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Hindustan Special: यूपी के इस राजा ने बंद करवा दी थी बेटियों के बलि की परंपरा, पेश की मिशाल

राजा क्षत्रिय जाति में उस वक्त प्रचलित इस कुप्रथा से वह काफी आहत हुए थे। 1836 में राज्य संभालने के बाद महाराजा ने कन्या हत्या के प्रति लोगों को जागरूक किया था।

Hindustan Special: यूपी के इस राजा ने बंद करवा दी थी बेटियों के बलि की परंपरा, पेश की मिशाल
Pawan Kumar Sharmaअविनाश त्रिपाठी,बलरामपुरWed, 28 Feb 2024 05:41 PM
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अवध क्षेत्र में पुत्री बलि की कुप्रथा को 1836 में तत्कालीन महाराजा दिग्विजय सिंह ने बंद करवाया था। महराजा दिग्विजय सिंह नि:संतान थे, फिर भी क्षत्रिय जाति में उस वक्त प्रचलित इस कुप्रथा से वह काफी आहत हुए थे। उन्होंने यह कुप्रथा बंद करा दी। इतिहासकारों की मानें तो उसी के बाद से क्षत्रिय समाज में पुत्री बलि जैसी कुप्रथा समाप्त हो गई।

बलरामपुर राज परिवार का गौरवशाली इतिहास है। 1830 से 1836 तक राजा जय नारायण सिंह ने बलरामपुर पर शासन किया था। उनकी मृत्यु के पश्चात पुत्र दिग्विजय सिंह ने शासन सत्ता संभाली। इतिहासकार पवन बक्शी बताते हैं कि बलरामपुर अवध क्षेत्र की सबसे बड़ी रियासत थी। अवध के तत्कालीन क्षत्रिय जाति में पुत्री बलि की कुप्रथा प्रचलित थी। बताते हैं कि क्षत्रिय जाति खासकर जनवार वंश में किसी भी शुभ अवसर पर मान-मनौती पूरी करने के लिए बेटियों की बलि दी जाती थी। सत्ता संभालते ही महराजा दिग्विजय सिंह ने इस कुप्रथा को समाप्त करने की योजना बनाई। इसके लिए उन्होंने पूरे अवध क्षेत्र में व्यापक अभियान चलाया। छोटी-छोटी रियासतों को एकजुट किया। साथ ही लोगों को इस कुप्रथा को बंद करने के लिए जागरूक किया।

इतिहासकार बताते हैं कि महाराजा ने पुत्री बलि की कुप्रथा को समाप्त करने के लिए विशेष अभियान चलाया। सदियों पूर्व महराजा ने बलरामपुर में नारी सशक्तिकरण की मिसाल पेश किया था। महाराजा की इस पहल के बाद अवध क्षेत्र के क्षत्रिय जाति में हमेशा हमेशा के लिए यह कुप्रथा बंद हो गई। महराजा दिग्विजय सिंह ने 1882 तक शासन किया। इस दौरान उन्होंने समाज सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया, जिसे आज भी लोग श्रृद्धा से याद करने हैं। उनके निधन के पश्चात बड़ी महारानी इंद्रकुंवरि ने सत्ता संभाली। एक साल बाद 8 नवम्बर, 1883 को बलरामपुर के ज्योनार गांव के अपने खानदान के ही बालक उदित नारायण सिंह को गोद लिया जो बाद में महराजा सर भगवती प्रसाद सिंह के नाम से जाने गए।

महाराजा दिग्विजय की मूर्ति देखने के लिए दूर-दूर से आते हैं लोग

नगर में राजा परिवार की ओर से 1955 में महारानी लाल कुंवरि महाविद्यालय की स्थापना की गई। महाविद्यालय परिसर में महराजा दिग्विजय सिंह की विशाल मूर्ति लगवाई गई है। यह मूर्तिकला का अद्भुत नमूना है। इसके निर्माण में देश के नामचीन मूर्तिकारों ने अपना योगदान दिया था। इसकी नक्काशी देखते ही बनती है। कुछ विशेष अवसरों पर ही इसे खोला जाता है। उस वक्त इसे देखने के लिए दूर-दराज क्षेत्रों से लोग आते हैं।

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