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20 सितम्बर, 2020|1:06|IST

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राममंदिर आंदोलन के अगुआ: धर्मसंसद ने किया आह्वान- गांव-गांव शुरू हुआ शिलापूजन का अभियान

अयोध्‍या में राम मंदिर निर्माण के लिए पांच अगस्‍त को भूमि पूजन होने वाला है। ऐसे में राममंदिर आंदोलन से गहरे जुड़े रहे लोगों को बार-बार महंत अवेद्यनाथ की याद आ रही है। महंत अवेद्यनाथ ने 26 जुलाई 1988 को ही अपने इरादे जाहिर कर दिए थे। विहिप के केंद्रीय महामंत्री रहे अशोक सिंघल और प्रदेश महामंत्री श्रीश्रीशचंद्र दीक्षित के साथ देश में राजनीतिक परिवर्तन का संकल्‍प लेते हुए साफ कह दिया था कि इसके बिना जन्‍मभूमि की मुक्ति सम्‍भव नहीं है। इस एलान के साथ ही तय हुआ कि राम में आस्‍था रखने वाले देश-दुनिया के हर व्‍यक्ति को रामजन्‍मभूमि के मुक्तिसंग्राम से जोड़ना होगा। जनवरी 1989 में प्रयागराज में हुई धर्मसंसद में देश के हर गांव से पूजित एक श्रीरामशिला और हर आस्‍थावान व्‍यक्ति से सवा रुपए जुटाने का आह्वान हो गया।

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इस आह्वान से गांव-गांव में उत्‍साह फैल गया था। छोटे-छोटे कार्यक्रम होते थे। शिलापूजन एक प्रतीक था। गोरक्षनाथ संस्‍कृत विद्यापीठ के पूर्व छात्र और वर्तमान में जेएनयू (नई दिल्‍ली) में संस्‍कृत एवं प्राच्‍य शिक्षा अध्‍ययन संस्‍थान के संकाय प्रमुख प्रो.संतोष शुक्‍ल विवादित ढांचे का ताला खोले जाने और धर्मसंसद के बाद देश भर में चले शिलापूजन अभियान के गवाह हैं। वह बताते हैं कि गांववाले इस विश्‍वास के साथ कार्यक्रम में शामिल होते थे कि ये ईंटें रामजन्‍मभूमि पर प्रस्‍तावित भव्‍य मंदिर में लगेंगी। शिलापूजन ने सारे देश के माहौल को राममय बना दिया। इसमें गरीब-अमीर और सभी जाति के लोगों ने बढ़चढ़ कर भाग लिया। सारे भेद मिट गए। राममंदिर के लिए हिन्‍दू समाज पहली बार इस तरह एकजुट नज़र आने लगा।

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इसके पहले 19 अक्‍टूबर 1988 को अयोध्‍या में सरयू तट पर सात ईंटों का विधिवत पूजन करके यज्ञ शाला की सात परिक्रमा की गई। उसी समय श्रीराम जन्‍मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए नौ नवम्‍बर 1989 की तारीख का एलान भी कर दिया गया था। नाथ पंथ के जानकार और महाराणा प्रताप पीजी कालेज के प्राचार्य डा.प्रदीप राव बताते हैं कि 40 दिन तक शिलापूजन का कार्यक्रम तीन लाख गांवों में चला।  30 सितम्‍बर 1989 से नौ नवम्‍बर 1989 तक देश के कोने-कोने से शिलाएं अयोध्‍या पहुंचीं। इस दौरान राम मंदिर आंदोलन गांव-गांव तक फैल गया। इसी वजह से 30 अक्टूबर 1989 को राममंदिर के शिलान्यास और 30 अक्टूबर से दो नवंबर 1990 के कारसेवा कार्यक्रम को अपार जनसमर्थन मिला।

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विदेश से भी आईं शिलाएं
राममंदिर निर्माण के लिए देश के कोने-कोने से ही नहीं अमरीका, इंग्लैंड, आस्‍ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और हालैंड से भी राम-शिलाएं अयोध्‍या पहुंची। शुरुआती एक दशक तक इन शिलाओं को विवादित स्थल से कुछ दूर फकीरेराम मंदिर में रखा गया। 1998 में इन्हें रामघाट स्थित मंदिर निर्माण कार्यशाला परिसर में ले जाया गया। इस बीच मंदिर के लिए पत्‍थर तराशने का काम भी चलता रहा। इन शिलाओं के इस्‍तेमाल का वक्‍त अब आया है। पांच अगस्‍त को मंदिर की नींव से इसकी शुरुआत होगी।

देवरहवा बाबा ने दिया साथ बोले-हर हाल में बनेगा राममंदिर
एक फरवरी 1989 को प्रयागराज महाकुंभ में देश भर से जुटे साधु संन्‍यासियों के बीच प्रसिद्ध संत देवरहवा बाबा ने राममंदिर आंदोलन को एक नई उर्जा से भर दिया। अपने भाषण में उन्‍होंने कहा,'श्रीराम जन्‍मभूमि हिन्‍दुओं की है और वहां मंदिर अवश्‍य बनेगा।' 

'रामजन्‍मभूमि आंदोलन का इतिहास' पर अपने शोध आलेख में महराणा प्रताप पीजी कालेज के वरिष्‍ठ शिक्षक डा.‍अविनाश प्रताप सिंह लिखते हैं,'महंत अवेद्यनाथ ने श्रीरामजन्‍म भूमि आंदोलन को राष्‍ट्रव्‍यापी स्‍वरूप देने में महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्‍हें पता था कि जन्‍मभूमि की मुक्ति के लिए इसे जन-जन का मुद्दा बनाना होगा। उनके नेतृत्‍व में अलग-अलग समय पर उस समय के मुख्‍यमंत्री और प्रधानमंत्री से राममंदिर आंदोलन के नेताओं की मुलाकातें होती रहीं। लेकिन इन मुलाकातों के हर बार बेनतीजा रह जाने से महंत अवेद्यनाथ का स्‍पष्‍ट मत बन गया था कि अनुकूल राजनीतिक शक्ति के बिना राममंदिर जैसा लक्ष्‍य हासिल करना मुश्किल है। इसी मत के चलते धर्मसंसद के प्रस्‍ताव पर उन्‍होंने राजनीति में लौटना स्‍वीकार किया और सड़क से संसद तक राममंदिर आंदोलन को गति देने में खुद को पूरी तरह समर्पित कर दिया। 

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  • Web Title:rammandir temple movement shilapujan in villages in leadership of mahant avaidyanath