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Hindi News उत्तर प्रदेशएनडीए हो या ‘इंडिया’ यूपी में दलित आएंगे साथ तभी बनेगी 2024 में बात, समझें कैसे?

एनडीए हो या ‘इंडिया’ यूपी में दलित आएंगे साथ तभी बनेगी 2024 में बात, समझें कैसे?

यूपी में दलित को रिझाने में सभी पार्टियां लगी हैं। तरह-तरह के दांव खेले जा रहे हैं। यूपी में सभी जानते हैं चाहे एनडीए हो या ‘इंडिया’ यूपी में दलित साथ आएंगे तभी बनेगी 2024 में बात बनेगी।

एनडीए हो या ‘इंडिया’ यूपी में दलित आएंगे साथ तभी बनेगी 2024 में बात, समझें कैसे?
Deep Pandeyराजकुमार शर्मा,लखनऊTue, 03 Oct 2023 05:40 AM
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यूपी में इन दिनों एनडीए और इंडिया में दलित मतदाताओं को रिझाने की होड़ मची है। जहां तक भाजपा का सवाल है तो पार्टी ने खतौली, घोसी और मैनपुरी उपचुनावों के नतीजों से सबक लेकर दलितों में पैठ बढ़ाने को बड़ी मुहिम छेड़ दी है। पार्टी दलित बस्तियों में संपर्क के साथ ही प्रदेश भर में दलित सम्मेलन करने जा रही है। एनडीए हो या ‘इंडिया’, दोनों ही बखूबी इस बात को समझ रहे हैं कि दलित को साथ लाए बिना 2024 में बात बनने वाली नहीं है।

सियासी दलों का यह दलित प्रेम यूं ही नहीं है। सर्वाधिक 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश की बात करें तो अनुसूचित जातियों का वोट बैंक 20 से 22 फीसदी है। यह वो आंकड़ा है, जो किसी भी गठबंधन के गुणा-गणित को बना-बिगाड़ सकता है। कभी कांग्रेस की ताकत रहे इस वोट बैंक के साथ अन्य जातियों की सोशल इंजीनियरिंग से बसपा प्रमुख मायावती चार बार सूबे की सत्ता पर काबिज हो चुकी हैं। 

भाजपा की चिंता का कारण
सत्ताधारी भाजपा इन दिनों दलितों को लेकर चिंतित है। संघ का फोकस भी इसी तबके पर है। दरअसल, भगवा दल जानता है कि विपक्षी एकता की कवायद के बाद दलित वोट बैंक ही वो हथियार है, जिससे विपक्ष के हर हमले की धार को कुंद किया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कारण ओबीसी तबका पिछले चुनावों में भाजपा की विजय का बड़ा कारक रहा है। भाजपाई रणनीतिकार मानते हैं कि यदि अगड़े-पिछड़ों की भाजपाई गोलबंदी में दलित भी साथ आए तो उसकी राह 2024 में निष्कंटक हो सकती है। एकाध को छोड़ पार्टी के मौजूदा दलित चेहरे अपने समाज में कोई खास असर नहीं छोड़ पाए हैं। ऐसे में भाजपा ने न सिर्फ अपने सांसद-विधायकों को दलित बस्तियों में उतार दिया है, बल्कि इसी माह पार्टी प्रदेश में छह बड़े दलित सम्मेलन भी करने जा रही है।

इसलिए उत्साहित है विपक्ष
इंडिया गठबंधन की बात करें तो सपा हो या कांग्रेस, वो भी किसी तरह दलितों को रिझाने की कवायद में जुटे हैं। उनकी उम्मीद इस बात को लेकर है कि खतौली, घोसी विधानसभा और मैनपुरी लोकसभा सीटों के उपचुनावों में दलित वोटरों ने भाजपा की ओर ज्यादा रुझान नहीं दिखाया या फिर वे मतदान केंद्रों तक अपेक्षित संख्या में नहीं पहुंचे। वह भी तब जबकि बसपा चुनाव मैदान में ही नहीं थी। ऐसे में उनकी कोशिश है कि आगामी लोकसभा चुनाव में किसी तरह अनुसूचित वर्ग के वोट बैंक को आकर्षित कर सकें। सपा प्रमुख का मध्य प्रदेश में पत्तल भोज भी इसी कवायद का हिस्सा था।

दलित क्यों महत्वपूर्ण
यूपी में विधानसभा की रिजर्व सीटें-86 (2 एसटी सहित)
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा जीती-64
प्रदेश में लोकसभा की आरक्षित सीटें-17, इसमें से 14 भाजपा के पास
राज्य में दलित वोट बैंक-20 से 22 फीसदी
दलित वोट बैंक के प्रभाव वाले विधानसभा क्षेत्र-300