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लक्षागृह-कब्रिस्तान विवाद: मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज, 53 साल बाद कोर्ट ने सुनाया फैसला, हिंदू पक्ष की बड़ी जीत 

बागपत के बरनावा में स्थित महाभारतकालीन लाक्षागृह पर चल रहे विवाद में 53 वर्ष बाद सोमवार को हिंदुओं के पक्ष में फैसला आया। सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने मुस्लिम पक्ष के उस दावे को खारिज कर दिया।

लक्षागृह-कब्रिस्तान विवाद: मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज, 53 साल बाद कोर्ट ने सुनाया फैसला, हिंदू पक्ष की बड़ी जीत 
Dinesh Rathourवरिष्ठ संवाददाता,बागपतMon, 05 Feb 2024 09:57 PM
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बागपत के बरनावा में स्थित महाभारतकालीन लाक्षागृह पर चल रहे विवाद में 53 वर्ष बाद सोमवार को हिंदुओं के पक्ष में फैसला आया। सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने मुस्लिम पक्ष के उस दावे को खारिज कर दिया, जिसमें उसने लाक्षागृह की 100 बीघा जमीन को शेख बदरूद्दीन की मजार और कब्रिस्तान बताया था। मुस्लिम पक्ष ने हाईकोर्ट में अपील की बात कही है। बरनावा में स्थित लाक्षागृह टीले की 100 बीघा जमीन को लेकर हिंदू व मुस्लिम पक्ष के बीच पिछले 53 वर्षों से विवाद चल रहा है। 31 मार्च 1970 में मेरठ के सरधना की कोर्ट में बरनावा निवासी मुकीम खान ने वक्फ बोर्ड के मुतवल्ली की हैसियत से एक वाद दायर कराया था। इसमें लाक्षागृह गुरुकुल के संस्थापक ब्रह्मचारी कृष्णदत्त उर्फ स्वामी को प्रतिवादी बनाया गया था। सोमवार को मुकदमे की सुनवाई पूरी हो गई और सिविल जज जूनियर डिवीजन प्रथम शिवम द्विवेदी ने मुकदमे में फैसला सुनाते हुए मुस्लिम पक्ष के दावे को खारिज कर दिया।

मुसलिम पक्ष का यह था दावा

दावे के अनुसार कब्रिस्तान एक ऊंचे टीले पर स्थित है जहां तकरीबन 600 साल पहले एक हजरत शेख बदरुद्दीन साहब ने अपने जिंदगी में इबादत की और फिर वहीं दफन हुए इन बुजुर्ग का बहुत पुराना मकबरा बना है जिसके चारों तरफ हाता है और उसके करीब एक बड़ा चबूतरा बतौर मस्जिद थी और इसके आसपास भी काफी कमरे बने हुए थे। वादी ने अपने वाद में कहा कि कृष्ण दत्त उर्फ स्वामी कहीं बाहर के रहने वाले थे।

उन्होंने इस जगह को हिंदुओं के पुराने तीर्थ के ऊपर बनाया हुआ बताते हुए कब्रिस्तान को खत्म करके फिर से इसको हिंदुओं का तीर्थ बना देने की बात कही और यहां पर हवन करना शुरू कर दिया था। यह भी कहा गया कि वक्फ यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के अधीन है। न्यायालय में वाद शुरू होने के बाद वादी मुकीम खान और प्रतिवादी कृष्णदत्त दोनों का निधन हो गया। वर्ष 1997 में मुकदमा मेरठ से बागपत ट्रांसफर हो गया। जिसके बाद दोनों पक्ष की ओर से अन्य लोग ही वाद की पैरवी कर रहे थे।

सर्वे ऑफ इंडिया के अफसरों ने भी दी गवाही

करीब 53 साल अदालत में चले इस मुकदमे में दोनों पक्षों की ओर से ढेर सारे दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। वादी और प्रतिवादी पक्ष की ओर से कई गवाह भी पेश किए गए। प्रतिवादी पक्ष ने सर्वे ऑफ इंडिया के अधिकारियों की भी गवाही कराई थी। 

हिंदू पक्ष की जीत

प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ता रणबीर सिंह तोमर ने बताया, वर्ष 1997 से मुकदमे की सुनवाई बागपत न्यायालय में चल रही थी। सुनवाई के दौरान हमने सात गवाह पेश किए। इनमें सर्वे ऑफ इंडिया के अधिकारी की गवाही भी शामिल रही। सुनवाई के बाद न्यायाधीश ने मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज कर दिया है। यह हिंदू पक्ष की बड़ी जीत है। जमीन लाक्षागृह की ही है।

ऊपरी अदालतों के दरवाजे खुले हैं

वादी पक्ष के वकील शाहिद अली का कहना है कि न्यायाधीश ने सुनवाई के बाद मुस्लिम पक्ष के दावे को खारिज कर दिया है। मुस्लिम पक्ष के पैरोकारों के साथ बातचीत कर आगे की रणनीति बनाई जाएगी। फैसले के खिलाफ उच्च अदालत का दरवाजा भी खटखटाया जाएगा।

यह है महाभारतकालीन लाक्षागृह

महाभारतकालीन इतिहास के अनुसार हस्तिनापुर राज सिंहासन से पांडवों को बेदखल करने के बाद दुर्योधन ने पांडवों को खत्म करने की योजना बनाई। इसके लिए वारणावर्त (अब बरनावा) में पुरोचन नाम के शिल्पी से ज्वलनशील पदार्थों लाख, मोम आदि से एक भवन तैयार कराया गया। इस भवन में पांडवों को ठहरा कर भवन में आग लगा दी। पांडवों के शुभचिंतकों ने उन्हें गुप्त रूप से इसकी सूचना पहले ही दे दी थी। आग लगते ही पांडव सुरंग से होकर बाहर सुरक्षित निकल गए। यह सुरंग हिंडन नदी के किनारे खुलती है। इसके अवशेष आज भी मिलते हैं। गांव के दक्षिण में लगभग 100 फुट ऊंचा और कई एकड़ भूमि पर फैला हुआ यह टीला लाक्षागृह के अवशेष के रूप में मौजूद है। इस टीले के नीचे दो सुरंगें स्थित हैं।

लाक्षागृह टीले पर पुलिस फोर्स तैनात, फ्लैग मार्च किया

बरनावा में कृष्णा व हिंडन नदी के संगम पर स्थित महाभारतकालीन ऐतिहासिक टीला लाक्षागृह को शेख बदरुउद्दीन की दरगाह व कब्रिस्तान बताने वाली मुस्लिम पक्ष की याचिका सोमवार को कोर्ट से खारिज कर दिए जाने पर शांति व्यवस्था व सुरक्षा के मद्देनजर टीले पर पुलिस फोर्स तैनात किया गया है। सीओ हरीश भदौरिया के निर्देशन में इंस्पेक्टर बिनौली एमपी सिंह, एसओ दोघट सोहनवीर सोलंकी , सिंघावली अहीर पुलिस सहित बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स तैनात रही। शांति व्यवस्था के लिए पुलिस फोर्स ने बरनावा में फ्लैग मार्च भी किया।

ये बिंदु बने फैसले का आधार

  1. राजस्व अभिलेखों में कब्रिस्तान दर्ज नहीं मिला
  2. 6 बीघा, 7 बिस्वा, 8 बिस्वांशी पर लाखा मंडप और शेष भूमि वन विभाग के नाम दर्ज मिली
  3. 25 नवंबर 1920 को नोटिफिकेशन जारी हुआ और फिर 27 नवंबर को दोबारा नोटिफिकेशन जारी हुआ था, जिसके सापेक्ष 1965 में तहसीलदार सरधना ने एसडीओ भूमि राजस्व अभिलेखों में दर्ज करने के लिए रिक्मंड किया
  4. चार मार्च 1965 को एसडीओ सरधना ने लाखा मंडल दर्ज करने का आदेश पारित किया
  5. 28 अगस्त 1973 को मुकीम खान निगरानी योजित निरस्त हुई
  6. 1970 में यानि की 1977 फसली में कब्रिस्तान दर्ज नहीं मिला
  7. विवादित जमीन लाखा मंडप और वन विभाग की थी, जिसमें साबित हुआ कि उक्त जमीन कब्रिस्तान के नाम पर दर्ज नहीं थी
  8. 1950 में विवादित जमीन में से 30 बीघा जमीन वन विभाग के नाम दर्ज हुई
  9. उत्तर प्रदेश सरकार एवं वन विभाग ने गांधी धाम समिति के विरूद्ध बेदखली का वाद 10 अक्तूबर 1990 को खंडित किया
  10. सर्वे विभाग ऑफ इंडिया ने लाक्षागृह का सर्वे किया। सर्वे के दौरान महाभारत कालीन साक्ष्य मिले

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