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दुनिया में सिर्फ 41 लोग हुए हैं इस बीमारी के शिकार, AIIMS गोरखपुर ने बचा ली महिला की जान 

Rarest Disease: एम्स गोरखपुर ने दुर्लभतम बीमारी का इलाज कर एक युवती की जान बचा ली। युवती को प्यूबिक सिम्फायसिस में TB हो गया था। दुनिया में अब तक सिर्फ 41 लोगों में इसकी पुष्टि हुई है।

दुनिया में सिर्फ 41 लोग हुए हैं इस बीमारी के शिकार, AIIMS गोरखपुर ने बचा ली महिला की जान 
Ajay Singhमनीष मिश्र,गोरखपुरTue, 28 Nov 2023 07:35 AM
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Tuberculosis of the pubic symphysis: एम्स गोरखपुर ने दुर्लभतम बीमारी का इलाज कर एक युवती की जान बचाई है। युवती को प्यूबिक सिम्फायसिस में टीबी हो गया था। दुनिया में अब तक सिर्फ 41 लोगों में इस बीमारी की पुष्टि हुई है। खास बात यह कि युवती को बीमारी दो बार (रिकरेंस) हुई, जो पहला मामला है।

शहर की रहने वाली युवती करीब ढाई वर्ष पूर्व पेट के निचले हिस्से और कमर में होने वाले बेतहाशा दर्द का इलाज करने एम्स पहुंची थी। वह चल नहीं पा रही थी। इससे पूर्व वह करीब छह महीने तक अलग-अलग अस्पतालों में इलाज करा चुकी थी। एम्स में ऑर्थोपेडिक विभाग के डॉक्टरों को कूल्हे के अंदर पेल्विस में मौजूद प्यूबिक सिम्फायसिस के जोड़ में टीबी का संदेह हुआ।

बेहद दुर्लभ है ये बीमारी 
प्यूबिक सिम्फायसिस में टीबी यह कूल्हे में आंतरिक जोड़ होता है, जहां टीबी के बैक्टीरिया का पहुंचना लगभग असंभव जैसा होता है। विश्व में इसके पहले सिर्फ 40 केस ही रिपोर्टेड हैं। कार्यकारी निदेशक डॉ. सुरेखा किशोर के निर्देशन में आर्थोपेडिक सर्जन डॉ. राजनंद कुमार, डॉ. नीतिश कुमार, डॉ. अजय भारती, डॉ. सुधीर श्याम कुशवाह, डॉ. विवेक कुमार और डॉ. मिलिंद चंद चौधरी की टीम ने इसकी पहचान की। एमआरआई में पुष्टि के बाद युवती का इलाज शुरू किया गया।

छह महीने बाद युवती ने छोड़ दी दवा 
डॉ.सुधीर ने बताया कि हड्डी में होने वाली टीबी को मस्क्युलोटल टीबी कहते हैं। पीड़ित युवती को टीबी के ग्रेड वन दवा की कोर्स शुरू किया गया। यह कोर्स करीब नौ महीने का है। युवती ने छह महीने तक दवा का संजीदगी से सेवन किया। इससे वह पूरी तरह स्वस्थ हो गई। दर्द और बीमारी के अन्य लक्षण खत्म हो गए। इसके बाद युवती ने शेष तीन महीने का कोर्स पूरा नहीं किया।

दोबारा बीमारी में तेजी से बिगड़ी हालत
डॉ. सुधीर ने बताया कि दवा छोड़ने के तीन महीने बाद युवती की हालत फिर बिगड़ने लगी। दोबारा उसे कमर और पेट में दर्द होने लगा। उसे खाना तक नहीं पच रहा था। हालत गंभीर होने पर परिवारीजन एक बार फिर उसे एम्स लेकर पहुंचे। इस बार उसके पेल्विस में प्यूबिक सिम्फायसिस गांठ की बायोप्सी कराई। बायोप्सी में पता चला कि टीबी का बैक्टीरिया फिर सक्रिय हो गया है। इसके बाद युवती का एक साल तक इलाज चला। अब वह पूरी तरह ठीक है।

दोबारा टीबी का पहला मामला
डॉ. सुधीर ने बताया कि इसे दुलर्भतम बीमारी की श्रेणी में रखा जाता है। विश्व में इससे पहले प्यूबिक सिम्फायसिस में टीबी के सिर्फ 40 केस ही रिपोर्टेड हैं। उसमें पहली बार ऐसा मामला हुआ कि मरीज को दोबारा टीबी हुआ हो। यह रिसर्च अंतराष्ट्रीय जर्नल पबमेड के अक्तूबर अंक में प्रकाशित हुई है।

क्‍या बोला एम्‍स प्रशासन
कार्यकारी निदेशक डॉ.सुरेखा किशोर ने कहा कि एम्स गोरखपुर में मरीजों को उच्च गुणवत्ता का इलाज मिल रहा है। मरीजों की डॉक्टर गहनता से जांच कर रहे हैं। यही वजह है कि दुर्लभ बीमारियों के लक्षण वाले मरीजों की सहज पहचान हो रही है। उनका सटीक इलाज हो रहा है।

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