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20 सितम्बर, 2020|7:08|IST

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आंदोलन के अगुआ: गुरु की मशाल थाम राममंदिर के लिए आजीवन लड़े महंत अवेद्यनाथ 

अयोध्‍या में श्रीरामजन्‍मभूमि पर मंदिर निर्माण की अधूरी इच्‍छा के साथ गोरक्षपीठाधीश्‍वर महंत दिग्विजयनाथ ने 28 सितम्‍बर 1969 को समाधि ले ली। उनके उत्‍तराधिकारी महंत अवेद्यनाथ ने भी गोरक्षपीठाधीश्‍वर बनते ही एलान कर दिया कि राम जन्‍मभूमि की मुक्ति तक चैन से नहीं बैठेंगे।

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महंत अवेद्यनाथ का मानना था कि देश में राजनीतिक परिवर्तन किए बगैर उनका लक्ष्‍य पूरा नहीं होगा। इसके लिए उन्‍होंने हिन्‍दू समाज के संगठन पर अपना ध्‍यान केंद्रित किया। 1980 में महंत अवेद्यनाथ ने राजनीति से संन्‍यास ले लिया था लेकिन मंदिर निर्माण को लेकर उनका संघर्ष चलता रहा। 1984 में उन्‍हें एक बड़ी कामयाबी मिली। लगातार कोशिश करते-करते आखिरकार वह देश के शैव-वैष्‍णव, सभी पंथों के धर्माचार्यों को एक मंच पर लाने में कामयाब रहे। श्रीराम जन्‍मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन किया गया। महंत अवेद्यनाथ इसके आजीवन अध्‍यक्ष रहे। उधर, देश में राममंदिर आंदोलन के लिए जन समर्थन जुटाने का अभियान चल पड़ा।

इधर, कानून-व्‍यवस्‍था कायम रखने के लिए जन्‍मभूमि पर तैनात पुलिसकर्मियों ने विवादित ढांचे के भीतरी आंगन के दरवाजे पर ताला लगा दिया। जनता को पूजा के लिए अंदर जाने से रोक दिया गया। 24 सितम्‍बर 1984 को बिहार के सीतामढ़ी से श्रीराम जानकी रथयात्रा निकाली गई। यह रथ छह अक्‍टूबर 1984 को अयोध्‍या पहुंचा। सात अक्‍टूबर 1984 को अयोध्‍या में सरयू नदी के तट पर हजारों रामभक्‍तों ने संकल्‍प लिया। इसी तरह की सभाएं प्रयाग और अन्‍य स्‍थानों पर भी हुईं। आठ अक्‍टूबर 1984 को रथयात्रा के लखनऊ पहुंचने पर बेगम हजरत महल पार्क में सम्‍मेलन हुआ जिसमें 10 लाख से अधिक लोगों ने हिस्‍सा लिया। 31 अक्‍टूबर और एक नवम्‍बर 1985 को कर्नाटक के उडुपी में हुए धर्मसंसद के दूसरे अधिवेशन में 175 सम्‍प्रदायों के 850 धर्माचार्य शामिल हुए।

गोरखनाथ संस्‍कृत विद्यापीठ के पूर्व छात्र और वर्तमान में जेएनयू दिल्‍ली के संस्‍कृत एवं प्राच्‍य विद्या अध्‍ययन संस्‍थान के संकाय प्रमुख प्रो.संतोष शुक्‍ल बताते हैं कि महंत अवेद्यनाथ के सभी धर्माचार्यों के साथ बड़े अच्‍छे सम्‍बन्‍ध थे। धर्मसंसद में सबकी मौजूदगी इसका प्रमाण थी। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के शोध अध्‍येता रहे डॉ.सचिन राय 'श्री रामजन्‍म भूमि आंदोलन और गोरक्षपीठ' विषय पर अपने शोध आलेख में बताते हैं कि इसी धर्मसंसद में निर्णय हुआ कि ताला नहीं खुला तो सारे देश के हजारों धर्माचार्य अपने लाखों शिष्‍यों के साथ 9 मार्च 1986 से सत्‍याग्रह करेंगे। दिगम्‍बर अखाड़े के महंत परमहंस रामचंद्रदास ने घोषणा कर दी थी कि यदि तब तक ताला नहीं खोला गया तो वह आत्‍मदाह कर लेंगे। सत्‍याग्रह के संचालन के लिए महंत अवेद्यनाथ को अखिल भारतीय संयोजक नियुक्‍त किया गया। 51 प्रमुख धर्माचार्यों की एक अखिल भारतीय संघर्ष समिति गठित की गई। एक फरवरी 1986 को फैजाबाद के जिला जज ने विवादित ढांचे के दरवाजे पर लगा ताला खोलने का आदेश दिया तो वहां महंत अवेद्यनाथ मौजूद थे।

यह निर्णय सुनाने वाले जिला जज कृष्‍ण मोहन पांडेय गोरखपुर के ही जगन्‍नाथपुर मोहल्‍ले के थे। कहते हैं कि इस निर्णय के बाद तत्‍कालीन सरकार से उनकी नाराजगी हो गई और उनका तबादला ग्वालियर हाईकोर्ट कर दिया गया। 1995 में सेवानिवृत्त होने के बाद कृष्ण मोहन पांडेय ने 'अंतरात्मा की आवाज' किताब लिखी, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया कि अयोध्या में राम मंदिर कहे जाने वाले स्थान के बारे में उन्‍होंने जो फैसला लिया वह उनकी अंतरात्मा की आवाज थी।

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नाथ पंथ के जानकार और महाराणा प्रताप पीजी कालेज के प्राचार्य डा.प्रदीप राव ने बताया कि उस निर्णय के बाद महंत अवेद्यनाथ और अन्‍य धर्माचार्यों के आह्वान पर घर-घर दीये जलाए गए थे। 22 सितम्‍बर 1989 को उनकी अध्‍यक्षता में दिल्‍ली में विराट हिन्‍दू सम्‍मेलन हुआ। इसमें नौ नवम्बर 1989 को जन्‍मभूमि पर शिलान्‍यास कार्यक्रम घोषित किया गया। तय समय पर एक दलित से शिलान्‍यास कराकर महंत अवेद्यनाथ ने आंदोलन को सामाजिक समरसता से जोड़ दिया।

2012 में प्रकाशित पुस्‍तक 'राष्‍ट्रीयता के अनन्‍य साधक महंत अवेद्यनाथ' में उल्‍लेख है कि 1989 में हरिद्वार के संत सम्‍मेलन में उन्‍होंने मंदिर निर्माण की तारीख घोषित कर दी तो तत्‍कालीन गृहमंत्री बूटा सिंह और मुख्‍यमंत्री नारायण दत्‍त तिवारी ने उनसे मुलाकात की। बूटा सिंह इसे स्‍थगित कराना चाहते थे। कहते हैं कि बूटा सिंह की पूरी बात सुनने के बाद महंत अवेद्यनाथ ने जवाब दिया- 'यह फैसला करोड़ों लोगों का है।' निर्माण शुरू कराने के लिए वह दिल्‍ली से अयोध्‍या के लिए रवाना हुए तो पनकी में गिरफ्तार कर लिए गए।

मंदिर को लेकर सरकार से गोरक्षपीठाधीश्‍वर का संघर्ष चलता रहा। 23 जुलाई 1992 को उनकी अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिम्‍हा राव से मुलाकात की। बात नहीं बनी तो 30 अक्‍टूबर 1992 को दिल्‍ली में हुए पांचवें धर्मसंसद में छह दिसम्‍बर 1992 को मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा शुरू करने का निर्णय लिया गया। कारसेवा के नेतृत्‍वकर्ताओं में महंत अवेद्यनाथ शामिल रहे। 

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  • Web Title:ramjanm bhoomi aandolan mahant avaidyanath leads movement after mahant digvigaynath