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Hindi News उत्तर प्रदेशबलिया में चंद्रशेखर और उनकी विरासत को लेकर रोचक हुई जंग, पोस्टरों- नारों में गूंज रहा नाम 

बलिया में चंद्रशेखर और उनकी विरासत को लेकर रोचक हुई जंग, पोस्टरों- नारों में गूंज रहा नाम 

Chandrashekhar's legacy: चंद्रशेखर की ‘देह’ भले ही यहां न रही हो लेकिन सियासत का केंद्र वही रहे। एक बार फिर लोकसभा चुनाव का उफान चरम पर है। बलिया में चंद्रशेखर और उनकी विरासत को लेकर जंग जारी है।

बलिया में चंद्रशेखर और उनकी विरासत को लेकर रोचक हुई जंग, पोस्टरों- नारों में गूंज रहा नाम 
Ajay Singhवरिष्ठ संवाददाता,बलियाSat, 18 May 2024 02:20 PM
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Chandrashekhar's legacy: चंद्रशेखर का बलिया या फिर बलिया के चंद्रशेखर। राजनीति में दोनों नाम एक दूसरे के पूरक बन चुके हैं। 1977 में पहली बार बलिया के सांसद बने चंद्रशेखर, 1984 में इंदिरा गांधी के निधन से उपजी सहानुभूति को छोड़ दें तो ताउम्र, यहां से निर्वाचित हुए। 2007 में उनके निधन के बाद चुनाव से लेकर अबतक हुए चार चुनावों में चंद्रशेखर की ‘देह’ भले ही यहां न रही हो लेकिन सियासत का केंद्र वही रहे। एक बार फिर लोकसभा चुनाव का उफान चरम पर है, बलिया में चंद्रशेखर और उनकी विरासत को लेकर जंग जारी है। भाजपा और सपा में खुद को चंद्रशेखर का ‘असली’ राजनीतिक उत्तराधिकारी साबित करने की यह लड़ाई अब बेहद रोचक बन गई है।

बलिया संसदीय सीट से भाजपा ने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर को टिकट दिया है। यह पहला मौका है, जब नीरज भाजपा के सिंबल पर चुनाव मैदान में हैं। पिता के निधन के बाद हुए उपचुनाव और 2009 के आम चुनाव में वे सपा के टिकट पर सांसद बने थे। 2014 में भी वे सपा के उम्मीदवार थे लेकिन मोदी लहर में भाजपा के भरत सिंह के हाथों हार का सामना करना पड़ा। 2019 के लोस चुनाव में सपा ने टिकट नहीं दिया तो नीरज ने भाजपा का दामन थाम लिया। तब से अबतक वे भाजपा से ही राज्य सभा के सांसद हैं। नीरज शेखर के सामने अपने पिता की इस परम्परागत सीट को बचाने के साथ ही उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की चुनौती है। उनके चुनाव प्रचार में चंद्रशेखर की छाया स्पष्ट दिखती है। भाषण से लेकर पोस्टरों और नारों में चंद्रशेखर प्रमुखता से हैं। जैसा कि नीरज शेखर कहते भी हैं, ‘पिताजी से राजनीति सीखने का प्रयास किया। उनका व्यक्तित्व बहुत बड़ा था। उन्होंने हमेशा सामाजिक समरसता के लिए काम किया। समाजवादी सोच थी। उसी विचारधारा को लेकर मैं भी चल रहा हूं।’

दूसरी ओर सपा भी खुद को चंद्रशेखर का राजनीतिक उत्तराधिकारी साबित करने में लगी है। सपा प्रत्याशी सनातन पांडे के होर्डिंग-पोस्टर से लेकर नारों तक में भी चंद्रशेखर का जिक्र है। यही नहीं, एक बयान में तो उन्होंने यहां तक कहा कि ‘समाजवादी चंद्रशेखर का बेटा मैं भी हूं। मैं भी उनको अपना पिता मानता हूं। उनके विचार समाजवादी थी। जीवनपर्यंत उन्होंने खुद को समाजवादी सोच में खपाने का काम किया है। उनके हकदार हम ही हैं।’

निधन पर रामगोविंद ने मुंडवा लिए थे बाल
चंद्रशेखर की राह पर चलकर पूर्वांचल के तमाम नेताओं ने अपनी राजनीति को आगे बढ़ाया। प्रधानाचार्य डॉ. अखिलेश सिन्हा कहते हैं, चंद्रशेखर जी के निधन पर सपा नेता रामगोविन्द चौधरी ने भी बाल-दाढ़ी मुड़वा ली थी। उन्होंने कहा था कि चंद्रशेखर जी हमारे राजनीतिक पिता रहे हैं। सपा उम्मीदवार के नामांकन के दौरान भी रामगोविन्द ने खुद को चंद्रशेखर का चेला बताते हुए कहा था कि ‘बेटा और चेला में अंतर है।

सिद्धांतों से कभी नहीं डिगे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर बलिया से आठ बार सांसद निर्वाचित हुए। इसमें से पांच बार खुद की पार्टी समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) से चुनाव लड़े और जीते। जबकि दो बार जनता पार्टी और एक बार जनता दल के टिकट पर सांसद निर्वाचित हुए। किसी भी चुनाव में समाजवादी पार्टी ने चंद्रशेखर के खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारा। एक चुनाव में भाजपा ने भी चंद्रशेखर के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं दिया था।