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सौहार्द की खुशबू बिखेरता है हसरत मोहानी का कृष्ण प्रेम

krishna janmashtami

तन मन धन सब वार के हसरत, मथुरा नगर चली धूनी रमाई! हसरत मोहानी एक ऐसी शख्सियत का नाम है जिनकी शायरी मुल्क में सौहार्द की खुशबू बिखेरती थी। उनकी शायरी में कान्हा प्रेम खूब छलकता था। ऐसे में जो उन्हें मजहब के नाम से डराता, उनसे वह कह देते थे, ‘दरवेशी ओ इंकलाब है मसलक मेरा, सूफी मोमिन हूं इश्तेराकी मुस्लिम, मसलक-ए-इश्क है परसतिश ए हुस्न, हम नहीं जानते अजाब-ओ-सवाब’।

कानपुर गणेश शंकर विद्यार्थी और हसरत मोहानी के नाम से जाना जाता है। हसरत जंग-ए-आजादी के सफ-ए-फेहरिस्त के लोगों में शामिल थे। उन्होंने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ नारे की ईजाद की। वह सहाफी (पत्रकार) भी थे और शायर भी। हसरत उन्नाव के मोहान में जन्मे और लखनऊ में आखिरी सांस ली लेकिन अपनी जिंदगी का ज्यादातर हिस्सा कानपुर में गुजारा। आजादी के लिए न जाने कितनी बार जेल गए। कैद ब मशक्कत काटी लेकिन शेर-ओ-शायरी करते रहे।

हसरत के दिल में बसते थे कान्हा

श्री कृष्ण जी हसरत के दिल में बसते थे। जन्माष्टमी और होली आते ही उनका मन कहीं नहीं लगता था। वह सीधे मथुरा का रुख कर लेते थे। जब कभी उन्हें अपने मन में बेचैनी का अहसास हुआ, वह रूहानी ताकत के लिए मथुरा चले जाते थे। उनकी शायरी की एक झलक-बिरह की रैन कटे न पहार, सूनी नगरिया परी उजार, निर्दयी श्याम परदेस सिधारे, हम दुखियारन छोरछार, काहे न हसरत सब सुख सम्पत, तज बैठन घर मार किवार

हसरत की भी कुबूल हो मथुरा में हाजिरी

 इतिहास एवं पुरातत्व मामलों के जानकार अनूप शुक्ला बताते हैं कि 1923 में हसरत ने जन्माष्टमी पर लिखा, ‘हसरत की भी कुबूल हो मथुरा में हाजिरी, सुनते हैं आशिकी पे, तुम्हारा करम है खास’। यह हसरत की श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा अभिव्यक्त करने की व साधक होने का प्रमाण है। हसरत के हवाले से वह कहते हैं कि दुनिया के हर हिस्से में अल्लाह ने हादी (पैगंबर) यानी सही राह दिखाने वाले भेजे हैं। हसरत श्री कृष्ण जी को इसी अकीदत से देखते थे। हसरत कहते हैं, ‘मथुरा नगर है आशिकी का, दम भरती है आरजू उसी का’।

हर नगमा कृष्ण बांसुरी का

हसरत मोहानी के जीवन का अध्ययन करने वाले डॉ. इशरत सिद्दीकी कहते हैं कि हसरत के झोले में जो चीजें रहा करती थीं उसमें एक बांसुरी भी थी। वह श्री कृष्ण जी के भक्त थे, इसलिए उन्हें बांसुरी से भी उतना ही प्रेम था। उनका एक शेर है, ‘पैगाम ए हयात ए जावेदां था, हर नगमा कृष्ण बांसुरी का’।

हसरत ने गाए सौहार्द के नगमे

हसरत मोहानी पर शोध करने वाली यासमानी बानों कहती हैं कि हसरत मोहानी के जीवन के अनेक रंग हैं। उनेक जीवन में कृष्ण भक्ति बहुत थी जिससे सौहार्द के नगमे फूटे। वह कहते हैं, मन तोसे प्रीत लगाई कान्हाई, काहू और की सूरत अब काहे को आई। वह होली के मौके पर कहते हैं, ‘पनिया भरन के जाय न देहें, श्याम भरे पिचकारी, थर-थर कंपन लाजन हसरत, देखत हैं नर नारी’

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