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बीजेपी प्रत्याशी अरुण गोविल के लिए ‘राम’ की छवि चुनौती, समझें मेरठ का समीकरण

यूपी में मेरठ लोकसभा सीट पर बीजेपी प्रत्याशी अरुण गोविल के लिए ‘राम’ की छवि चुनौती बनी है। चुनाव मैदान में वह अपने को ‘अराजनीतिक’ बता रहे हैं और यही उत्तर भाजपा को परेशानियों में डाल रहा है।

बीजेपी प्रत्याशी अरुण गोविल के लिए ‘राम’ की छवि चुनौती, समझें मेरठ का समीकरण
Deep Pandeyसूर्यकांत द्विवेदी,मेरठThu, 11 Apr 2024 11:29 AM
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राम आएंगे तो अंगना सजाऊंगी। मेरठ के चुनावी रण में यह गीत तो खूब बज रहा है, लेकिन पर्दे के राम यानी भाजपा प्रत्याशी अरुण गोविल अपनी छवि के साथ तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। आशाओं के रथ पर सवार भाजपा प्रत्याशी के सामने एक तरफ ग्लैमर की परंपरागत परेशानियां हैं तो दूसरी ओर नेता जैसे गुणों का अभाव। चुनाव मैदान में वह अपने को ‘अराजनीतिक’ बता रहे हैं और यही उत्तर भाजपा को परेशानियों में डाल रहा है। माहौल ‘राममय’ है लेकिन राजनीतिक विभीषण भी सक्रिय हैं। जन्मजात मेरठी होने के बावजूद अभिनेता से नेता बने अरुण गोविल का स्थानीय जुड़ाव नहीं बन पा रहा। उनके लिए उनकी ‘राम’ की छवि ही चुनौती बनी हुई है।

मेरठ के साकेत में स्वागत की लंबी श्रृंखला के बाद संचालक घोषणा करता है... अब ‘रामजी’ अरुण गोविल आपको ‘दर्शन’ देंगे और हमको ‘आशीर्वाद’ प्रदान करेंगे। रामनामी पटका पहने कार्यकर्ताओं की नारेबाजी के बीच केसरिया वस्त्रत्त्धारी गोविल रामायण फेम मुस्कराहट के साथ यह विशेषण स्वीकार करते हैं। नेता बनना मुश्किल है या अभिनेता? इसका दृश्य भी स्वागत समारोह में देखने को मिला। वह ‘आशीर्वाद’ देने माइक पर आये। जय श्रीराम का उद्घोष किया। नेताई अंदाज बिल्कुल नहीं था। कोई संबोधन नहीं। सीधे अपनी बात। न नेताई भाषण के आरोह-अवरोह। न दावे-न वादे। न वार-न प्रहार। बस एक अपील... सौ परसेंट वोट देना। उच्च आय वर्ग के लोग वोट नहीं डालते हैं। वह छुटटी मनाते हैं। ऐसा मत करना... प्लीज।

भाषण का अंदाज रामायण के संवाद की तरह था। मंद-मंद। कोई सियासी पुट नहीं। मनोयोग से भाजपा-संघ के पदाधिकारियों ने यह आशीर्वचन सुने। भाजपा का यह कार्यक्रम चुनावी जरूर था मगर अंदाज अलग। कार्यकर्ता से लेकर मंत्री तक और संघ पदाधिकारी तक सब ‘दर्शन’ कर रहे थे। सियासत में पैंतरे चलते हैं। पर्दे का राम इससे अनभिज्ञ है। वह भाषण देने में निपुण नहीं है। लेकिन धीरे-धीरे धार बढ़ रही है। यह बात हम नहीं, साथ के लोग बताते हैं। वे कहते हैं... पहले एक मिनट मुश्किल से बोलते थे। अब तीन-चार मिनट बोल लेते हैं। पहले गाड़ी से कम उतरते थे। अब जहां जरूरत होती है, वह चल देते हैं। चुनाव संचालन समिति के सदस्यों की बात मानते हैं। एक दिन में उनके 17 दौरे लग रहे हैं। लेकिन टाइम बंधा हुआ है। सुबह नौ बजे से रात के 9 बजे तक। कार्यक्रम में फूल मालाएं नदारद हैं। रामनाम के पटके ही छाये हैं। पर्दे के राम का अपना सत्ता संग्राम वार-पलटवार से अलग है। यह काम शीर्ष नेतृत्व कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किसी को नहीं बख्शा। लेकिन गोविल का अपना ‘युद्ध’ बिना शब्द बाण के चल रहा है। बकौल उनके लोग मुझमें राम देख रहे हैं... मैं इंसान हूं। राम तो भगवान थे। रामेच्छा से चुनाव लड़ रहा हूं।

सोशल मीडिया पर ट्रोल हुआ वीडियो
टिकट मिलने के बाद मेरठ आए भाजपा प्रत्याशी अरुण गोविल आते ही परेशानियों में घिरे। बड़ी मुश्किल से उन्होंने मीडिया से बातचीत की। मेरठ की किसी समस्या के बारे में वह जवाब नहीं दे सके। इतना कहा- एक बार जितवा दीजिए, फिर पता करेंगे कि क्या-क्या समस्याएं हैं। इसकी शहर में प्रतिक्रिया भी हुई। सोशल मीडिया पर लोगों ने ट्रोल करते हुए कहा कि मेरठ के बारे में होमवर्क तो करना चाहिए था। जब वह मेरठ का अपने को बताते हैं तो उनको कुछ तो जानकारी होनी ही चाहिए थी।

मेरठ में जातीय समीकरण के कांटे भी कम नहीं
मेरठ लोकसभा की सीट चुनौती भरी है। साढ़े नौ लाख मुस्लिम और दलित वोट हैं। 2019 में इस सीट पर भाजपा महज पांच हजार वोटों से जीती थी। ऐसी कांटे की सीट पर भाजपा ने बड़ा दांव खेला। तीन बार के सांसद राजेंद्र अग्रवाल का टिकट काटा। सभी बड़े धुरंधरों को किनारे किया और अरुण गोविल को मैदान में उतार दिया। अरुण मेरठ में जन्मे हैं। मेरठ में ही पले और पढ़े, लेकिन इस बात की स्वीकार्यता नहीं बन पा रही है। उनको बाहरी प्रत्याशी कहा जा रहा है। अरुण गोविल कहते हैं... कैसे विश्वास दिलाऊं कि मैं मेरठ का हूं। मेरठ में जन्मा हूं। जीआईसी (राजकीय इंटर कॉलेज, मेरठ) में 1968 में उन्होंने इंटर किया। बातचीत में उन्होंने मेरठ से संबंधित जानकारी के साक्ष्य भी रखे।

समाजवादी पार्टी ने मेरठ से एक-एक करके तीन बार प्रत्याशी बदले। पहले सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता भानु प्रताप सिंह को मैदान में उतारा। सपा में भी द्वंद्व चला। सरधना विधायक अतुल प्रधान से लेकर अन्य विधायक विरोध में खड़े हो गए। अतुल प्रधान को टिकट मिला। उन्होंने नामांकन किया लेकिन अगले ही दिन टिकट कट गया। अब पूर्व मेयर सुनीता वर्मा प्रत्याशी हैं। वह दलित मुस्लिम समीकरण से भाजपा को टक्कर दे रही हैं। बसपा ने देव व्रत त्यागी को मैदान में उतारा है। त्यागी समाज और बसपा के कैडर वोट भी कम नहीं है। बसपा का यहां मेयर से लेकर सांसद तक रह चुका है। सपा का खाता नहीं खुला है। 1952 के बाद पहली बार कोई मुस्लिम प्रत्याशी नहीं है।

अंतर्विरोध से आमना-सामना

भाजपा प्रत्याशी अरुण गोविल को कई स्तर पर अंतर्विरोध का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के अंदर भी और बाहर भी। टिकट की कतार में इस बार कई दावेदार थे। इसमें वैश्य बिरादरी के लोग अधिक थे। अंदरखाने विरोध भी शुरू हो गया। एक प्रत्याशी के नाते अरुण गोविल का कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद नहीं है। अभी तक कार्यकर्ताओं के साथ रणनीति नहीं बनी है। जो भी बनी है, वह नेताओं के साथ है।