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19 सितम्बर, 2020|9:09|IST

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राममंदिर आंदोलन के अगुआ: रामलला प्राकट्य के साथ जन्‍मभूमि पर शुरू हुआ भजन-कीर्तन, लॉन टेनिस की दोस्‍ती आंदोलन में आई काम

संत समाज की मान्‍यता है कि महराजा कुश ने अपने पिता मर्यादापुरुषोत्‍तम श्रीराम की स्‍मृति में उनकी जन्‍मभूमि पर भव्‍य मंदिर का निर्माण कराया था। यह मंदिर युगों तक विदेशी आक्रमणकारियों के निशाने पर रहा। 1527 में बाबर अयोध्‍या पहुंचा। फिर साजिशों के एक लम्‍बे सिलसिले के बाद उसके आदेश पर उसके सेनापति मीर बांकी ने धर्म की ध्‍वज पताका फहराते श्रीराम के मंदिर को तोड़ दिया। कहा जाता है कि 16 वीं से सदी से 20 वीं सदी तक मंदिर के पुनर्निमाण के लिए 79 युद्ध हुए। लेकिन 22-23 दिसम्‍बर 1949 की रात रामजन्‍मभूमि मुक्ति आंदोलन में एतिहासिक और मील का पत्‍थर साबित हुई।

संत समाज के मुताबिक उस रात जन्‍मभूमि पर रामलला का प्राक्टय हुआ। जन्‍मभूमि की पुलिस चौकी पर तैनात हवलदार अब्‍दुल बरकत ने डीएम के सामने बयान दिया कि रात दो बजे के करीब उसने इमारत के अंदर एक खुदाई रोशनी कौंधते देखी जिसका रंग सुनहरा था। उसमें उसने चार-पांच वर्ष के एक तेजस्‍वी बालक को देखा। उसने इसके पहले कभी ऐसा दृश्‍य नहीं देखा था। वह सकते में आ गया। चेतना लौटी तो उसने देखा कि मंदिर का ताला टूटा हुआ है और भक्‍तों की भारी भीड़ भवन में प्रवेश कर सिंहासन पर प्रतिष्ठित मूर्ति की आरती कर रही है। गोरक्षपीठाधीश्‍वर महंत दिग्विजयनाथ वहां मौजूद थे। आरती के बाद लोग वहां 'भये प्रकट कृपाला,दीन दयाला' गाकर स्‍तुति करने लगे।

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कहा जाता है कि रामलला प्रकट हुए तो महंत दिग्विजयनाथ और बाबा अभिराम दास ने वहां रामलला की मूर्ति को स्‍थापित किया था। हालांकि, संत समाज कहता है कि रामलला की मूर्ति खुद ही वहां प्रकट हुई थी।  बहरहाल, रामलला के प्राक्टय के बाद जन्‍मभूमि पर पूजा-अर्चना शुरू हो गई और महंत दिग्विजयनाथ ने आंदोलन की कमान सम्‍भाल ली। नाथ पंथ के जानकार और महाराणा प्रताप पीजी कालेज के प्राचार्य डा.प्रदीप राव कहते हैं  कि आजाद भारत में यहीं से रामजन्‍मभूमि की मुक्ति का संघर्ष शुरू हुआ। यह लड़ाई सड़क, संसद, न्‍यायालय में एक साथ चली। महंत दिग्विजयनाथ हर जगह सबसे आगे नज़र आए।  

रिकार्ड्स के मुताबिक अयोध्‍या थाने में 23 दिसम्‍बर 1949 को बाबरी मस्जिद भवन के अंदर एक बहुत बड़े जन समूह द्वारा भगवान श्रीराम की मूर्ति स्‍थापना की एफआईआर दर्ज की गई। इस पूरे घटनाक्रम की जानकारी जंगल में आग की तरह आसपास के जिलों और गांवों में फैल गई। लोग बड़ी संख्‍या में श्रीराम की जयकार करते हुए जन्‍मभूमि की ओर चल पड़े। महंत दिग्विजयनाथ ने उनका नेतृत्‍व किया। इस बीच पुलिस ने बलपूर्वक मस्जिद का दरवाजा बंद कर ताला लगा दिया। इसके बाद अयोध्‍या में अनशन शुरू हो गया। तब फैजाबाद के तत्‍कालीन डीएम के.के.नायर ने जन्‍मभूमि को विवादित स्‍थल घोषित करते हुए आईपीसी की धारा-145 के तहत प्रशासन के अधिकार में ले लिया। महंत दिग्विजयनाथ की मांग पर उन्‍होंने वहां स्‍थापित भगवान राम की मूर्ति की पूजा-अर्चना की व्‍यवस्‍था कराई।

बाद में ठाकुर गोपाल सिंह नामक एक भक्‍त की याचिका पर फैजाबाद के सिविल जज न्‍यायालय ने 16 जनवरी 1950 को अंतरिम निषेधाज्ञा जारी करके केंद्रीय गुंबद के नीचे श्रीराम की मूर्ति को हटाने या पूजा में हस्‍तक्षेप किए जाने पर रोक लगा दी। 1934 में अपने गुरु महंत ब्रह्मनाथ के समाधि लेने के बाद नानू सिंह, गोरक्षपीठाधीश्‍वर महंत दिग्विजनाथ  बने। 1967 में वह गोरखपुर से संसद में भी पहुंचे। 1969 में अपने देहावसान तक रामजन्‍म भूमि आंदोलन में लगातार सक्रिय रहे। 2012 में प्रकाशित पुस्‍तक 'राष्‍ट्रीयता के अनन्‍य साधक: महंत अवेद्यनाथ' में आचार्य स्‍वामी धर्मेन्‍द्र महाराज ने लिखा है-महंत दिग्वियजनाथ ने गोरक्षपीठ को 'इनफेन्‍ट्री बटालियन' का 'हेड क्‍वार्टर' बना दिया और स्‍वयं उसके 'कमाण्‍डर इन चीफ' बने। रामजन्‍म भूमि के मुक्ति संघर्ष में उनकी भूमिका वही है जो किसी मोबाइल सेट में उसके सिमकार्ड की होती है। 
 

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