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घोसी के रण में ओमप्रकाश राजभर के सियासी कौशल की परीक्षा, टिकीं सबकी निगाहें

UP Lok Sabha elections: यूपी में लोकसभा चुनाव में घोसी सीट के रण में ओमप्रकाश राजभर के सियासी कौशल की परीक्षा होगी। ऐसे में सबकी निगाहें घोसी के चुनावी संग्राम पर टिक गई हैं।

घोसी के रण में ओमप्रकाश राजभर के सियासी कौशल की परीक्षा, टिकीं सबकी निगाहें
Deep Pandeyराजकुमार शर्मा,लखनऊSun, 14 Apr 2024 10:58 AM
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UP Lok Sabha elections: यूपी की हॉट सीटों की बात करें तो घोसी भी उनमें शामिल हो गई है। सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के बेटे अरविंद के चुनाव मैदान में होने और इस सीट पर विपक्ष द्वारा बुने सियासी ताने-बाने ने इसे खास बना दिया है। ऐसे में सबकी निगाहें घोसी के चुनावी संग्राम पर टिक गई हैं। घोसी के रण में ओमप्रकाश राजभर के सियासी कौशल की परीक्षा है। बेटे को सांसद बनाने के लिए उन्हें भाजपाइयों को साधना है। पिछड़े वोटों में बिखराव रोकना है। मुख्तार अंसारी फैक्टर से निपटना है। वहीं दारा सिंह चौहान की पहलवानी का फैसला भी इसी अखाड़े में होना है।

घोसी का मैदान भाजपा के लिए कभी मुफीद  नहीं रहा। सिर्फ 2014 की मोदी लहर को छोड़ दें तो भाजपा को इस सीट पर कभी सफलता नहीं मिली। शायद यही सोचकर भाजपा ने समझौते में यह सीट अपने सहयोगी सुभासपा को दे दी। पूर्वी यूपी के राजभर वोटों पर दावेदारी करने वाले ओमप्रकाश राजभर ने अपने बेटे को संसद भेजने के लिए इसे सबसे मुफीद समय माना। मगर शायद तब उन्हें अंदाजा न रहा हो कि उनका बड़बोलापन कैसे उनके बेटे की राह मुश्किल कर देगा। 2022 के चुनाव में भाजपाइयों को निशाने पर रखने वाले राजभर के भगवा खेमे के कार्यकर्ता पूरे दमखम से जुटने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में ओमप्रकाश राजभर को अपना अधिकांश समय घोसी में ही देना पड़ रहा है। भाजपा के प्रदेश से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक वे गुहार लगा चुके हैं कि सबके जुटे बिना नैया पार नहीं होगी। 

सपा-बसपा का चक्रव्यूह तोड़ने की चुनौती
दरअसल सपा और बसपा ने भी इस सीट पर राजभर की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। घोसी विधानसभा उपचुनाव में जीत के बाद सपा के हौंसले बुलंद हैं। समाजवादी पार्टी ने राजीव राय पर दांव लगाकर अगड़ों को साधने का प्रयास किया है। वहीं रही-सही कसर बसपा सुप्रीमो मायावती ने पूरी कर दी है। उन्होंने पूर्व सांसद बालकृष्ण चौहान को प्रत्याशी बनाकर पिछड़े वर्ग के वोटों में बिखराव की पटकथा लिख दी है। बालकृष्ण चौहान के आने से इस सीट पर रोमांचक त्रिकोंणीय मुकाबले की स्थिति बन गई है। अब देखना दिलचस्प होगा कि सुभासपा प्रमुख कैसे इस चक्रव्यूह को भेदकर बेटे की जीत की राह प्रशस्त करते हैं।

मुख्तार फैक्टर से भी निपटना होगा
ओमप्रकाश राजभर के रणनीतिक कौशल का इम्तिहान यहीं खत्म नहीं होता। यह सीट हाल ही में बांदा जेल में मरने वाले मुख्तार अंसारी के परिवार के प्रभाव वाली मानी जाती है। खुद मुख्तार अंसारी के बेटे अब्बास अंसारी सुभासपा से ही विधायक हैं। मगर अब ओमप्रकाश राजभर भाजपा के साथ हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि एनडीए में रहते हुए राजभर अपने बेटे के मुख्तार परिवार का रुख क्या होगा। क्या सुभासपा विधायक अब्बास इस सीट पर अरविंद राजभर के राजतिलक में मददगार होंगे?

दारा सिंह चौहान का भी इम्तिहान
घोसी के अखाड़े में दारा सिंह चौहान की पहलवानी का भी इम्तिहान होना है। नोनिया वोटों पर पकड़ मजबूत करने के नाम पर भाजपा ने घोसी विधानसभा उपचुनाव में हार के बावजूद दारा सिंह चौहान को प्रदेश सरकार में मंत्री बनाया है। घोसी उपचुनाव में दारा सिंह के लिए ओमप्रकाश राजभर ने भी पूरा दमखम लगाया था मगर बात नहीं बन पाई थी। अब बसपा द्वारा पूर्व सांसद बालकृष्ण चौहान को मैदान में उतारने के बाद सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि दारा सिंह अपने सजातीय वोटों में बिखराव रोकने और उन्हें अरविंद राजभर को दिलाने में कितना सफल हो पाते हैं।
 

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