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Hindi News उत्तर प्रदेशक़ृषि भूमि होना अनुकम्पा नियुक्ति देने से इनकार का आधार नहीं हो सकता, क्लर्क के आश्रित की मदद पर हाई कोर्ट की टिप्पणी

क़ृषि भूमि होना अनुकम्पा नियुक्ति देने से इनकार का आधार नहीं हो सकता, क्लर्क के आश्रित की मदद पर हाई कोर्ट की टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी दिवंगत कर्मचारी के आश्रित को इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति देने से इनकार नहीं किया जा सकता है कि परिवार के पास कृषि भूमि का कोई टुकड़ा है।

क़ृषि भूमि होना अनुकम्पा नियुक्ति देने से इनकार का आधार नहीं हो सकता, क्लर्क के आश्रित की मदद पर हाई कोर्ट की टिप्पणी
allahabad high court
Dinesh Rathourविधि संवाददाता,प्रयागराजWed, 19 Jun 2024 10:14 PM
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी दिवंगत कर्मचारी के आश्रित को इस आधार पर अनुकंपा नियुक्ति देने से इनकार नहीं किया जा सकता है कि परिवार के पास कृषि भूमि का कोई टुकड़ा है। या परिवार का कोई सदस्य संविदा के आधार पर कोई कार्य कर रहा है। कोर्ट ने कहा कि आश्रित परिवार की आर्थिक स्थिति की गणना करते समय यह देखा जाना चाहिए कि मृतक के जीवन काल में परिवार की आमदनी कितनी थी और उसकी मृत्यु के बाद परिवार की आमदनी कितनी है। परिवार पर जिम्मेदारियां क्या हैं। संभल के अमन पाठक की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश न्यायमूर्ति जेजे मुनीर ने दिया है। कोर्ट ने राज्य गन्ना समिति और जिला गन्ना अधिकारी द्वारा याची का अनुकंपा नियुक्ति का आवेदन खारिज करने का आदेश रद्द कर दिया है। तथा नए सिरे से एक माह के भीतर याची की अनुकंपा नियुक्ति पर निर्णय लेने के लिए कहा है।

याची अमन पाठक के पिता जिला गन्ना अधिकारी चंदौसी में क्लर्क थे। 13 नवंबर 2011 को उनकी मृत्यु हो गई। उस वक्त अमन की आयु मात्र 9 वर्ष थी। बालिग होने पर उसने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। राज्य समिति और जिला गन्ना अधिकारी ने उसका आवेदन यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि कर्मचारी की मृत्यु के 10 वर्ष बाद तक परिवार का ठीकठाक निर्वहन होता रहा। मृतक कर्मचारी की पत्नी आंगनबाड़ी केंद्र संचालित करती है। साथ ही उसके पास कृषि योग्य दो भूमि के टुकड़े हैं। कर्मचारी की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी अनुकम्पा नियुक्ति के लिए आवेदन कर सकती थी मगर उसने ऐसा नहीं किया। लिहाज़ा अब परिवार को अनुकंपा नियुक्ति की आवश्यकता नहीं है।

इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने कहा कि जिला गन्ना अधिकारी ने परिवार की आर्थिक स्थिति की सही तरीके से समीक्षा नहीं की। उन्होंने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ध्यान नहीं दिया जो कि उन्हें देना चाहिए था। कोर्ट ने कहा कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता का पद कोई स्थाई सरकारी पद नहीं है बल्कि यह एक संविदा का पद है। जिससे उसे मात्र 6000 रुपये माह की आमदनी होती है। जिस कृषि भूमि का जिक्र किया जा रहा है वह काफी छोटी है साथ ही उसमें अन्य हिस्सेदारी भी है। अधिकारियों ने यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि उस कृषि भूमि से वार्षिक उपज कितनी होती है तथा परिवार को उससे कितनी आमदनी हो रही है। जहां तक 10 वर्ष बाद आवेदन करने का प्रश्न है यह स्पष्ट है कि याची पिता की मृत्यु के समय नाबालिक था बालिक होते ही उसने आवेदन किया। 

कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को इस बात की गणना करनी चाहिए थी कि मृतक के जीवन काल में परिवार की आमदनी कितनी थी और उसकी मृत्यु के बाद अब परिवार की आमदनी कितनी है। तथा परिवार पर जिम्मेदारियां कितनी है। मृतक कर्मचारी की एक पुत्री अभी भी अविवाहित है। परिवार यदि पिछले 12 वर्षों से सामान्य जीवन जी रहा है तो इसका अर्थ यह नहीं होता है कि  परिवार के लोग आर्थिक रूप से संघर्ष नहीं कर रहे हैं। कोर्ट ने जिला गन्ना अधिकारी संभल का 30 सितंबर 2023  और राज्य गन्ना प्राधिकारी का 25 नवंबर 2023 के प्रस्ताव को रद्द कर दिया है तथा एक माह के भीतर याची के प्रतिवेदन पर अनुकंपा नियुक्ति देने के संबंध में नए सिरे से आदेश पारित करने के लिए कहा है।