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लोकसभा चुनाव 2019ः बुन्देलखण्ड में डाकुओं का तिलिस्म तोड़ना चुनौती, बबुली कोल बना खतरा

बांदा-चित्रकूट संसदीय क्षेत्र में मतदाता वैसे तो सियासी बयार संग हमेशा बहता रहा है, लेकिन चुनाव में डाकुओं का दखल हमेशा रहा है। ददुआ, ठोकिया के सफाए के बाद अब साढ़े पांच लाख के इनामी कुख्यात बबुली कोल के हस्तक्षेप को रोकना चुनौती है। अबकी चुनाव में सपा से ददुआ के भाई बालकुमार पटेल व भाजपा से चंबल के बागी रह चुके मलखान सिंह ने टिकट की मांग की है। हालांकि सपा ने बांदा से श्यामाचरण का नाम तय कर दिया है, अब भी बाल कुमार हाथपांव मार रहे हैं। इलाहाबाद जोन के एडीजी एसएन सावत ने कहा कि चुनाव में डाकुओं का दखल किसी भी सूरत में नहीं होने देंगे। कांबिंग कर लोगों को भयमुक्त होकर मतदान को प्रेरित करने का अभियान शुरू किया गया है। वैसे भी पुलिस के दबाव में इस समय सक्रिय डाकू जंगल में ही दुबके हैं।
वामपंथियों का गढ़ रहा बांदा-चित्रकूट
वामपंथियों के गढ़ रहे बांदा-चित्रकूट लोकसभा क्षेत्र में डाकुओं के हस्तक्षेप की शुरुआत 1984 में हुई। उस समय कांग्रेस के उम्मीदवार स्व. भीष्म देव दुबे ने टेलीग्राम के जरिए आयोग को यहां चुनाव में डाकुओं के दखल की शिकायत की थी। इसके बाद तो कुख्यात ददुआ का तीन दशक तक ग्राम प्रधानी से लेकर सांसदी तक के चुनावों में हस्तक्षेप रहा। ददुआ का बेटा 2005 में चित्रकूट का निर्विरोध जिपं अध्यक्ष बना तो बेटी धाता फतेहपुर के खागा की ब्लाक प्रमुख बनी। ददुआ के रहते भाई बालकुमार ने करछना में विधानसभा चुनाव लड़ा और सपा के दिग्गज रेवतीरमण सिंह को चुनौती दी थी। ददुआ की मौत के बाद भी उसका तिलिस्म बरकरार रहा और बालकुमार 2009 में मिर्जापुर से सांसद बने और बाद में 2012 के विधानसभा चुनाव में बेटा वीर सिंह चित्रकूट से विधायक तो भतीजा रामसिंह पट्टी से विधायक बना। उसकी बहू जिपं सदस्य बनी। 
ठोकिया की मां वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में रालोद के टिकट पर नरैनी सीट से मात्र चार हजार वोटों से हारीं और विधायक बनते बनते रह गईं।इतना वोट उस समय दस्यु सरगना की दहशत की वजह से ही मिला। उस समय उसकी एक चाची कर्वी से ब्लाक प्रमुख तो दूसरी जिला पंचायत सदस्य व मां ग्राम प्रधान थी। उसके रिश्तेदार भी पंचायत के अहम पदो में बैठे थे। 
राजनेताओं को भाते डकैत
डकैतों का राजनीति से काफी गहरा रिश्ता रहा है। इन डकैतों को कहीं न कहीं स्थानीय नेताओं से सरंक्षण भी मिलता रहा है। कई माननीयों पर दस्यु संरक्षण के मामले चले जिसमें कुछ बरी हुए तो कुछ जेल तक गए। राजनीतकि संरक्षण की वजह से वहां वही चुनाव जीतता था, जिसे ददुआ चाहता था। जब तक ददुआ नेताओं की मदद करता रहा। जैसे ही ददुआ ने अपने परिवार के लोगों को नेता बनाना शुरू किया, वह नेताओं के निशाने पर आ गया। 2007 के चुनाव में एक पार्टी का विरोध किया तो सरकार बनने के तीन के अंदर 22 जुलाई 2007 को मुठभेड़ में मार दिया गया। एक साल बाद अगस्त महीने में ठोकिया भी ढेर हो गया।
बबुली को रोकना चुनौती
बंदूक की हनक से मतदान पाठा का इतिहास रहा है। ददुआ, ठोकिया जैसे खूंखार डकैतों के बाद इस समय साढ़े पांच लाख के इनामिया डकैत बबुली कोल पर पुलिस ने शिकंजा तो कस रखा है पर कुछ लोग राजनीतिक फायदे के लिए उसके खौफ का तिलस्म खड़ा करने की कोशिश करेंगे। इस डाकू का प्रभाव आदिवासी इलाकों में जंगल क्षेत्र के गांवों में है। बांदा में फतेहगंज के कुछ गांव तो चित्रकूट में मारकुंडी से लेकर मानिकपुर,बरगढ़ के जंगल क्षेत्र के गांव है। पुलिस की पिछले दो साल में इससे आमने सामने की कई मुठभेड़ें हो चुकी हैं लेकिन हर बार यह बच निकला। पिछले विधान सभा चुनाव में इसने मारकंुडी क्षेत्र के कई गांवों में उत्पात किया था। तब नेताओं ने आरोप प्रत्यारोप लगाए थे।
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  • Web Title:Lok Sabha Elections 2019: Challenges of the Tales of Pirates in Bundelkhand