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हिंदी न्यूज़ उत्तर प्रदेशयूपी की पहली 'ममीफाइड' बॉडी? क्‍या सच में 17 महीने तक बिना केमिकल सुरक्ष‍ित रहा विमलेश का शव, जानें क्‍या बोले एक्‍सपर्ट 

यूपी की पहली 'ममीफाइड' बॉडी? क्‍या सच में 17 महीने तक बिना केमिकल सुरक्ष‍ित रहा विमलेश का शव, जानें क्‍या बोले एक्‍सपर्ट 

कानपुर में मौत के बाद 17 महीने तक आयकर आयकर अधिकारी के शव को उनका परिवार घर में ही रखकर सेवा करता रहा। परिवार का कहना है कि उन्‍होंने किसी केमिकल का इस्‍तेमाल नहीं किया लेकिन क्‍या यह सम्‍भव है?

यूपी की पहली 'ममीफाइड' बॉडी? क्‍या सच में 17 महीने तक बिना केमिकल सुरक्ष‍ित रहा विमलेश का शव, जानें क्‍या बोले एक्‍सपर्ट 
Ajay Singhहिन्‍दुस्‍तान,कानपुरSat, 24 Sep 2022 07:46 AM
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आयकर अधिकारी विमलेश की मौत के बाद 17 महीने तक उनके शव को घर में रखकर सेवा करने वाले परिवार का कहना है कि उन्‍होंने शव को संरक्षित करने के लिए किसी केमिकल का इस्‍तेमाल नहीं किया। बल्कि परिवार तो यही मानकर चल रहा था कि विमलेश जिंदा हैं। जबकि हकीकत यह है कि उनकी मौत 17 महीने पहले ही हो चुकी थी। तो फिर विमलेश का शव आखिर 17 महीने तक बिना किसी बदबू या सड़न के सुरक्षित कैसे रहा। एक भरा पूरा परिवार 17 महीने तक कैसे एक लाश के साथ सामान्‍य जिंदगी जीता रहा और पड़ोसियों से भी यह सच्‍चाई छिपी रह सकी। विशेषज्ञों का कहना है कि हो सकता है कि विमलेश की बॉडी, 'ममीफाइड बॉडी' हो गई हो। यह प्रदेश का पहला मामला हो सकता है। इसमें शरीर को उपलब्ध कई तरीके के रासायनिक लेपों द्वारा संरक्षित किया जाता है।

स्टेट मेडिकोलीगल सेल के संयुक्त निदेशक डा. कीर्तिवर्धन सिंह ने कहा परिजनों कोई केमिकल लगाने से इनकार कर रहे हैं ऐसे में यह जांच का विषय हो सकता है। इसकी जांच सीटी इमेजिंग/वर्चुअल अटोप्सी द्वारा की जा सकती है। टिश्यू को नुकसान न पहुंचाकर आंतरिक अंगों का सफलतापूर्वक परीक्षण कर मृत्यु के कारणों को जाना जा सकता था। यह भी सम्भव है कि परिजनों की बात आंशिक सच हो। कुछ वक्त धड़कन मौजूद रही हो। एक लंबे समय तक कोमा से इनकार नहीं किया जा सकता है।

मनोवैज्ञानिक का निष्कर्ष यह केस साइकोटिक डिसऑर्डर का
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सा विभाग के असिस्‍टेंट प्रोफेसर डॉ.गणेश शंकर का कहना है कि प्रथमदृष्टया यह केस शेयर्ड साइकोटिक डिस्ऑर्डर ( यानी शेयर्ड डिलियुजनल डिस्आर्डर) का लग रहा है। इसमें परिवार में एक प्रभावी इंसान के भ्रम पर विश्वास करने के लक्षण परिवार के सदस्यों में आ जाते हैं। इस बीमारी में परिवार के इंसान विचार और व्यवहार में ढलने लगते हैं। साथ ही अगर परिवार में कोई व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार होता है तो उसका असर अन्य सदस्यों पर पड़ने लगता है। देश में इससे पहले इसी तरह के डिस्आर्डर केस इंडियन साइक्रायटिक जर्नल में डॉ. आशी ने रिपोर्ट किया था। उसमें पति-पत्नी और उनके दो बच्चों में यह डर घर गया था कि पड़ोसी उनके परिवार को मारना चाहता है जबकि ऐसा नहीं था। 

तीन घंटे की जद्दोजहद के बाद निकला शव
स्वास्थ्य विभाग की टीम 1100 बजे विमलेश के घर पहुंची, पर परिवार ने अंदर नहीं जाने दिया। डिप्टी सीएमओ और डीसीपी तीन घंटे की जद्दोजहद के बाद शव लगभग 2 बजे को बाहर निकाल सके।

हास्पिटल ने 22 अप्रैल 2021 को जारी किया था डेड सर्टिफिकेट
विमलेश को बिरहाना रोड स्थित मोती हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। मौत के बाद वहां से लेटर हेड पर ही डेछ सर्टिफिकेट जारी कर दिया गया। इसमें लिखा कि 35 साल के विमलेश पुत्र रामऔतार को सांस लेने में दिक्कत के चलते 19 अप्रैल 2021 को भर्ती कराया गया था। विमलेश की मौत 22 अप्रैल 2021 सुबह 4 बजे हुई। यह सर्टिफिकेट 22 अप्रैल को जारी किया गया, जिस पर मुहर तक नहीं लगी है। सीएमओ सुबोध प्रकाश का कहना है कि मृत्यु प्रमाणपत्र का प्रोफार्मा होता है। अस्पताल के संचालक निर्मल खेड़िया ने लाइसेंस रिन्युवल नहीं कराया है। यही नहीं, अस्पताल के आफिस में मिले कर्मचारी बोले कि सर्टिफिकेट तो अस्पताल का है, पर रिकॉर्ड नहीं है। उन्होंने डॉ. खेड़िया के दो नंबर दिए वह डायल करने पर अनुपलब्ध बताते रहे। एक कर्मी ने बताया, डॉक्टर साहब का ऑपरेशन चल रहा है बात न हो पाएगी।

गुमनाम चिट्ठी ने खोला राज
असिस्टेंट एकाउंट्स आफिसर विमलेश कुमार गौतम की मौत का राज एक गुमनाम पत्र ने खोला, जिसे अहमदाबाद में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड के अधीन प्रिसिंपल चीफ कमिश्नर आफ कंट्रोलर आफ एकाउंट्स के कार्यालय में भेजा गया था। ये पत्र किसने भेजा, इस रहस्य से पर्दा नहीं उठा है। कानपुर निवासी विमलेश दो साल से अहमदाबाद में तैनात थे। पिछले साल मार्च के आखिर में आडिट के सिलसिले में फील्ड पर गए और कोरोना की चपेट में आ गए। कुछ दिन वहीं इलाज कराया लेकिन आराम न मिलने पर अहमदाबाद से लखनऊ की फ्लाइट पकड़ी और कानपुर आ गए। यहां अस्पताल में भर्ती रहे और 21 अप्रैल 2021 को मौत हो गई। यहीं से रहस्यों की कहानी शुरू हो गई।

मिताली के नाम से विमलेश के ऑफिस को मिली थीं दो चिट्ठ‍ियां 
सूत्रों के मुताबिक विमलेश की मौत के छठे दिन यानी 27 अप्रैल को अहमदाबाद आफिस से उनकी पत्नी मिताली दीक्षित का एक पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें पति के नाम के आगे स्वर्गीय अंकित था। पत्र में विभाग को सूचना दी गई कि विमलेश कुमार की मृत्यु कोरोना से हो गई है और पेंशन संबंधी औपचारिकताओं का जल्द से जल्द क्रियान्वन किया जाए। विभाग ने पत्र के आधार पर प्रक्रिया शुरू कर दी। 

विभाग ने रोक दी थी सैलरी
एक मई को मिताली का एक और पत्र अहमदाबाद आफिस को प्राप्त हुआ, जिसमें लिखा था कि पल्स आक्सीमीटर से जांच में पति विमलेश की आक्सीजन और पल्स चलती पाई गई है और वह जीवित हैं इसलिए पेंशन और फंड भुगतान की प्रक्रिया को रोक दिया जाए। अजीबोगरीब पत्र प्राप्त होने के बाद विभाग में असमंजस की स्थिति पैदा हो गई और विमलेश की सैलरी रोक दी गई।

भुगतान के लिए चिट्ठ‍ियां भेजता रहा विभाग, मिताली ने नहीं दिया जवाब
सरकारी नौकरी में कार्यरत बीमार व्यक्ति ठीक होते ही सबसे पहले अपने मेडिकल बिल लगाकर भुगतान का दावा करता है। जीवित और स्वस्थ होने का मेडिकल सर्टिफिकेट दाखिल करता है लेकिन इस केस में सबकुछ उल्टा-पुल्टा था। विभाग ने मे़डिकल बिलों और रुकी हुई सैलरी के भुगतान के लिए सात पत्र पत्नी मिताली को भेजे लेकिन कोई जवाब नहीं आया। इस बीच अहमदाबाद आफिस को तीसरा गुमनाम पत्र प्राप्त हुआ जिसमें विमलेश की लाश घर पर होने की सनसनीखेज जानकारी दी गई। इस पत्र के बाद खलबली मची और अहमदाबाद से जोनल एकाउंट्स आफिसर की एक टीम विमलेश के कानपुर स्थित आवास 7/401 कृष्णापुरी रोशन नगर पहुंची। लेकिन परिजनों ने टीम को घर के अंदर नहीं घुसने दिया। टीम लौट गई और फिर कानपुर आफिस को पत्र लिखकर शक जताया कि विमलेश की मौत हो चुकी है और सीएमओ के जरिए इसकी पुष्टि कराएं। वहां से आई सुचना के बाद कानपुर से पत्र सीएमओ को गया और 17 महीने से घर में रखी लाश का राजफाश हुआ। विभागीय सूत्रों के मुताबिक ये केस आश्रित कोटे की नौकरी, पेंशन या फंड हड़पने का मामला नहीं है बल्कि तंत्र-मंत्र व अंधविश्वास से जुड़ा है।

विमलेश के भाई ने बताया कि आखिर हुआ क्‍या था? 
अप्रैल 2021 में अस्पताल ने विमलेश को मृत घोषित कर दिया। मृत्यु प्रमाणपत्र भी दे दिया। उसके बाद आखिर विमलेश जिंदा कैसे हो गया? परिवार उसका शरीर 177 महीने तक क्यों रखे रहा? जिंदा होने का इतना यकीन क्यों था? उसे कैसे रखा जा रहा था? इन तमाम सवालों के जवाब विमलेश के भाई दिनेश ने ‘हिन्दुस्तान’ से बातचीत में दिए। दिनेश ने बताया कि मोती अस्पताल में अप्रैल 2021 में भाई को ढाई लाख का इंजेक्शन लगाया गया। इसके बाद भी कहा कि हम नहीं बचा सके। सुबह चार बजे मृत्यु प्रमाण पत्र दे दिया था। हम लोगों ने शव के लिए एम्बुलेंस तक नहीं ली। शव को मारुति अल्टो कार में रखवा कर घर ले आए। अंतिम संस्कार की पूरी तैयारी कर ली। इसी बीच घर में ही किसी ने कहा कि धड़कन चल रही है। आक्सीमीटर लगाया तो आक्सीजन लेवल ठीक था। यह देख कर हम विमलेश को घर ले आए।

मोहल्ले में एक डाक्टर ने जांच की और कहा कि विमलेश जिंदा हैं। कोमा में चले गए हैं। उसका इलाज शुरू कराया गया। हम तब से लगातार उनके लिए आक्सीजन सिलेंडर लाते रहे। विमलेश को घर पर रखने का कोई इरादा नहीं था। हम पेनेशिया, केएमसी, फार्च्यून, सिटी हास्पिटल समेत कई जगह इलाज कराने के लिए गए पर सभी आरटीपीसीआर रिपोर्ट मांगते थे। कोई अस्पताल में भर्ती करने को तैयार नहीं था।

2021 में ईएमओ ने कहा था कि नली डाली तो नसें फट जाएंगी
दिनेश के मुताबिक जुलाई 2021 में उसने हैलट में भी एक ईएमओ से सम्पर्क किया था। जिसका नाम उसे याद नहीं। उस वक्त ईएमओ ने उससे कहा था कि ढाई माह से मरीज ने कुछ खाया पिया नहीं है तो उसकी नसें सिकुड़ गई होंगी। ऐसे में अगर नली डाली गई तो नसे फटने का डर है और वह पांच मिनट से ज्यादा जिंदा नहीं रहेगा। जिसके बाद घर पर ही उसका इलाज चलता रहा।

दो बार हुई विमलेश की मौत
विमलेश कुमार की एक ही जन्म में दो बार मौत हुई। विमलेश को 21 अप्रैल 2021 को मोती अस्पताल में मृत्यु प्रमाण पत्र मिला था। दूसरी बार शुक्रवार को हैलट में।

काला पड़ गया था शरीर
विमलेश का शरीर पूरी तरह काला पड़ चुका था। चमड़ी भी शरीर छोड़ चुकी थी। ऐसे में भी परिवार वालों को यह नहीं समझ आ रहा था कि अब उसमें कोई जान बाकी नहीं रह गई है।

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