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यूपी में कांग्रेस-सपा गठबंधन से बदलेंगे सियासी समीकरण? अखिलेश की हर शर्त मानने की क्या मजबूरी

यूपी में सपा और कांग्रेस के बीच अंततः गठबंधन फाइनल हो गया। बुधवार को दोनों दलों ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस भी कर दी। सपा ने कांग्रेस को यूपी में 17 सीटें दी हैं। एमपी में भी सपा को एक सीट मिल गई है।

यूपी में कांग्रेस-सपा गठबंधन से बदलेंगे सियासी समीकरण? अखिलेश की हर शर्त मानने की क्या मजबूरी
Yogesh Yadavलाइव हिन्दुस्तान,लखनऊ मेरठWed, 21 Feb 2024 10:46 PM
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लोकसभा चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच बुधवार को सीटों का तालमेल हो गया और गठबंधन का औपचारिक ऐलान भी कर दिया गया। सपा ने कांग्रेस को 17 सीटों का ऑफर दिया था। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ऑफर स्वीकार नहीं करने और सीटों पर तालमेल से पहले राहुल गांधी की यात्रा में शामिल नहीं होने का ऐलान किया था। सपा अपनी बातों पर अड़ी रही और कांग्रेस को ऑफर स्वीकार करना ही पड़ा। यही नहीं, सपा ने कांग्रेस को वाराणसी, गाजियाबाद, प्रयागराज, मथुरा जैसी ऐसी सीटें दी हैं जहां भाजपा ने कई लाख की मार्जिन से जीत हासिल की थी।

इसके अलावा मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में एक सीट नहीं देने वाली कांग्रेस ने खजुराहो लोकसभा की सीट भी सपा को दे दी है। कांग्रेस के इस तरह अखिलेश के सामने नतमस्तक होकर समझौता स्वीकार करने के पीछे के कारणों पर चर्चा हो रही है। माना जा रहा है कि इसमें सबसे बड़े दो कारण रायबरेली और अमेठी की सीटों को किसी तरह बचाना और मुस्लिम मतों के बंटवारे को रोकना है। 

पूर्वी और पश्चिमी यूपी को अलग-अलग बांट कर देखें तो पूर्वांचल में कांग्रेस को मिली वाराणसी, प्रयागराज, देवरिया जैसी सीटों पर भाजपा ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी। यहां की एक विधानसभा सीट तक कांग्रेस के पास नहीं है। भाजपा ने इन जिलों में एक तरह से क्लीन स्विप किया था। 

वेस्ट यूपी की चार सीटें कांग्रेस को मिली हैं। कहा जा रहा है कि राष्ट्रीय लोकदल के एनडीए में जाने की अटकलों के बीच ही राजनीति का नया रास्ता बनने लगा था। कांग्रेस और सपा में पेच मुरादाबाद मंडल और सहारनपुर पर फंसा था। रालोद के दोस्ती टूटने के बाद सपा दिक्कतों में थी लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस को दबाव में ले लिया गया। हालांकि सियासी हलकों का मानना है कि इससे सपा और कांग्रेस दोनों को ही परस्पर सहारा मिला है।

कांग्रेस को वेस्ट यूपी में मिली चार सीटों में से सहारनपुर में कांग्रेस से इमरान मसूद पहले ही चुनाव लड़ने का दावा कर चुके हैं। बुलंदशहर में सपा के पास कोई दमदार प्रत्याशी नहीं था। मुरादाबाद की जगह अमरोहा देकर कांग्रेस को संतुष्ट किया गया है। गाजियाबाद वर्ष 2009 में लोकसभा सीट बनी तब से यहां भाजपा का कब्जा है। 

इमरान मसूद के लिए सपा ने छोड़ा सहारनपुर
लोकसभा की प्रथम सीट सहारनपुर पहले से ही अहम मानी जाती रही है। सपा ने कांग्रेस के लिए सहारनपुर सीट से अपना दावा छोड़ दिया है। माना जा रहा है कि इमरान मसूद के कारण ही सपा ने सहारनपुर को कांग्रेस के हिस्से में छोड़ा है। इमरान मसूद पहले से ही चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुके हैं और उनकी दावेदारी सपा के दावेदारों से ज्यादा मजबूत है। सहारनपुर लोकसभा सीट पर अब तक छह बार कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव में जीत दर्ज कर लोकसभा पहुंचे हैं। जबकि, सपा प्रत्याशी मात्र एक बार ही जीत दर्ज कर पाया है। 

कांग्रेस को बुलंदशहर की सीट देकर चौंकाया
बुलंदशहर लोकसभा सीट 1952 में ही अस्तित्व में आ गई थी। कांग्रेस को यहां समाजवादी पार्टी का साथ होने से मुस्लिम वोटों की आस है। अभी तक यहां से छह बार कांग्रेस और सात बार भाजपा के प्रत्याशी संसद पहुंचे हैं। यह सीट किसी वक्त कांग्रेस की गढ होती थी। लेकिन 1984 के बाद कांग्रेस के लिए सूखा पसरा है। ऐसे में सपा ने बुलंदशहर की सीट देकर चौंंकाया।

सपा ने अपने गढ पास रखे 
कांग्रेस से समझौते के बाद भी सपा ने अपने गढ़ पास ही रखे। सपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुजफ्फरनगर, कैराना, मुरादाबाद और संभल की सीट अपने ही पास रखी है। मुजफ्फरनगर में जाट कार्ड खेलते हुए हरेंद्र मलिक, कैराना से इकरा और संभल से शफीकुर्हमान बर्क के नाम घोषित किए जा चुके हैं।

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