निदेशक डॉ. कृष्णा पांडेय और वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. गौरव राज द्विवेदी की अगुवाई में टीम का गठन हुआ है। डॉ. गौरव ने बताया कि आमतौर पर इंसेफेलाइटिस के मरीजों की पहचान के लिए छह प्रकार की जांच की जाती है। इसमें जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई), डेंगू और चिकनगुनिया वायरस से होने वाली बीमारी है। जबकि लैप्टोस्पायरा और स्क्रब टायफस बैक्टीरियाजनित और मलेरिया परजीवी से होने वाली बीमारी है। 

रिसर्च टीम में इन संस्थानों के विशेषज्ञ
डॉ. गौरव के मुताबिक, हर साल करीब 25 फीसदी मरीज ऐसे मिल रहे जिनमें बीमारी की वजह का पता नहीं चलता है। अब रहस्य से पर्दा उठेगा। इसके लिए आईसीएमआर दिल्ली के साथ ही आरएमआरसी गोरखपुर, एनआईवी पुणे, एनआईएवी हैदराबाद, एनसीईडी कोलकाता, आरएमआरसी नार्थ-ईस्ट व एनआईआरटीएच जबलपुर के साथ टीम बनाई गई है। इसमें पहले चरण में एंट्रो वायरस, हरपीज के छह प्रकार के वायरस और न्यूरो सिस्टी सरकोसिस का पता लगाया जाएगा।

45 प्रकार की जांचों से बैक्टीरियल इन्फेक्शन की होगी पहचान
डॉ. गौरव ने बताया कि आरएमआरसी में कई आधुनिक मशीनें लगी है। यहां पर आटोमेटेड माइक्रोबियल सिस्टम वाईटेक-टू लगी। यह मशीन बैक्टीरियरा के संक्रमण को पहचानने की सबसे आधुनिक मशीन हैं। यह मशीन बैक्टीरिया की पहचान के लिए 45 प्रकार की जांचें एक साथ कर सकती हैं। इससे दुर्लभ बैक्टीरिया से हुए संक्रमण की पहचान की जा सकती है।

इतना ही नहीं बैक्टीरिया का पहचान होने पर उसको नियंत्रित करने के लिए एंटीबायोटिक की सलाह भी मशीन ही देगी। इससे अनजान बैक्टीरिया से संक्रमण की पहचान में मदद मिलेगी। यह शोध तीन वर्ष चलेगा। इस शोध के तहत पूर्वांचल और देश के अन्य हिस्सों मिलने वाले मरीजों के लक्षण में समानता और अंतर का भी अध्ययन किया जाएगा।

आरएमआरसी की बात 
आरएमआरसी के निदेशक डॉ.कृष्‍णा पाण्‍डेय ने कहा कि पूर्वांचल के साथ ही बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड और छत्तीसगढ़ में इंसेफेलाइटिस के मरीज मिलते हैं। देश के दूसरे प्रांतों और पूर्वांचल में मिलने वाले इंसेफेलाइटिस के मरीजों में समानता और अंतर को भी जांचा जाएगा।