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हिन्दुस्तान पूर्वांचल समागम: सीएम संग होगा विकास और चुनौति‍यों पर मंथन, 50 शख्‍सियतों का होगा सम्‍मान

मुख्‍य संवाददाता ,गोरखपुरPublished By: Ajay Singh
Sun, 01 Aug 2021 11:46 AM
हिन्दुस्तान पूर्वांचल समागम: सीएम संग होगा विकास और चुनौति‍यों पर मंथन, 50 शख्‍सियतों का होगा सम्‍मान

पांच साल में पूर्वांचल के बदलाव की तस्वीर नजर आने लगी है। पूर्वांचल की इस विकास यात्रा का केंद्र गोरखपुर बनता जा रहा है। गोरक्षनगरी को जोड़ने वाले ज्यादातर फोरलेन तैयार हो गए। पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे पर भी जल्द वाहन दौड़ाने की तैयारी है। इसी से जुड़ने वाले गोरखपुर लिंक एक्सप्रेस-वे का स्वरूप भी अब दिखने लगा है। एम्स जैसा विश्वस्तरीय चिकित्सा संस्थान अक्तूबर से पूरी तरह से क्रियाशील हो जाएगा। खाद कारखाने में यूरिया का उत्पादन इसी साल शुरू हो जाएगा। आयुष विश्वविद्यालय और वेटनरी इंस्टीट्यूट की नींव रखने की तैयारी है तो इंडस्ट्रियल कॉरिडोर और मेगा टेक्सटाइल पार्क भी पूर्वांचल की उम्मीदों को परवान चढ़ाएंगे।

 

इस विकास यात्रा के सामने कुछ चुनौतियां भी आईं। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी ने पूरी दुनिया के साथ गोरखपुर के भी विकास को प्रभावित किया। कोरोना की तीसरी लहर की आशंकाओं के बीच विकास को और रफ्तार कैसे मिलेगी? अब आगे कौन सी चुनौतियां हैं? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ इन्हीं चुनौतियों पर मंथन के लिए आपका अपना अखबार हिन्दुस्तान आगामी 4 अगस्त को हिन्दुस्तान पूर्वांचल समागम का आयोजन कर रहा है। समागम में गोरखपुर-बस्ती मंडल की ऐसी 50 शख्सियतों को सम्मानित भी किया जाएगा जिन्होंने अपने-अपने क्षेत्र में प्रतिभा और दक्षता का लोहा मनवाया है। सम्मानित की जाने वाली शख्सियतों से हम आपको लगातार 4 अगस्त तक रूबरू कराते रहेंगे। पेश है पहली कड़ी...

 

चंद्र प्रकाश अग्रवाल-उद्यमी, गोरखपुर

सरिया उद्योग के क्षेत्र में चंद्र प्रकाश अग्रवाल का उत्तर प्रदेश में प्रमुख स्थान है। इन्हें पूर्वांचल का स्टील किंग कहा जाता है। इनकी फर्म की प्रतिष्ठा और ख्याति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रतिष्ठित फोर्ब्स और स्टील 360 डिग्री पत्रिका ने भी इन्हें सम्मान दिया है। कोरोना की दूसरी लहर में ऑक्सीजन की किल्लत को देखते हुए इन्होंने रिकॉर्ड समय में प्लांट लगवाया जिससे प्रतिदिन 600 से अधिक जंबो सिलेंडर रीफिल हो सकेंगे। इन्होंने अपने संस्थानों के जरिए बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार दिया है। चन्द्रप्रकाश अग्रवाल सामाजिक सरोकारों से भी जुड़े हैं। कोरोना संक्रमण काल में इन्होंने बड़ी मात्रा में जरूरतमंदों तक राशन पहुंचाया है।

निखिल जालान-उद्यमी, गोरखपुर

युवा उद्यमी निखिल गीडा में 444 करोड़ से अधिक लागत से सरिया की फैक्ट्री स्थापित कर रहे हैं। इन्होंने इन्वेस्टमेंट समिट में इसका एमओयू किया था। फैक्ट्री लगाने का काम 50 प्रतिशत पूरा हो चुका है। फैक्ट्री का लोकार्पण मार्च 2022 में प्रस्तावित है। अनुमान लगाया जा रहा है कि इस फैक्ट्री का निर्माण हो जाने से तकरीबन एक हजार लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा। इसके साथ ही 2000 से अधिक लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलेगा। निखिल का मानना है कि पूर्वांचल से बड़ी संख्या में युवा काम के लिए दूसरे प्रदेशों या बड़े शहरों में चले जाते हैं। उनकी प्राथमिकता है कि पूर्वांचल के प्रवासी कामगारों और तकनीकी रूप से दक्ष युवाओं को यहां घर में रोजगार मिले।

श्रृति पांडेय-इनोवेटर इंजीनियर, गोरखपुर

श्रृति पांडेय गोरखपुर के युवाओं और युवतियों के लिए प्रेरणा हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद श्रृति ने अमेरिका से कांस्ट्रक्शन मैनेजमेंट का कोर्स किया। वहां से लौटी कोरोना संक्रमण काल में इन्होंने पटना में रिकॉर्ड समय में पराली व अन्य सामानों की मदद से कोविड अस्पताल बनाया। टाइम मैगजीन ने इन्हें एशिया की 30 यंग अचीवर्स में शामिल किया है। श्रृति पराली और धान की भूसी से प्लाई बनाने के प्लांट को लेकर भी काम कर रही हैं। इसकी कीमत बाजार में मिल रहे प्लाई से कम होगी। इससे पराली की समस्या का भी निदान हो जाएगा। इस विधा से भवन निर्माण के कई फायदे हैं। निर्माण की लागत कम हो गई। पर्यावरण के अनुकूल ऐसे भवनों का तापमान भी अन्य के मुकाबले 2 डिग्री सेल्सियस तक कम रहता है।

 

प्रवीण मोदी-उद्यमी, गोरखपुर

प्रवीण मोदी की गीडा में आक्सीजन की फैक्ट्री है। उन्होंने कोविड काल में गोरखपुर के साथ ही आसपास के जिलों में भी ऑक्सीजन का संकट नहीं होने दिया। फैक्ट्री में ऑक्सीजन की उत्पादन क्षमता बढ़ाई। वह कोरोना की तीसरी लहर आशंका के मद्देनजर बस्ती और देवरिया में ऑक्सीजन प्लांट लगा रहे हैं। दूसरी लहर के दौरान प्रवीण मोदी ने लोगों की काफी मदद भी की। उन्होंने जरूरतमंदों को ऑक्सीजन के छोटे सिलेंडर मुफ्त में मुहैया कराए। ऑक्सीजन को लेकर पूरे देश में जिस तरह की मारामारी रही, गोरखपुर और आसपास के जिलों में वैसी स्थिति नहीं पैदा होने पाई। देशभर में ऑक्सीजन की कीमतों में बढ़ोतरी की खबरें आईं लेकिन गोरखपुर में लोगों को पूर्व निर्धारित कीमत पर ही ऑक्सीजन मिलती रही।

 

 

डॉ.आरिफ सिद्दीकी-उद्यमी, गोरखपुर

डॉ.आरिफ सिद्दीकी ने गीडा में आधुनिक तकनीक से बनने वाले फर्नीचर की फैक्ट्री स्थापित की है। इनकी फैक्ट्री को कम समय ही काफी प्रसिद्धि मिली है। इन्होंने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सैकड़ों युवाओं को रोजगार दिया है। इनकी फैक्ट्री के उत्पाद पूर्वांचल के साथ ही आस्ट्रेलिया और नेपाल में निर्यात हो रहे हैं। इनका चीनी कच्चा माल की बजाय देशी कच्चे माल पर ज्यादा जोर है। कोरोना संक्रमण काल में जब फैक्ट्रियों के पास ऑर्डर नहीं थे, तब भी डॉ. आरिफ की फैक्ट्री में काम हो रहा था। फैक्ट्री में काम करने वाले 300 से अधिक कर्मचारियों को वेतन को लेकर कोई संकट नहीं आया है। इन्होंने अपने कर्मचारियों को घर नहीं बैठने दिया। सामाजिक सरोकारों में भी डा. आरिफ हमेशा आगे रहे हैं।

सुभाष अग्रवाल, पडरौना

कुशीनगर के सुभाष अग्रवाल ने न केवल छपरा में एक गारेमेंट्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगायी है बल्कि लोगों को कम कीमतों पर कपड़े उपलब्ध कराने की कोशिश भी करते हैं। कोरोना की पहली लहर में स्वास्थ्य विभाग को पीपीई किट की जरूरत पड़ी तो उन्होंने इसे भी काफी कम कीमतों पर तैयार करने की ठानी। वह अपने इस मकसद में कामयाब भी रहे। उन्होंने महज 99 रुपये में पीपीई किट तैयार कर बाजार में उतारा। इस रकम में जीएसटी भी शामिल है। उनकी पीपीई किट को आईसीएमआर और बीआरडी मेडिकल कॉलेज के माइक्रोबायलॉजी विभाग ने सभी मानकों पर खरा पाया। उनके उत्पाद को इंटरनेशनल स्तर की संस्था आईएफएस ने भी प्रमाणित किया है।

 

नरसिंह चौधरी-उद्यमी, बस्तीरा

बस्ती जिले के छोटे से गांव परसा लंगड़ा में रेडीमेड गारमेंट की फैक्ट्री लगाई। इनकी फैक्ट्री में आसपास के जिलों के कारीगर काम करते हैं। कोरोना संक्रमण काल में बड़ी संख्या में लोग बड़े शहरों से गांवों को लौटने को मजबूर हो गए। इन लोगों में श्रमिकों के साथ ही कुशल कारीगर भी रहे। नरसिंह ने ऐसे कुशल कामगारों को तरजीह दी जो कोरोना संक्रमण की वजह से बड़े शहरों की फैक्ट्रियों के बंद हो जाने के कारण बेकार होकर अपने-अपने घरों को लौट आए थे। उन्होंने संकट में समय ऐसे लोगों की मदद की। आज इनकी फैक्ट्री के उत्पादों का विदेशों में भी निर्यात हो रहा है। पहले ये तमिलनाडु के मदुरै में टेक्सटाइल फैक्ट्री में काम करते थे।

 

रमाकांत, धरनी पट्टी, खड्डा

 

कुशीनगर जिले के खड्डा क्षेत्र स्थित धरनी पट्टी गांव निवासी रमाकांत किसान हैं। वह पढ़े-लिखे नहीं हैं। रमाकांत को शुरू से फलों के पौधों की नर्सरी तैयार करने का शौक रहा। वह विभिन्न प्रजाति के पौधों में प्रयोग करते रहे। इस गरीब किसान ने महज दस हजार की पूंजी लगाकर केले की नर्सरी शुरू की और छह साल में टर्न-ओवर 1.85 करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया। रमाकांत ने 60 लोगों को 12 महीने का रोजगार दिया है। उनकी नर्सरी पूरी तरह डिजिटल हो चुकी है। बंगलुरू से जहाज से लखनऊ तक टीश्यू कल्चर पौधे आते हैं। लखनऊ से धरनी पट्टी नर्सरी में आते हैं और उनकी ऑनलाइन बिक्री होती है। रमाकांत के दो बड़े बेटे भी इसी कारोबार में लगे हैं। दोनों छोटे बेटों में एक को एमबीबीएस व दूसरे को फॉर्मेसी की शिक्षा दिला रहे हैं।

विमलेश निगम, पडरौना

पडरौना शहर के मुन्ना कॉलोनी निवासी विमलेश निगम एमबीए और एलएलबी हैं। इन्होंने वर्ष 2021 में जनवरी माह में ऑनलाइन फार्मेसी कंपनी डाली। महज एक लाख की पूंजी लगाकर ऑनलाइन कारोबार शुरू किया। विमलेश अब बांस के ब्रश, टंग क्लीनर, पानी की बोतल, नीम की कंघी आदि ऐसे उत्पाद बाजार में ऑनलाइन सप्लाई करते हैं जो प्रदूषण रहित हैं। यह उत्पाद वह असोम की कुछ कंपनियों के सहयोग से तैयार करते हैं। महज पांच महीने में इनकी कंपनी का टर्न-ओवर 35 लाख पहुंच गया है। इनकी कंपनी यूपी मूल की पहली ऑनलाइन फर्मेसी है। पर्यावरण प्रेमी इस युवा ने 2014 में गो ग्रीन सेव अर्थ नामक संस्था बनाकर पर्यावरण के साथ गौरैया संरक्षण का अभियान शुरू किया था। यूपी के कई शहरों में पर्यावरण प्रेमी युवाओं की टीम तैयार की।

मधु राठौर-सामाजिक कार्यकर्ता, गोरखपुर

मधु राठौर टेराकोटा से आभूषण और खिलौने का निर्माण कर रही हैं। वह जरूरतमंद महिलाओं को प्रशिक्षण देती हैं और फिर अपने यहां उन्हें काम पर रख लेती हैं। इनके द्वारा तैयार आभूषणों की बड़े शहरों में भी खूब मांग हो रही है। सोशल मीडिया के जरिए इन्होंने अपने इस प्रयास को काफी विस्तार दिया है। मधु के प्रयास से तकरीबन 50 से अधिक महिलाओं को रोजगार मिल गया है। इनमें अच्छे परिवारों की भी महिलाएं हैं। वह ट्रेनिंग देकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का भी प्रयास कर रही हैं। वह खिलौना निर्माण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर अभियान को केंद्र में रखकर काम कर रही है। उनसे प्रशिक्षण पाने वाली महिलाओं के बनाए खिलौने देखते ही बनते हैं।

प्रीति दूबे, ओलंपियन, गोरखपुर

हॉकी में बेहतरीन फॉरवर्ड खिलाड़ी हैं। इन्होंने रियो डी जेनेरियो ओलंपिक 2016 में प्रतिभाग किया था। मात्र छह वर्ष की उम्र में हॉकी की स्टिक पकड़ने वाली प्रीति का वर्ष 2014 में जूनियर टीम में चयन हुआ था। उनके शानदार प्रदर्शन को देखते हुए उसी वर्ष प्रीति को सीनियर टीम में शामिल कर लिया गया। प्रीति दूबे लगातार बेहतर प्रदर्शन करती रहीं। इन्होंने न केवल गोरखपुर का मान बढ़ाया बल्कि लड़कियों के लिए प्रेरणा बनी। प्रीति को वर्ष 2014 में ही अपकमिंग प्लेयर ऑफ द ईयर चुना गया। वह भारतीय टीम में पुन: शामिल होने के लिए पसीना बहा रही हैं। प्रीति ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे शहरों की बेटियों के लिए रोल मॉडल हैं।

चन्द्रविजय सिंह, कोच, भारतीय कुश्ती, गोरखपुर

वर्ष 1996 से 2005 तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चंद्रविजय ने ग्रीको रोमन स्टाइल कुश्ती में भारत का प्रतिनिधित्व किया। अपने जमाने के धाकड़ पहलवान चन्द्रविजय सिंह ने कई बार देश के लिए पदक जीते। वह वर्ष 2018 से ग्रीको रोमन स्टाइल में भारतीय कुश्ती टीम के कोच हैं। उनकी कोचिंग में देश के कई पहलवानों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धूम मचाई है। पूर्वोत्तर रेलवे के सहायक क्रीड़ाधिकारी भी हैं। लॉकडाउन के दौर में उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों का रुख किया और प्रतिभाओं की तलाश शुरू कर दी। इस दौरान उन्होंने गोरखपुर से ही दो होनहारों को चुना जो इस समय कुश्ती का प्रशिक्षण ले रहे हैं।

डॉ. पल्लवी श्रीवास्तव, प्रभारी, अर्बन पीएचसी बसंतपुर

गुणवत्ता के राष्ट्रीय मानक पर खरा उतरने वाला सूबे का पहला अर्बन पीएचसी बसंतपुर को संवारने का श्रेय डॉ. पल्लवी श्रीवास्तव को है। डॉ. पल्लवी ने 2018 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की। इनकी पहली तैनाती बतौर बसंतपुर शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर हुई और प्रभारी चिकित्सक की जिम्मेदारी मिली। इन्होंने दो साल में स्वास्थ्य केंद्र की सूरत बदल दी। इनकी मेहनत और लगन का ही परिणाम है कि बसंतपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र यूपी में नंबर वन है। वर्ष 2019 में इस पीएचसी को 83 अंकों के साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र को कायाकल्प श्रेणी में सूबे में पहला स्थान मिला। इसी साल प्रदेश सरकारी ने इसे नेशनल क्वालिटी एंश्योरेंस स्टैंडर्ड(एन्क्वास) में नामित किया। इसके मानक और भी कड़े हैं। यह पीएचसी एन्क्वास के मानक पर भी 95 अंकों के साथ खरा उतरा।

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