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Hindustan Special: यूपी की इस जेल में आत्मनिर्भर बन रहे कैदी, IPL की तर्ज पर JPL का भी आयोजन

यूपी का मेरठ जेल बेहद खास है। यहां कैदियों को आत्मनिर्भर के साथ नई जिंदगी की शुरुआत करने का तरीका सिखाया जाता है। यहां कैदी स्पोर्ट्स का सामान बनाने के साथ खेलकूद भी करते हैं।

Hindustan Special: यूपी की इस जेल में आत्मनिर्भर बन रहे कैदी, IPL की तर्ज पर JPL का भी आयोजन
Pawan Kumar Sharmaसलीम अहमद,मेरठTue, 06 Feb 2024 10:34 PM
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जेल के अंदर बंद बंदियों को लेकर आमतौर पर सभी के एक जैसे ही विचार होते हैं, लेकिन वेस्ट यूपी की एक जेल ऐसी भी है जहां पर कैदियों को आत्मनिर्भर के साथ नई जिंदगी की शुरुआत करने का तरीका सिखाया जा रहा है। जी हां हम बात कर रहे हैं चौधरी चरण सिंह जिला जेल की। चौधरी चरण सिंह जिला जेल में कैदी आत्मनिर्भर बनने के लिए अब स्पोर्ट्स गुड्स का निर्माण कर रहे हैं। जो लोगों के बीच खासे लोकप्रिय हो रहे हैं। जेल के बाहर ही इन उत्पादों की बिक्री के लिए मुलाकाती पर्ची स्थल पर आउटलेट की स्थापना की गई है, जहां से लोग बंदियों द्वारा बनाए गए उत्पादों की खरीदारी करते हैं।

स्पोर्ट्स सिटी के तौर पर वैश्विक पहचान रखने वाले जिला जेल में बंद कैदी भी आत्मनिर्भरता की किक मारते नजर आ रहे हैं। सूबे में चौधरी चरण सिंह जिला जेल इकलौती जेल है, जहां स्पोर्ट्स गुड्स बनाए जाते हैं। यहां का बना हुआ खेल उत्पाद आम लोगों को बिक्री के लिए बाजार पहुंचाया जाता है। आमतौर पर स्पोर्ट्स सिटी मेरठ के बने हुए खेल उत्पाद वैश्विक पटल पर अपनी धाक रखते हैं। यहां के बने हुए बैट, बॉल, फुटबॉल, वॉलीबॉल, बैडमिंटन रैकेट और हैमर डिस्कस जैसे खेल प्रोडक्ट्स पूरे विश्व में अपनी बादशाहत कायम रखे हुए हैं। शायद यहां की माटी का ही असर है कि अब मेरठ जिला कारागार के बंदी भी खेलकूद का सामान बना रहे हैं। आमतौर पर प्रदेश की ज्यादातर जेलों में बंदी तमाम चीजें सीखते हैं, लेकिन मेरठ का चौधरी चरण सिंह जिला कारागार इकलौती जेल है जहां खेल उत्पाद बनते हैं। बंदी यहां फुटबॉल, वॉलीबॉल और अन्य स्पोर्ट्स किट बनाकर आत्मनिर्भर बन रहे हैं।

हर महीने से 1500 से 2000 फुटबाल बनाते हैं बंदी

जिला जेल में हर महीने बंदी तकरीबन 1500 से 2000 फुटबॉल-वॉलीबॉल बना लेते है। वहीं 30 से अधिक बंदी स्पोर्ट्स किट बनाने का कार्य करते हैं। खेल उत्पाद बनाकर इन बंदियों की चार से पांच हजार तक की कमाई हो जाती है। जेल अधीक्षक ने बताया कि बंदियों के हाथों बना यह सामान जेल मुख्यालय के आउटलेट में लोगों के लिए बिक्री के लिए उपलब्‍ध है। जेल के बाहर मुलाकाती पर्ची स्थल पर आउटलेट की स्थापना की गई है, वहीं से लोग सामान की खरीदारी करते हैं।

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जेपीएल प्रीमियर लीग

आईपीएल की तर्ज पर बीते दिनों मेरठ जेल में जेपीएल यानी जेल प्रीमियर लीग का आयोजन किया गया था। जेल प्रीमियर लीग में बंदी और बंदी रक्षक शामिल हुए थे। जेल अधीक्षक की मानें, तो इस तरह के आयोजन कोरोना काल में बंदियों को अवसाद से निकालने में मददगार साबित हुए थे। खेल के साथ पठन पाठन के क्षेत्र में भी यहां के बंदी दिलचस्पी ले रहे हैं। इग्नू के क्षेत्र में चार सौ से अधिक बंदी रजिस्टर्ड हैं। हाईस्कूल और इंटरमीडिएट में बंदियों ने बाजी बारी। करीब 1700 बंदियों की क्षमता वाली जेल में आज की तारीख में करीब 2800 बंदी और 39 बैरक हैं।

जिला जेल में उगाई जाती है ऑर्गेनिक खेती

जिला जेल की जमीन पर गेंहू का उत्पादन होता है। आलू बोया जाता है। यहां का आलू गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर जेल में जाता है। हरी सब्जियों के लिए भी जमीन आरक्षित है। जेल में ऑर्गेनिक खेती भी की जाती है। इस जेल में 1857 से फांसीघर भी मौजूद है। इस फांसीघर की भी रोज देखरेख की जाती है और उसे मेनटेन रखा गया है।

बंदी पुनर्वास और सहकारी समिति है पंजीकृत

जिला कारागार मेरठ में पूर्व से ही बंदी पुनर्वास और सहकारी समिति पंजीकृत है। अब तक जेल में बाहर से रॉ मटेरियल आता था। उसके बाद सारा काम किया जाता था, जो भी रॉ मटेरियल लेकर आते थे, उन्हीं को वो काम दिया जाता था और उसी के आधार पर बंदियों को भुगतान होता था, क्योंकि जेल में कोऑपरेटिव सोसायटी रजिस्टर्ड है। बताया कि अब प्रत्येक कारागार में कल्याण पुनर्वास कौशल विकास के लिए संचालित उद्योगों के द्वारा जो भी प्रोडक्ट बनाए जा रहे हैं, उनके लिए जेल परिसर में ही एक आउटलेट स्थापित किया। जेल में वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट के तहत स्पोर्ट्स गुड्स का चयन हुआ है, जो कि यहां बनाए जाएंगे और फिर आम जनता के लिए आउटलेट खोला गया है, यहां पर उत्पाद बिक्री के लिए उपलब्ध है।

बंदियों ने बनाया हर्बल पार्क

जिला जेल में अनोखा नजारा देखने को मिल रहा है। यहां सेहतमंद रहने के लिए जेल परिसर में हर्बल पार्क तैयार किया गया। इस पार्क में विभिन्न प्रकार की जड़ी बूटियां लगाई गई हैं, ताकि जरूरत के हिसाब से उन जड़ी बूटियों से बंदियों की हर प्रकार की बीमारियों को दूर किया जा सके। जेल परिसर में हल्दी, एलोवेरा, अदरक, पुदीना, नीम, कच्ची हल्दी, आंवला, बेसिल, अकरकरा, तुलसी, काली तुलसी, स्टीविया, बेल, सहजन, गिलोय, जटामांसी समेत 45 प्रकार की जड़ी बूटियां लगाई गई हैं। इसके साथ संतरा, अनार, मौसमी और चीकू के पौधे भी लगाए गए हैं। खास बात यह कि इनकी देखभाल जेल के बंदी ही करते हैं। यहां विभिन्न कार्यक्रमों में आयुर्वेदाचार्य भी आते हैं। उनके द्वारा बताई गई पद्धति के अनुसार ही हर्बल पार्क को तैयार किया गया है। मेरठ जेल में हर्बल पार्क के अलावा कई ऐसे कार्यक्रम आयोजित कराए जा रहे हैं, जिससे बंदियों के व्यवहार में बदलाव आए और वह फिर से बेहतर जीवन की ओर लौट सकें।

बंदी सीख रहे इंग्लिश और कंप्यूटर

जिला कारागार में बंदियों को फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने की क्लास दी जा रही है। बंदियों के व्यक्तित्व विकास के लिए ये खास पहल की गई है। प्रतिदिन अंग्रेजी सिखाने वाले टीचर्स जेल के अंदर आते हैं और बंदियों को फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने के गुर सिखाते हैं। अंग्रेजी के अतिरिक्त बंदी कम्प्यूटर नॉलेज को भी अपग्रेड कर रहे हैं। बंदियों को कम्प्यूटर पर हिंदी और अंग्रेजी टाइपिंग भी सिखाई जा रही है। जेल अफसर कहते हैं कि जब बंदी जेल से बाहर निकलेंगे तो इससे उन्हें रोजगार मिलने में आसानी होगी। जो बंदी अंग्रेजी सीखना चाहते हैं वो अंग्रेजी सीखें। जो कम्प्यूटर सीखना चाहते हैं वो कम्प्यूटर सीखें और जो जैविक खेती के गुर सीखना चाहते हैं उन्हें भी प्रशिक्षित किया जा रहा है। इससे बंदियों में आत्मविश्वास आएगा और वो अपने पैर पर खड़े हो सकेंगे।

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